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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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योग और अद्भुतचर्य

चित्त-वृत्तियों अपने अधिकार में नहीं हो जातीं, तब तक लाख उपाय करने पर भी रोके नहीं रुक सकतीं। चित्त-वृत्तियों को अधिकार में करने के लिये, मन की साधना की जाती है। यह मन की साधना बिना अद्भुतचर्य के हो नहीं सकती। यही कारण है कि योग करने के पहले, अद्भुतचर्य-व्रत का पालन करना पड़ता है। जिसका अद्भुतचर्य स्थिर नहीं, वह पुरुष योग-व्रत होकर अपने ध्युत्थान से गिर जाता है। एक अद्भुतचर्य पुरुष में ही चित्त-वृत्ति को रोकने की शक्ति रह सकती है।

योग का उद्देश्य आत्मा और परमात्मा को प्राप्त करना है। उपनिषदों में आत्मा और परमात्मा में लीन होने के उपायों का वर्णन है। प्रमाण के लिये एक मन्त्र उद्धृत किया जाता है।—

सत्येन सत्यस्त्वत्सा शेष आत्मा ।

सत्यग्वानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ॥

अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि ध्रुवो ।

संश्रयन्ति यतयः क्षीणं शोबाः ॥

सत्य से, तप से, पूर्ण ज्ञान से और अविचल अद्भुतचर्य से आत्मा ( ईश्वर ) का लाभ हो सकता है। वह अन्तःकरण में श्रियोतिर्मय और निर्मल रूप से विराजमान है। जो लोग सिद्ध और निष्पाप हैं, वे ही उसके दर्शन कर सकते हैं।

हमारे विचार से सत्य, तप और आत्मज्ञान सब योग से ही सिद्ध होते हैं। वह योग भी अद्भुतचर्य पर स्थित है। इसलिये अद्भुतचर्य ही सच्चा योग है। इसका निभाने वाला पुरुष ही कर्मनिष्ठ योगी है। जिस चित्त-वृत्ति निरोध से योग सिद्ध होता है, उसी से अद्भुतचर्य का भी पालन किया जाता है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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योग-शास्त्र में योग के साधने की तीन कियायें या साधन इस प्रकार वतलाये गये हैं:—

“तपः स्वाध्यायेश्चर-प्रणिधानानि क्रिया-योगः ।”

तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान को क्रिया-योग कहते हैं। हमारे ब्रह्मचर्य में भी, ये तीनों कियायें प्रधानरूप से विद्यमान हैं। जिन भाठ अंगों से योग सिद्ध होता है, उन्हीं के पालन से ब्रह्मचर्य को भी पूर्णता प्राप्त होती है।

अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य एक प्रकार से योग भी है। जिसने ब्रह्मचर्य का पालन किया, उसने योग-साधन भी कर लिया।

१३—सत्य और ब्रह्मचर्य

सत्येन धार्यते पृथ्वी, सत्येन तपते रविः।

सत्येन वातिवायुश्च, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥

सत्य से पृथिवी ठहरी हुई है, सत्य से सूर्य अपना प्रकाश करता है और सत्य से ही वायु चलती है। एक सत्य में सब कुछ प्रतिष्ठित है।

वास्तव में संसार का वीजरूप एक सत्य ही है। सभी पदार्थों में सत्य विराजमान है। जहाँ वह नहीं है, वहाँ कुछ भी नहीं रह सकता। जिस पदार्थ का सत्य नष्ट हो जाता है, वह स्वयं भी नाश को प्राप्त होता है। सत्य का ही दूसरा नाम अस्तित्व है।

इस शरीर का सत्य बल है—इसके भीतर रहने वाले आत्मा का सत्य ब्रह्मचर्य है। बल के न रहने पर शरीर और ब्रह्मचर्य

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सत्य और ब्रह्मचर्य

से हीन होने पर आत्मा का अस्तित्व नहीं रह सकता । जैसा कि उपनिषदों में लिखा है:—

सत्य मेव जयते नाशुतम् । सत्येन पन्थावित्तो देवयानः ॥ येनाक्रमन्तृषयो ह्यासकामा । यत्र तत्सत्यस्य परमनिधानम् ॥

सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं ! सत्य से ही देवों का मार्ग मिलता है । ऋषि लोग भी सत्य के प्रभाव से सफल होते हैं, जहाँ सत्य की सत्ता है, वहाँ सब सुख है ।

हमारे विचार से जिस सत्य का वर्णन ऊपर आया है, वह यही ब्रह्मचर्य है । जो पुरुष ब्रह्मचर्य का नाश करता है, वह अपने को सत्य से प्रत्यक् करता है । इसके पालन से मनुष्य सत्य को अधिकार में कर लेता है, और वह सत्य उस को सुखी बनाता है ।

हमारे भीष्म पितामह ने ब्रह्मचर्य को सत्य शब्द से अभिहित किया है । अपनी प्रसिद्धा की दृढ़ता प्रकट करने के लिये, उन्होंने सत्य का ही नाम लेकर, ब्रह्मचर्य को महत्व दिया है ।

विक्रमं वृजहा जहाद्भर्म जहाच्च धर्मराज । नत्वहं सत्यमुत्पृङ्, व्यवसेयं कथञ्चन ॥

(महाभारत)

चाहे इन्द्र अपने पराक्रम को छोड़ दें, और धर्मराज अपने धर्म को छोड़ दें, पर जिस सत्य (ब्रह्मचर्य) को मैंने धारण किया है, उसे कदापि नहीं छोड़ सकता ।

ब्रह्मचर्य-विधान

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अब पाठक सत्य और ब्रह्मचर्य की एकता और रहस्य को समझ गये होंगे ।

भिस पुरुष के हृदय में सत्य की कुछ भी प्रतिष्ठा है—जो सत्य का पालन करना चाहता है, वह इस ब्रह्मचर्य रूपी सत्य का पालन कर सद्गति को प्राप्त हो ।

१४—कर्तव्य और ब्रह्मचर्य

“जयं प्राप्नोति संज्ञामे, यः सुकार्याण्यनुष्ठते ।”

( विदुरनीति )

सर्कतव्यों का पालन करने वाला ही पुरुष संज्ञाम में विजय-लाम करता है ।

कर्तव्य मेव कर्तव्यं, प्राप्तेः कण्ठगतेरपि ।

अकर्तव्यं न कर्तव्यं, प्राप्तेः कण्ठगतेरपि ॥

( नीति-शास्त्र )

अपने कर्तव्य का पालन प्राणों के निकलने तक करना चाहिये ! पर जिसे हम अकर्तव्य समझते हैं, उसे प्राणों के जाने पर भी करना योग्य नहीं ।

कर्तव्य से ही समाज की स्थिति है—कर्तव्य से ही दोषों का नाश होता है—कर्तव्य के पालन से ही मनुष्य को सुख-शान्ति मिल सकती है, और कर्तव्य ही सब का सार है । कर्तव्य से हीन होने पर कदापि सुख नहीं मिलता । अकर्तव्य के समान पाप भी नहीं ।

हम ब्रह्मचर्य को ही सब कर्तव्यों का कर्तव्य मानते हैं ।

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कर्तव्य और ब्रह्मचर्य

संसार के सारे कर्तव्य एक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता रखते हैं। ब्रह्मचर्य के बिना एक भी कर्तव्य नहीं हो सकता !

“कर्तव्य सर्व-साधकम् ।”

( सूक्ति )

कर्तव्य ही मनुष्य के सब कार्यों को साधने वाला है । हमारा ब्रह्मचर्य भी सब का साधने वाला सिद्ध हो चुका है । अतएव वह पूर्ण रूप से कर्तव्य कहा जा सकता है । इस कर्तव्य के सामने विश्व के सभी कर्तव्य मूक हो जाते हैं । इस ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष ही सब कर्तव्यशील है, और वह सब सुखों को सहज में प्राप्त कर लेता है ।

वैश्वीर्योपनिषद् में आचार्य-द्वारा कर्तव्य की बहुत ही उत्तम परिभाषा की गई है, और उसी वचन में कर्तव्य-पालन की आह्वा भी ब्रह्मचारी को दी है । उसे हम यहाँ उद्धृत करते हैं :—

“यान्यनवधानिकर्माणि तानि सेवितव्यानि, नो इत्पाणि ।” ( उपनिषत् )

जो निर्दोष कर्म हैं, वे ही कर्तव्य हैं । अकर्तव्य का सेवन करना योग्य नहीं वरन् मूर्खता है ।

इस से यह विदित होता है कि जिसने दोष-रहित कर्म हैं, सब की गणना कर्तव्य में है । उनका पालन करना शास्त्र-सङ्गत है । वे सभी कर्तव्य ब्रह्मचर्य के बिना नहीं सध सकते । अतः इस प्रकार वे भी ब्रह्मचर्य सब कर्तव्यों का मूल है ।

अब पाठक भलीभाँति समझ गये होंगे कि ‘ब्रह्मचर्य’ ही श्रेष्ठ कर्तव्य है, अतएव जिसे कर्तव्य का पालन करना हो, वह ब्रह्मचर्य का पालन करे ।

ब्रह्मचर्य-चिन्तन

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१५— यम-नियम और ब्रह्मचर्य

“अहिंसा सत्यस्तेय-ब्रह्मचर्यापरिग्रहो यमाः ।”

( योगदर्शन )

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—ये पाँच यम कहलाते हैं ।

मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न देने का नाम ‘अहिंसा’ है । जैसा कुछ देखा-सुना और जो मन में हो, उसे उसी रूप में कहने को ‘सत्य’ कहते हैं । पराये धन का लोभ न करना ‘अस्तेय’ है । उपस्थित्व का संयम तथा वीर्य-रक्षा का नाम ‘ब्रह्मचर्य’ और शरीर-यात्रा के निर्वाह से अधिक भोग-सामग्री का एकत्र न करना ‘अपरिग्रह’ कहलाता है ।

अब हम महर्षि पतञ्जलि के कहे हुये यमों के लाभों का वर्णन करते हैं । वे इस प्रकार हैं—

“अहिंसा-प्रतिष्ठायां तत्त्वनिधौ वैर-त्यागः ।”

( योगदर्शन )

‘अहिंसा’ के पालन से वैर-भाव का त्याग होता है । अर्थात् सब जीवों पर दया करने से वे भी प्रेम करते हैं ।

“सत्य-प्रतिष्ठायां क्रिया-फलाश्रयत्वम् ।”

( योगदर्शन )

‘सत्य’ के पालन से सभी कार्य सिद्ध होते हैं । वचन के प्रभाव से दूसरों तथा अपने को सुख मिलता है ।

“अस्तेय-प्रतिष्ठायां सर्व-रक्षोपस्थानम् ।”

( योगदर्शन )

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यम-नियम और ब्रह्मचर्य

‘अस्तेय’ के पालन से सब कुछ स्वयं प्राप्त हो जाता है। अभि- प्राय यह है कि वह सब का विश्वासपात्र बनता है।

“ब्रह्मचर्य-प्रतिष्ठायां वीर्य-लाभः।”

(योगदर्शन )

‘ब्रह्मचर्य’ का पालन करते से वीर्य का लाभ होता है। अर्थात् उसे शारीरिक और मानसिक बल की प्राप्ति होती है।

“अपरिग्रहस्यैवं जन्मकथन्तासन्तोषः।”

(योगदर्शन )

‘अपरिग्रह’ के पालन से जन्म-सुधार के विचार उत्पन्न होते हैं। हृदय में निस्वार्थता का भाव वृद्धि होता है।

महर्षि पतञ्जलि ने इन पाँचों यमों को अकाङ्क्ष तथा सार्व- भौम महाव्रत माना है। अर्थात् इनका पालन सब जाति, सब देश, सब समय और सब अवस्था में किया जा सकता है।

अब हम उनके योगदर्शन में लिखे हुये नियमों का आवश्यक वर्णन करते हैं:—

“शौच-सन्तोष-तपः-स्वाध्यायेश्वर-प्रणिधानानि नियमाः।”

(योगदर्शन )

शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—ये पाँच नियम कहलाते हैं।

शारीरिक और मानसिक पवित्रता का नाम ‘शौच’ है। भोग के साधनों को अनिच्छा का नाम ‘सन्तोष’ है। सुख-दुःख, शीत- उष्णदि द्रव्य सहने, तथा परिमित आहार-विहार करने का नाम ‘तप’ । ओङ्कारादि जप और वेद-शास्त्रों के अध्ययन का नाम ‘स्वा-

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ध्याय' है, और फल-रहित हो, परमात्मा की उपासना का नाम 'हैश्वर-प्रणिधान' है।

अब नियम के पालन से जो फल प्राप्त होते हैं, उन्हें भी एक एक कर कहते हैं:—

“शौचस्त्वाङ्गं जुगुप्सा परैरेसंसर्गः।”

“सत्त्वशुद्धि सौमनस्यैकाग्र्येन्द्रिय ज्ञायात्मदर्शनयोग्यत्वधानिच्च।”

( योगदर्शन )

बाह्य 'शौच' से शरीर का मोह और पराये के साथ सम्बन्ध की इच्छा नहीं रहती। 'आभ्यन्तर' शौच से मन की शुद्धि, प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रिय-जय और आत्म-दर्शन की योग्यता प्राप्त होती है।

“सन्तोषादुत्तुलम सुखलाभः।”

( योगदर्शन )

'सन्तोष' की साधना से परम सुख मिलता है। छुपना का नाश होने से मन की अशान्ति दूर हो जाती है।

“कायेन्द्रिय शुद्धिरशुद्धि ज्ञायासपसः।”

( योगदर्शन )

'वप' की साधना से सुन्दर स्वाध्याय और इन्द्रियों पर अधिन्कार प्राप्त होता है

“स्वाध्यायादिष्ट देवता संप्रयोगः।”

( योगदर्शन )

