ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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सदाचार और ब्रह्मचर्य
जीव के लिये ब्रह्मचर्य से बद्ध कर दूसरा धर्म त्रिलोक में नहीं। इस पर नारद जी भगवान् की स्तुति कर वहाँ से प्रसन्न चित्त हा कर अन्य कर्तव्यों के लिये विदा हुये।
११—सदाचार और ब्रह्मचर्य
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तयद्देवतेरोजनः । स यत्प्रमार्गं कुरुते, लोकस्तदनुवर्तते ॥
(श्रीभगवद्गीता)
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, वैसा दूसरे लोग भी उनकी देखा-देखी करते हैं, और वे जा कुछ नियम निर्धारित करते हैं, लोग वन्हीं के अनुकूल चलने लगते हैं।
“आचारः प्रथमो धर्मः।”
(मनुस्मृति)
सदाचार ही परम धर्म है। भगवान् मनु ने उपर्युक्त शब्दों में सदाचार को प्रधानता दी है।
वास्तव में मनुष्य-जीवन का सार सदाचार है। सदाचार से ही, दोनों ही, व्यक्तिगत तथा समाजिक सुधार हो सकते हैं। जो जाति, और जो देश अपने सदाचार से पलित नहीं होता, वह अपनी सुखमय अवस्था से हीन नहीं हो सकता है।
सदाचार का अर्थ है—सज्जनों का आचरण। वे उत्तम नियम, जिन पर कि उच्च पुरुष चलते हैं—अथवा शास्त्र-सम्मत वे कार्य, जिनके करने से मनुष्य-समाजको सुख और शान्ति मिलती है।
ब्रह्मचर्य-चिन्तामणि
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यह बात सभी लोग जानते हैं कि हमारे ऋषि-महर्षि सदाचारों और श्रेष्ठ पुरुष थे। उनके निर्धारित किये हुये कर्म भी सदाचार हैं। वे जैसा आचरण करते थे, वैसा ही प्रजा को भी करने का उपदेश देते थे। वे भी ब्रह्मचर्य को सदाचार मानते थे। यही कारण था कि प्राचीन कालिक जनता ब्रह्मचर्य के पालन में अत्यधिक उद्यत थी।
धर्मज्ञ-शिरौभूषण मनु ने सदाचार से प्राप्त होने वाले उत्तम फलों का इस प्रकार वर्णन किया है:—
श्राचापारुलभते ध्यायुराचारदीप्सिताः प्रजाः ।
श्राचारान्न मन्वृष्य माचारो हन्त्यलक्षणम् ॥
( मनुस्मृति )
सदाचार का पालन करने से मनुष्य को दीर्घायु, मन चाही सन्तान और अमित धन मिलता है। सदाचार से जनक दुर्गुण भी नष्ट हो जाते हैं। वे फिर कहते हैं:—
सर्वं लक्षण-हीनोऽपि, यः सदाचारवाचस्वः ।
श्रद्धामनोऽनस्यश्च, शर्तः वर्षाणि जीवति ॥
( मनुस्मृति )
सब शुभ लक्षणों से रहित होने पर भी, जो सदाचारी पुरुष है—शास्त्रों पर श्रद्धा रखने वाला और ईर्ष्या से घृणा रखने वाला है; वह सौ वर्षों तक जीता है।
अब हमारे पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि सदाचार मनुष्य-जाति का कितना हित करने वाला साधन है। अतः इस का पालन करना भी कितना आवश्यक है।
ऊपर जिन ऊँचे वर्र्द्यों को सिद्धि सदाचार से होती है, सो
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तप और ब्रह्मचर्य
सब ब्रह्मचय के अन्तर्गत हैं। अतएव वह सदाचार यही ब्रह्मचर्य है। हम सदाचार को ब्रह्मचर्य से पृथक् नहीं कर सकते।
हमारे विचार से 'ब्रह्मचर्य' ही मूल सदाचार है। क्योंकि सदाचार के जितने गुण हैं, वे सब इसके भीतर आ जाते हैं।
जैसे सदाचार से समस्त दोषों का नाश होता है, वैसे ब्रह्मचर्य से भी किया जा सकता है। अतः ब्रह्मचर्य सदाचार भी सिद्ध हो गया। ब्रह्मचारी ही सच्चा सदाचारी है।
११—तप और ब्रह्मचर्य
“तपो वै ब्रह्मचर्यम्” (श्रुतिः)
वास्तव में ब्रह्मचर्य ही तप है।
“तपो मे हृदयं साक्षात्” (भगवान् विष्णुः)
तप मेरा साक्षात् हृदय है।
