ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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मोक्ष, इनकी गणना पारलौकिक विद्या से है। ये सभी ब्रह्मचर्य के प्रताप से सुलभ हैं। एक ब्रह्मचारी इन्हें कुछ ही दिन के सहस्र्यास से, निश्चय रूप से अधिकृत कर लेता है।
किंवदन्ता एक ही ब्रह्मचर्य में धर्म के दोनों उद्देश्यों की सिद्धि हो जाती है। अतएव हम ब्रह्मचर्य को ही धर्म का साक्षात् स्वरूप समझते हैं।
ब्रह्मचर्य शरीर और आत्मा का प्रधान धर्म है। इससे शारीरिक तथा मानसिक विकास स्वयं हो जाता है। इसलिये ब्रह्मचर्य को सर्व-प्रथम स्थान मिला है।
एक बार नारद जी भगवान् विष्णु के पास बैठकृष्ट में गये। अभिवादन तथा कुशल-प्रश्न के पश्चात् नारदजी ने भगवान् से पूछा कि महाराज ! मैं आप से कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। इस पर विष्णु भगवान् ने उन्हें पूछने की आज्ञा दी।
उन्होंने पूछा कि हे सब के हृदय की वात जानने वाले प्रभो ! आप की भाया में सब जीव मूल हैं। भला यह तो बताइये कि आप को सब से भिन्न वस्तु क्या है ? मैं आप के ही श्रीमुख से यह रहस्य प्रकट कराना चाहता हूँ।
नारद जी का प्रश्न सुन कर भगवान् बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि हे ऋषिवर ! आपने संसार के लाम की इच्छा से यह प्रश्न किया है, अतएव मैं आप से अपने मन की बात बतलाता हूँ। सुमे ब्रह्मचर्य-धर्म सब से भिन्न है। जो पुरुष मन, वचन तथा कर्म से इसका उचित रीति से पालन करता है, वह निश्चय ही सुभ्म को प्राप्त होता है। यही कारण है कि बड़े-बड़े योगी लोग ब्रह्मचर्य-सिद्धि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते।