ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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सदाचार और ब्रह्मचर्य
जीव के लिये ब्रह्मचर्य से बद्ध कर दूसरा धर्म त्रिलोक में नहीं। इस पर नारद जी भगवान् की स्तुति कर वहाँ से प्रसन्न चित्त हा कर अन्य कर्तव्यों के लिये विदा हुये।
११—सदाचार और ब्रह्मचर्य
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तयद्देवतेरोजनः । स यत्प्रमार्गं कुरुते, लोकस्तदनुवर्तते ॥
(श्रीभगवद्गीता)
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, वैसा दूसरे लोग भी उनकी देखा-देखी करते हैं, और वे जा कुछ नियम निर्धारित करते हैं, लोग वन्हीं के अनुकूल चलने लगते हैं।
“आचारः प्रथमो धर्मः।”
(मनुस्मृति)
सदाचार ही परम धर्म है। भगवान् मनु ने उपर्युक्त शब्दों में सदाचार को प्रधानता दी है।
वास्तव में मनुष्य-जीवन का सार सदाचार है। सदाचार से ही, दोनों ही, व्यक्तिगत तथा समाजिक सुधार हो सकते हैं। जो जाति, और जो देश अपने सदाचार से पलित नहीं होता, वह अपनी सुखमय अवस्था से हीन नहीं हो सकता है।
सदाचार का अर्थ है—सज्जनों का आचरण। वे उत्तम नियम, जिन पर कि उच्च पुरुष चलते हैं—अथवा शास्त्र-सम्मत वे कार्य, जिनके करने से मनुष्य-समाजको सुख और शान्ति मिलती है।