पुराणों तथा और अच्छे ग्रन्थों में लिखा है कि भारत के ऋषि-महर्षि तप करते थे—उन लोगों का जीवन प्रायः तप के अनुष्ठान में ही बीतता था। यही कारण था कि वे अपने तपोबल से प्रथिवी पर मनुष्य-जाति का महान् हित कर, आदर्शीय बनते थे।
ऊपर की बात जान कर मनमें यह प्रश्न उठता स्वाभाविक है कि वह तप क्या था? हमारे विचार से वह 'ब्रह्मचर्य' ही था! उसी की रक्षा के लिये विविध प्रकार के उपाय किये जाते थे। उसी की एक मात्र साधना से बड़ी २ सिद्धियाँ प्राप्त होती थीं। उसको एक बार खण्डित होने से भी तपसियों के अनेक वर्ष का
ब्रह्मचर्य-विद्यान
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परिश्रम और अनुष्ठान नष्ट हो जाता था। वे जो कुछ करना चाहते थे, वह मनोरथ नहीं सधता था। वे लोग उसी ब्रह्मचर्य की रक्षा करने के लिये नगरों को त्याग कर वनों में तथा पर्वतों पर जा कर रहते थे। फलाहार कर अपने शरीर को क्षीण कर देते थे। बहुत से लोग वृक्षों के पत्तों, वनस्पतियों तथा वायु पर ही अपना निर्वाह करते थे। देह के दुर्वल हो जाने से उन्हें फाम-बिकार नहीं सताता था। काम-बिकार के न उत्पन्न होने से उनका वीर्य रक्षित रहता था। वीर्य के सुरक्षित रहने से आत्म-वेद वदुता था, जिससे चित्त में शान्ति आती थी। चित्त के स्थिर हो जाने के कारण, वे योग कर सकते थे। अर्थात् मन को आधमा या परमात्मा में लीन करते थे। इस प्रकार उन्हें उस ज्ञान या परमानन्द की प्राप्ति ही जाती थी, जिससे वे मुक्ति-पद (परम शान्ति) को पा जाते थे।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य ही वह परम तप था। उसी का पालन करने के लिये जन्म भर चक्र किये आते थे। अनेक विघ्न पड़ते पर भी यह महाप्रव नहीं छोड़ा जाया था। जो तपस्वी अपनी इस साधना में सफल हो जाते थे, वे ही सफल मनोरथ होते थे। इसी से भगवान् शिव ने इस प्रकार अपने हृदय का भाव प्रकट किया है:—
“न तपस्तप हृत्पाहुर्ब्रह्मचर्यतपोत्तमम्।”
(तन्त्रशास्त्र)
अर्थात् तप कुछ नहीं है ! ब्रह्मचर्य ही उत्तम तप है।
इस अवतरण से भी हमें यही भासता है कि शिवजी ने भी ब्रह्मचर्य को ही उत्तम तप माना है। अतः हमारे कहने का तात्पर्य
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तप और ब्रह्मचर्य
यह है कि ब्रह्मचर्य ही परम तप है, और इसको पालन करने वाला पुरुष ही सच्चा तपस्वी है ।
भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी गीता में शारीरिक, वाचिक और मानसिक—इन तीन प्रकार के तपों का वर्णन किया है । उसे हम यहाँ देते हैं:—
देवद्विजगुरुमाक्ष-पूजनं, शौचं मार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसाच, शारीरं तप उच्यते ॥
( श्रीभगवद्गीता )
देव, द्विज, गुरु और विद्वान् की पूजा (सत्कार) पवित्रता और सरलता, तथा ब्रह्मचर्य और अहिंसा को शारीरिक तप कहते हैं ।
। अनुद्देश-करं चाक्यं, सत्यं प्रियं हितश्चयत् ।
स्वाध्यायान्यसनं चैव, वाङ्मयं तप उच्यते ॥
( श्रीभगवद्गीता )
किसी का हृदय न दुखाने वाला, सत्य-प्रिय तथा परोपकारों वचन, और वेदों के अभ्यास को वाचिक तप कहते हैं ।
मनः प्रसादः सौम्यत्वं, मौनमात्म-विनिग्रहः ।
भाव-संशुद्धिं रित्येतत्तपो मानस उच्यते ॥
( श्रीभगवद्गीता )
अर्थात् चित्त की प्रसन्नता, सौम्यता, मननशीलता, विषयों से विरक्तता तथा भावों की शुद्धता को मानसिक तप कहते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण के मत से भी ब्रह्मचर्य की गणना शारीरिक तप में हुई है । पर हमारे विचार से ऊपर जिन तपों का वर्णन किया गया है, वे सभी साधनार्थ, एक ब्रह्मचर्य के ही अन्तर्गत आ जाती हैं । ब्रह्मचर्य के बिना पालन किये, वे कदापि निवह नहीं सकते । अतएव ब्रह्मचर्य को महत्तम जानना चाहिये ।
