भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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योग और अद्भुतचर्य

चित्त-वृत्तियों अपने अधिकार में नहीं हो जातीं, तब तक लाख उपाय करने पर भी रोके नहीं रुक सकतीं। चित्त-वृत्तियों को अधिकार में करने के लिये, मन की साधना की जाती है। यह मन की साधना बिना अद्भुतचर्य के हो नहीं सकती। यही कारण है कि योग करने के पहले, अद्भुतचर्य-व्रत का पालन करना पड़ता है। जिसका अद्भुतचर्य स्थिर नहीं, वह पुरुष योग-व्रत होकर अपने ध्युत्थान से गिर जाता है। एक अद्भुतचर्य पुरुष में ही चित्त-वृत्ति को रोकने की शक्ति रह सकती है।

योग का उद्देश्य आत्मा और परमात्मा को प्राप्त करना है। उपनिषदों में आत्मा और परमात्मा में लीन होने के उपायों का वर्णन है। प्रमाण के लिये एक मन्त्र उद्धृत किया जाता है।—

सत्येन सत्यस्त्वत्सा शेष आत्मा ।

सत्यग्वानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ॥

अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि ध्रुवो ।

संश्रयन्ति यतयः क्षीणं शोबाः ॥

सत्य से, तप से, पूर्ण ज्ञान से और अविचल अद्भुतचर्य से आत्मा ( ईश्वर ) का लाभ हो सकता है। वह अन्तःकरण में श्रियोतिर्मय और निर्मल रूप से विराजमान है। जो लोग सिद्ध और निष्पाप हैं, वे ही उसके दर्शन कर सकते हैं।

हमारे विचार से सत्य, तप और आत्मज्ञान सब योग से ही सिद्ध होते हैं। वह योग भी अद्भुतचर्य पर स्थित है। इसलिये अद्भुतचर्य ही सच्चा योग है। इसका निभाने वाला पुरुष ही कर्मनिष्ठ योगी है। जिस चित्त-वृत्ति निरोध से योग सिद्ध होता है, उसी से अद्भुतचर्य का भी पालन किया जाता है।