मूषकचर्या-विज्ञान
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इमने मूषकचर्या को ही तप सिद्धाक्रिया है। प्राचीन काल में प्रभा- नतया यही तप साधा जाता था। इमारे भव की पुष्टि नीचे लिखे वैदिक मन्त्र से भी होती है:—
“मूषकचर्येण ततसा देवा मृत्युमुपाज्यन्त ।”
( अथर्व वेद )
मूषकचर्या स्वपी तप से देवों को अमरता प्राप्त हुई।
अब पाठक समझ गये होंगे कि तप की रू आश्रयचर्या में कुछ भी अन्तर नहीं। आजकल जो तप के नाम से प्रसिद्ध है, वह वास्तव में यही मूषकचर्या था, जिसके लिये जनेक वर्ष तक लोग यल्ल-पूतक तपस्या करते थे, और उसके निर्वात्र अर्थस्त हो जाने पर, मूष की प्राप्ति होती थी। परन्तु मूषकचर्या सिद्ध हो जाता था।
१२—योग और आश्रयचर्या
योगार्त्तमाप्यते धर्म, योगो धर्मैत्यल्लक्षणम् ।
योगो परन्तपोऽप्येतत्समाद्रु योगं ससम्भ्यसेत्॥
( महासुति काशि )
योग से ज्ञान की प्राप्ति होती है—योग ही धर्म का रूप है, और योग ही परम तप माना जाता है। अतएव ऐसे योग का अभ्यास करना चाहिये।
महर्षि पतञ्जलि ने अपने शास्त्र में इस प्रकार योग का लक्षण किया है:—
“योगश्चित्तवृत्ति-निरोधाः ।”
( योगदर्शन )
चित्त की वृत्तियों को रोकने का नाम योग है। अब सफ
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योग और अद्भुतचर्य
चित्त-वृत्तियों अपने अधिकार में नहीं हो जातीं, तब तक लाख उपाय करने पर भी रोके नहीं रुक सकतीं। चित्त-वृत्तियों को अधिकार में करने के लिये, मन की साधना की जाती है। यह मन की साधना बिना अद्भुतचर्य के हो नहीं सकती। यही कारण है कि योग करने के पहले, अद्भुतचर्य-व्रत का पालन करना पड़ता है। जिसका अद्भुतचर्य स्थिर नहीं, वह पुरुष योग-व्रत होकर अपने ध्युत्थान से गिर जाता है। एक अद्भुतचर्य पुरुष में ही चित्त-वृत्ति को रोकने की शक्ति रह सकती है।
योग का उद्देश्य आत्मा और परमात्मा को प्राप्त करना है। उपनिषदों में आत्मा और परमात्मा में लीन होने के उपायों का वर्णन है। प्रमाण के लिये एक मन्त्र उद्धृत किया जाता है।—
सत्येन सत्यस्त्वत्सा शेष आत्मा ।
सत्यग्वानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ॥
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि ध्रुवो ।
संश्रयन्ति यतयः क्षीणं शोबाः ॥
सत्य से, तप से, पूर्ण ज्ञान से और अविचल अद्भुतचर्य से आत्मा ( ईश्वर ) का लाभ हो सकता है। वह अन्तःकरण में श्रियोतिर्मय और निर्मल रूप से विराजमान है। जो लोग सिद्ध और निष्पाप हैं, वे ही उसके दर्शन कर सकते हैं।
हमारे विचार से सत्य, तप और आत्मज्ञान सब योग से ही सिद्ध होते हैं। वह योग भी अद्भुतचर्य पर स्थित है। इसलिये अद्भुतचर्य ही सच्चा योग है। इसका निभाने वाला पुरुष ही कर्मनिष्ठ योगी है। जिस चित्त-वृत्ति निरोध से योग सिद्ध होता है, उसी से अद्भुतचर्य का भी पालन किया जाता है।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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योग-शास्त्र में योग के साधने की तीन कियायें या साधन इस प्रकार वतलाये गये हैं:—
“तपः स्वाध्यायेश्चर-प्रणिधानानि क्रिया-योगः ।”
तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान को क्रिया-योग कहते हैं। हमारे ब्रह्मचर्य में भी, ये तीनों कियायें प्रधानरूप से विद्यमान हैं। जिन भाठ अंगों से योग सिद्ध होता है, उन्हीं के पालन से ब्रह्मचर्य को भी पूर्णता प्राप्त होती है।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य एक प्रकार से योग भी है। जिसने ब्रह्मचर्य का पालन किया, उसने योग-साधन भी कर लिया।
१३—सत्य और ब्रह्मचर्य
सत्येन धार्यते पृथ्वी, सत्येन तपते रविः।
सत्येन वातिवायुश्च, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
सत्य से पृथिवी ठहरी हुई है, सत्य से सूर्य अपना प्रकाश करता है और सत्य से ही वायु चलती है। एक सत्य में सब कुछ प्रतिष्ठित है।
वास्तव में संसार का वीजरूप एक सत्य ही है। सभी पदार्थों में सत्य विराजमान है। जहाँ वह नहीं है, वहाँ कुछ भी नहीं रह सकता। जिस पदार्थ का सत्य नष्ट हो जाता है, वह स्वयं भी नाश को प्राप्त होता है। सत्य का ही दूसरा नाम अस्तित्व है।
इस शरीर का सत्य बल है—इसके भीतर रहने वाले आत्मा का सत्य ब्रह्मचर्य है। बल के न रहने पर शरीर और ब्रह्मचर्य
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सत्य और ब्रह्मचर्य
से हीन होने पर आत्मा का अस्तित्व नहीं रह सकता । जैसा कि उपनिषदों में लिखा है:—
सत्य मेव जयते नाशुतम् । सत्येन पन्थावित्तो देवयानः ॥ येनाक्रमन्तृषयो ह्यासकामा । यत्र तत्सत्यस्य परमनिधानम् ॥
सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं ! सत्य से ही देवों का मार्ग मिलता है । ऋषि लोग भी सत्य के प्रभाव से सफल होते हैं, जहाँ सत्य की सत्ता है, वहाँ सब सुख है ।
हमारे विचार से जिस सत्य का वर्णन ऊपर आया है, वह यही ब्रह्मचर्य है । जो पुरुष ब्रह्मचर्य का नाश करता है, वह अपने को सत्य से प्रत्यक् करता है । इसके पालन से मनुष्य सत्य को अधिकार में कर लेता है, और वह सत्य उस को सुखी बनाता है ।
हमारे भीष्म पितामह ने ब्रह्मचर्य को सत्य शब्द से अभिहित किया है । अपनी प्रसिद्धा की दृढ़ता प्रकट करने के लिये, उन्होंने सत्य का ही नाम लेकर, ब्रह्मचर्य को महत्व दिया है ।
विक्रमं वृजहा जहाद्भर्म जहाच्च धर्मराज । नत्वहं सत्यमुत्पृङ्, व्यवसेयं कथञ्चन ॥
(महाभारत)
चाहे इन्द्र अपने पराक्रम को छोड़ दें, और धर्मराज अपने धर्म को छोड़ दें, पर जिस सत्य (ब्रह्मचर्य) को मैंने धारण किया है, उसे कदापि नहीं छोड़ सकता ।
३
ब्रह्मचर्य-विधान
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अब पाठक सत्य और ब्रह्मचर्य की एकता और रहस्य को समझ गये होंगे ।
भिस पुरुष के हृदय में सत्य की कुछ भी प्रतिष्ठा है—जो सत्य का पालन करना चाहता है, वह इस ब्रह्मचर्य रूपी सत्य का पालन कर सद्गति को प्राप्त हो ।
१४—कर्तव्य और ब्रह्मचर्य
“जयं प्राप्नोति संज्ञामे, यः सुकार्याण्यनुष्ठते ।”
( विदुरनीति )
सर्कतव्यों का पालन करने वाला ही पुरुष संज्ञाम में विजय-लाम करता है ।
कर्तव्य मेव कर्तव्यं, प्राप्तेः कण्ठगतेरपि ।
अकर्तव्यं न कर्तव्यं, प्राप्तेः कण्ठगतेरपि ॥
( नीति-शास्त्र )
अपने कर्तव्य का पालन प्राणों के निकलने तक करना चाहिये ! पर जिसे हम अकर्तव्य समझते हैं, उसे प्राणों के जाने पर भी करना योग्य नहीं ।
कर्तव्य से ही समाज की स्थिति है—कर्तव्य से ही दोषों का नाश होता है—कर्तव्य के पालन से ही मनुष्य को सुख-शान्ति मिल सकती है, और कर्तव्य ही सब का सार है । कर्तव्य से हीन होने पर कदापि सुख नहीं मिलता । अकर्तव्य के समान पाप भी नहीं ।
हम ब्रह्मचर्य को ही सब कर्तव्यों का कर्तव्य मानते हैं ।
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कर्तव्य और ब्रह्मचर्य
संसार के सारे कर्तव्य एक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता रखते हैं। ब्रह्मचर्य के बिना एक भी कर्तव्य नहीं हो सकता !
“कर्तव्य सर्व-साधकम् ।”
( सूक्ति )
कर्तव्य ही मनुष्य के सब कार्यों को साधने वाला है । हमारा ब्रह्मचर्य भी सब का साधने वाला सिद्ध हो चुका है । अतएव वह पूर्ण रूप से कर्तव्य कहा जा सकता है । इस कर्तव्य के सामने विश्व के सभी कर्तव्य मूक हो जाते हैं । इस ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष ही सब कर्तव्यशील है, और वह सब सुखों को सहज में प्राप्त कर लेता है ।
वैश्वीर्योपनिषद् में आचार्य-द्वारा कर्तव्य की बहुत ही उत्तम परिभाषा की गई है, और उसी वचन में कर्तव्य-पालन की आह्वा भी ब्रह्मचारी को दी है । उसे हम यहाँ उद्धृत करते हैं :—
“यान्यनवधानिकर्माणि तानि सेवितव्यानि, नो इत्पाणि ।” ( उपनिषत् )
जो निर्दोष कर्म हैं, वे ही कर्तव्य हैं । अकर्तव्य का सेवन करना योग्य नहीं वरन् मूर्खता है ।
इस से यह विदित होता है कि जिसने दोष-रहित कर्म हैं, सब की गणना कर्तव्य में है । उनका पालन करना शास्त्र-सङ्गत है । वे सभी कर्तव्य ब्रह्मचर्य के बिना नहीं सध सकते । अतः इस प्रकार वे भी ब्रह्मचर्य सब कर्तव्यों का मूल है ।
अब पाठक भलीभाँति समझ गये होंगे कि ‘ब्रह्मचर्य’ ही श्रेष्ठ कर्तव्य है, अतएव जिसे कर्तव्य का पालन करना हो, वह ब्रह्मचर्य का पालन करे ।
ब्रह्मचर्य-चिन्तन
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१५— यम-नियम और ब्रह्मचर्य
“अहिंसा सत्यस्तेय-ब्रह्मचर्यापरिग्रहो यमाः ।”
( योगदर्शन )
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—ये पाँच यम कहलाते हैं ।
मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न देने का नाम ‘अहिंसा’ है । जैसा कुछ देखा-सुना और जो मन में हो, उसे उसी रूप में कहने को ‘सत्य’ कहते हैं । पराये धन का लोभ न करना ‘अस्तेय’ है । उपस्थित्व का संयम तथा वीर्य-रक्षा का नाम ‘ब्रह्मचर्य’ और शरीर-यात्रा के निर्वाह से अधिक भोग-सामग्री का एकत्र न करना ‘अपरिग्रह’ कहलाता है ।
अब हम महर्षि पतञ्जलि के कहे हुये यमों के लाभों का वर्णन करते हैं । वे इस प्रकार हैं—
“अहिंसा-प्रतिष्ठायां तत्त्वनिधौ वैर-त्यागः ।”
( योगदर्शन )
‘अहिंसा’ के पालन से वैर-भाव का त्याग होता है । अर्थात् सब जीवों पर दया करने से वे भी प्रेम करते हैं ।
“सत्य-प्रतिष्ठायां क्रिया-फलाश्रयत्वम् ।”
( योगदर्शन )
‘सत्य’ के पालन से सभी कार्य सिद्ध होते हैं । वचन के प्रभाव से दूसरों तथा अपने को सुख मिलता है ।
“अस्तेय-प्रतिष्ठायां सर्व-रक्षोपस्थानम् ।”
( योगदर्शन )
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यम-नियम और ब्रह्मचर्य
‘अस्तेय’ के पालन से सब कुछ स्वयं प्राप्त हो जाता है। अभि- प्राय यह है कि वह सब का विश्वासपात्र बनता है।
“ब्रह्मचर्य-प्रतिष्ठायां वीर्य-लाभः।”
(योगदर्शन )
‘ब्रह्मचर्य’ का पालन करते से वीर्य का लाभ होता है। अर्थात् उसे शारीरिक और मानसिक बल की प्राप्ति होती है।
“अपरिग्रहस्यैवं जन्मकथन्तासन्तोषः।”
(योगदर्शन )
‘अपरिग्रह’ के पालन से जन्म-सुधार के विचार उत्पन्न होते हैं। हृदय में निस्वार्थता का भाव वृद्धि होता है।
महर्षि पतञ्जलि ने इन पाँचों यमों को अकाङ्क्ष तथा सार्व- भौम महाव्रत माना है। अर्थात् इनका पालन सब जाति, सब देश, सब समय और सब अवस्था में किया जा सकता है।
अब हम उनके योगदर्शन में लिखे हुये नियमों का आवश्यक वर्णन करते हैं:—
“शौच-सन्तोष-तपः-स्वाध्यायेश्वर-प्रणिधानानि नियमाः।”
(योगदर्शन )
शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—ये पाँच नियम कहलाते हैं।
शारीरिक और मानसिक पवित्रता का नाम ‘शौच’ है। भोग के साधनों को अनिच्छा का नाम ‘सन्तोष’ है। सुख-दुःख, शीत- उष्णदि द्रव्य सहने, तथा परिमित आहार-विहार करने का नाम ‘तप’ । ओङ्कारादि जप और वेद-शास्त्रों के अध्ययन का नाम ‘स्वा-
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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ध्याय' है, और फल-रहित हो, परमात्मा की उपासना का नाम 'हैश्वर-प्रणिधान' है।
अब नियम के पालन से जो फल प्राप्त होते हैं, उन्हें भी एक एक कर कहते हैं:—
“शौचस्त्वाङ्गं जुगुप्सा परैरेसंसर्गः।”
“सत्त्वशुद्धि सौमनस्यैकाग्र्येन्द्रिय ज्ञायात्मदर्शनयोग्यत्वधानिच्च।”
( योगदर्शन )
बाह्य 'शौच' से शरीर का मोह और पराये के साथ सम्बन्ध की इच्छा नहीं रहती। 'आभ्यन्तर' शौच से मन की शुद्धि, प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रिय-जय और आत्म-दर्शन की योग्यता प्राप्त होती है।
“सन्तोषादुत्तुलम सुखलाभः।”
( योगदर्शन )
'सन्तोष' की साधना से परम सुख मिलता है। छुपना का नाश होने से मन की अशान्ति दूर हो जाती है।
“कायेन्द्रिय शुद्धिरशुद्धि ज्ञायासपसः।”
( योगदर्शन )
'वप' की साधना से सुन्दर स्वाध्याय और इन्द्रियों पर अधिन्कार प्राप्त होता है
“स्वाध्यायादिष्ट देवता संप्रयोगः।”
( योगदर्शन )
'स्वाध्याय' करने से इष्ट-साधन और आत्म-ज्ञान की उपलब्धि होती है।
“समाधि-सिद्धिरीश्वर-प्रणिधानात्।”
( योगदर्शन )
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यम-नियम और ब्रह्मचर्य
‘ईश्वर-प्रणिधान’ से समाधि ( अत्यन्त शान्ति ) मिलती है । आत्मा या परमात्मा में लीन होने पर कोई सुख फिर शेष नहीं रहता । यह सर्व-सम्मत सिद्धान्त है ।
यद्यपि यम और नियम योग के अङ्ग हैं, तथापि ये ‘ब्रह्मचर्य’ के भी प्रधान अवयव हैं । ब्रह्मचर्य की दशा में प्रत्येक ब्रह्मचारी को पाँच यमों और पाँच नियमों का पालन नितान्त आवश्यक है । विना इनके ब्रह्मचर्य की कदापि सिद्धि नहीं हो सकती है ।
धर्माचार्य मनु ने भी यम और नियमों के सम्बन्ध में अपनी ऐसी ही सम्मति प्रकट की है:—
यमान्सेवत सतर्त, न नित्यं नियमान्बुधः ।
यमान्यतत्यकुर्वीणो, नियमान्क्रेवलान्मज्जन ॥
( मनुस्मृति ) बुद्धिसान् सदैव यमों का सेवन करे, नियमों का पालन नित्य न भी करे, क्योंकि यमों का न पालन करने वाला मनुष्य केवल नियमों का पालन करता हुआ भी पतित हो जाता है ।
अभिप्राय यह है कि अहिंसा सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन न करने वाला पुरुष—शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान करते रहने पर भी कार्य में असफल होता है । अतएव यम और नियम दोनों की समान रूप से प्रतिष्ठा करनी चाहिये । कारण यह है कि ब्रह्मचर्य के ये दोनों आवश्यक अङ्ग हैं, या यों समझिये कि ब्रह्मचर्य रूपी आत्मा इन्हीं यम-नियमों से बने हुये शरीर में वास करता है ।
अब तो हमारे पाठक यम-नियम तथा ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध भली भाँति समझ गये होंगे ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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१७—यज्ञ और ब्रह्मचर्य
“यज्ञाद्भवति पर्जन्यः, पर्जन्यादन्तस्त्वभवः ।”
( मनुस्मृति )
यज्ञ से मेघ की उत्पत्ति होती है, और मेघ से अन्न पैदा होता है । और अन्न से सब जीते हैं ।
यज्ञ की महिमा वेदों में विविध प्रकार से गाई गई है । जिसके द्वारा (परमात्मा) ज्ञाना जाय, ज्ञानी उसे 'यज्ञ' कहते हैं । यही कारण है कि उपनिषदों में ब्रह्मचर्य का यज्ञ-रूप से वर्णन किया गया है ।
अथ यद्यद्य इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यं मेघ । तद् ब्रह्मचर्येण खेव यो ज्ञाता, तं विन्दुतेऽथ यद्विदमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यं मेघतद् ब्रह्मचर्येण खेवे । (ऽऽत्मानमनुविन्दुते ।
( छान्दोग्योपनिषद् )
जिसे 'यज्ञ' कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । उस ब्रह्मचर्य का जानने वाला ब्रह्म को प्राप्त होता है । जिसको 'विन्दु' कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है । ब्रह्मचर्य द्वारा यजन करके ही पुरुष ब्रह्म को पाता है ।
“लोग जिसे 'सात्रायण' यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही अभिनाशी जीव की रक्षा होती है । जिसे 'भीन' कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही परमात्मा का भजन किया जा सकता है । जिसे 'अनशनायन' कहा गया है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से प्राप्त किया हुआ आत्मभाव नष्ट नहीं होता । जिसे 'अरण्यायन' कहते हैं, वह
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यज्ञ और ब्रह्मचर्य
भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा (कर्मकाण्ड और ज्ञान-काण्ड का फल) ब्रह्मपुरी मिलती है । जो पुरुष इस ब्रह्मचर्यरूपी यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, वे अग्नि-स्वरूप होकर अपने तथा औरों के पापों को भी तृण की भाँति भस्म कर देते हैं ।”
एक स्थान पर ब्रह्मचर्य को यज्ञ मान कर ब्रह्मचारी को यज्ञकर्त्ता माना गया है । यज्ञ के प्रधान-प्रधान अङ्ग, ब्रह्मचारी के कार्यों पर, रूपकालङ्कार में, घटाये गये हैं । इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचर्य की अवस्था ही यज्ञ है । ब्रह्मचारी को यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं, उसे तो यों ही यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।
महर्षि अङ्गिरा के पुत्र चोरनामा ऋषि ने देवकी के पुत्र श्री कृष्ण से अध्ययन के समय कहा कि ब्रह्मचारी के लिये विशेष कर्म नहीं हैं । उसे मरणकाल में चाहिये कि इस प्रकार कह कर मुक्त हो जायः—
हे परमात्मन् ! आप ‘श्रुतिनाशी’ हैं । हे देव ! आप ‘पक्करस’ रहने वाले हैं, और आप ही ‘जीवनदाता तथा श्रुतिसुन्दरम्’ हैं । वस, इतने से ही उसकी सन्तुति हो जायगी । इसका अभिप्राय यह है । कि यही उसके लिये अन्तिम यज्ञ है । इसलिये इस उपदेश को सुन कर श्री कृष्ण भी अन्य विचारों को छोड़ कर परमात्मपरायण हो गये । अब यह बात भी सिद्ध हो गई कि ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ यज्ञ भी है । और ब्रह्मचारी ही यज्ञ कर्त्ता है ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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१८—दो आदर्श ब्रह्मचारी
‘ब्रह्मचारी सिद्धति सानौ रेतः। पृथिव्यां तेनजावन्ति प्रदि शश्वतत्तः।’
(अथर्ववेद)
ब्रह्मचारी अपने सद्वृत्तान्त, पराक्रम, सिद्धान्त, सदाचार तथा उत्तम गुणों को, वक्के-छोटे का विचार न कर, सब में फैलाता है। इससे चारों ओर की जनता में तब-जीवन का सञ्चार होता है।
हमारे पाठक इस बात को भली भाँति समझ चुके हैं कि ब्रह्मचर्य जैसे उच्च तथा सर्वोपकारी विज्ञान का पहले पहल इसी देश में आविष्कार हुआ था। यही कारण है कि अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ इसका सुधार और प्रचार विशेष रूप से हुआ।
हमारे मत से भूमण्डल के इतिहास में जितने अधिक उदाहरण ब्रह्मचर्य के यहाँ मिल सकते हैं, उतने और कहीं मिलने सम्भव नहीं।
इस देश में अनेक पुरुषों ने ब्रह्मचर्य-पालन की चेष्टा की है। उनमें से कुछ लोग अपने व्रत से विंचलित भी हो गये। बहुतांश का सफलता भी मिला, पर हम उन दो आदर्श ब्रह्मचारियों का परिचय करा देना चाहते हैं, जो वास्तव में अद्वितीय हुये हैं। वे अपने उर्दौ ब्रह्मचर्य के प्रभाव से आज भी जनता के अन्ना-भाजन हो रहे हैं। समस्त भारत के आर्य-साहित्य में उन दोनों महावर्षाओं का व्यक्तिगत जीवन हमें अमूल्य शिक्षा प्रदान करता है।
इनमें से पहले ब्रह्मचारी का नाम जगद्विख्यात महावीर हर्यमान है। इनकी कथा रामायण में मिलती है। ये अपने जीवन
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दो आदर्श ब्रह्मचारी
पर्यन्त अलुएण ब्रह्मचारी रहे। इन्होंने अपने ब्रह्मचर्य का यहाँ तक पालन किया कि स्वप्न में भी कभी इनका वीर्य स्वलिप्त न होने पाया। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से इनका शरीर वज्र के समान दृढ़-मुष्ट हो गया था। वे महावीर्य के प्रभाव से कठिन से कठिन कार्य कर सकते थे। इनके ब्रह्मचर्य का उद्देश्य केवल सेवा-कार्य था। इन्होंने वली से वली राक्षसों का मद्द चूर्ण कर डाला। अनुकरणीय स्वामि-भक्ति, असम पराक्रम, तेजस्वी स्वभाव और पवित्र अन्तःकरण के लिये भी ये परम प्रसिद्ध थे। इन गुणों से युक्त होने पर भी, वे बहुत बड़े विद्वान और मेधावी थे। वक्तूत्कला से दूसरों का हृदय अपनी ओर भली भाँति खींचना जानते थे।
एक स्थान पर किंकल्धा-काण्ड में श्रीरामचन्द्र भगवान् ने स्वयं अपने मुख से हनुमान को विद्वत्ता और वाक्-चातुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वह यों है:—
महावली वालि ने अपने भाई सुग्रीव को मार-पीट कर घर से निकाल दिया था। वे ऋष्यमुक्त पर्वत पर जाकर इन्हीं हनुमान के साथ रहने लगे थे। एक दिन श्रीरामजी जानकीजी को खोजते हुये लक्ष्मण के साथ उधर आ निकले। सुग्रीव के मन में सन्देह और भय हुआ। उसने इन्हे रहस्य लेने के लिये भेजा। हनुमान भी विप्ररूप धर कर श्रीराम और लक्ष्मण से मिले। उनके भाषण से प्रसन्न होकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा:—
तमस्यमाप सौमित्रे ! सुग्रीव-सच्चिर् कपिम् । वाक्यम् मधुरैवाक्यैः, स्नेहयुक्तं मरिन्दमम् ॥ नानुग्वेदं विनीतस्य, नाथस्युर्वेदं धारिणः । नासातमेवद-विदुषः, शक्यमेव विभावितुम् ॥
ब्रह्मवर्ध-विज्ञान
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नूनं व्याकरणं कृत्स्नं मनोने बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरत्मानेन, न किञ्चिदपशब्दितम् ॥ न मुखेनेत्रयोश्चापि, ललाटे च ध्रुवोत्तथा । श्रान्येचपि च सर्वेषु, दोषः संपिदितः क्वचित् ॥ अविस्तरं मत्सनिर्गुणं मविलम्बितं मव्ययम् । उत्तर्यं कण्ठगे वाक्यं, वर्तते मध्यमस्वरम् ॥ संस्कार-क्रम-संपन्ना मद्रूता मविलम्बिताम् । उच्चारयति कल्याणीं, चाचं हृदय-हर्पिषीम् ॥
( वाल्मीकि-रामायण )
हे लक्ष्मण ! मधुर वाक्य से स्नेहयुक्त सुभीष के वाणी-विशारद सचिव हनुमान से भाषण कर, यह ज्ञात हुआ कि च्द्रवेद, यजुर्वेद और सामवेद के न जानने वाले इस प्रकार का भाषण नहीं कर सकते । अर्थात् ये वेद-शास्त्रज्ञ जान पड़ते हैं । निश्चय, ही इन्होंने व्याकरण का अच्छा अध्ययन किया है । कारण यह है कि इन्होंने इतना अधिक बोलने पर भी एक अक्षुद्धि नहीं की । मुख में, नेत्रों में और श्रुभाग में तथा अन्य किसी भी अवयव में इनके कहीं भी दोष नहीं दिखाई पड़ा ।
सूक्ष्म राति से, स्पष्ट-स्पष्ट, अखलित श्रुति-मधुर, न तो बहुत धीरे-धीरे और न बहुत जोर-जोर से, अर्थात् मध्यम स्वर में इन्होंने भाषण किया है । सुसंस्कृत नियमयुक्त, अद्भुत प्रकार से, भिन्न तथा हृदय को हर्षित करने वाली वाणी इनके मुख से उच्चरित हुई है ।
अब हम इनकी दृढ़ प्रतिज्ञता तथा पराक्रम-शीलता का परिचय इन्हीं के कहे हुये वाक्यों से कराते हैं:—