'स्वाध्याय' करने से इष्ट-साधन और आत्म-ज्ञान की उपलब्धि होती है।

“समाधि-सिद्धिरीश्वर-प्रणिधानात्।”

( योगदर्शन )

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यम-नियम और ब्रह्मचर्य

‘ईश्वर-प्रणिधान’ से समाधि ( अत्यन्त शान्ति ) मिलती है । आत्मा या परमात्मा में लीन होने पर कोई सुख फिर शेष नहीं रहता । यह सर्व-सम्मत सिद्धान्त है ।

यद्यपि यम और नियम योग के अङ्ग हैं, तथापि ये ‘ब्रह्मचर्य’ के भी प्रधान अवयव हैं । ब्रह्मचर्य की दशा में प्रत्येक ब्रह्मचारी को पाँच यमों और पाँच नियमों का पालन नितान्त आवश्यक है । विना इनके ब्रह्मचर्य की कदापि सिद्धि नहीं हो सकती है ।

धर्माचार्य मनु ने भी यम और नियमों के सम्बन्ध में अपनी ऐसी ही सम्मति प्रकट की है:—

यमान्सेवत सतर्त, न नित्यं नियमान्बुधः ।

यमान्यतत्यकुर्वीणो, नियमान्क्रेवलान्मज्जन ॥

( मनुस्मृति ) बुद्धिसान् सदैव यमों का सेवन करे, नियमों का पालन नित्य न भी करे, क्योंकि यमों का न पालन करने वाला मनुष्य केवल नियमों का पालन करता हुआ भी पतित हो जाता है ।

अभिप्राय यह है कि अहिंसा सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन न करने वाला पुरुष—शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान करते रहने पर भी कार्य में असफल होता है । अतएव यम और नियम दोनों की समान रूप से प्रतिष्ठा करनी चाहिये । कारण यह है कि ब्रह्मचर्य के ये दोनों आवश्यक अङ्ग हैं, या यों समझिये कि ब्रह्मचर्य रूपी आत्मा इन्हीं यम-नियमों से बने हुये शरीर में वास करता है ।

अब तो हमारे पाठक यम-नियम तथा ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध भली भाँति समझ गये होंगे ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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१७—यज्ञ और ब्रह्मचर्य

“यज्ञाद्भवति पर्जन्यः, पर्जन्यादन्तस्त्वभवः ।”

( मनुस्मृति )

यज्ञ से मेघ की उत्पत्ति होती है, और मेघ से अन्न पैदा होता है । और अन्न से सब जीते हैं ।

यज्ञ की महिमा वेदों में विविध प्रकार से गाई गई है । जिसके द्वारा (परमात्मा) ज्ञाना जाय, ज्ञानी उसे 'यज्ञ' कहते हैं । यही कारण है कि उपनिषदों में ब्रह्मचर्य का यज्ञ-रूप से वर्णन किया गया है ।

अथ यद्यद्य इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यं मेघ । तद् ब्रह्मचर्येण खेव यो ज्ञाता, तं विन्दुतेऽथ यद्विदमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यं मेघतद् ब्रह्मचर्येण खेवे । (ऽऽत्मानमनुविन्दुते ।

( छान्दोग्योपनिषद् )

जिसे 'यज्ञ' कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । उस ब्रह्मचर्य का जानने वाला ब्रह्म को प्राप्त होता है । जिसको 'विन्दु' कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है । ब्रह्मचर्य द्वारा यजन करके ही पुरुष ब्रह्म को पाता है ।

“लोग जिसे 'सात्रायण' यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही अभिनाशी जीव की रक्षा होती है । जिसे 'भीन' कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही परमात्मा का भजन किया जा सकता है । जिसे 'अनशनायन' कहा गया है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से प्राप्त किया हुआ आत्मभाव नष्ट नहीं होता । जिसे 'अरण्यायन' कहते हैं, वह

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यज्ञ और ब्रह्मचर्य

भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा (कर्मकाण्ड और ज्ञान-काण्ड का फल) ब्रह्मपुरी मिलती है । जो पुरुष इस ब्रह्मचर्यरूपी यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, वे अग्नि-स्वरूप होकर अपने तथा औरों के पापों को भी तृण की भाँति भस्म कर देते हैं ।”

एक स्थान पर ब्रह्मचर्य को यज्ञ मान कर ब्रह्मचारी को यज्ञकर्त्ता माना गया है । यज्ञ के प्रधान-प्रधान अङ्ग, ब्रह्मचारी के कार्यों पर, रूपकालङ्कार में, घटाये गये हैं । इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचर्य की अवस्था ही यज्ञ है । ब्रह्मचारी को यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं, उसे तो यों ही यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

महर्षि अङ्गिरा के पुत्र चोरनामा ऋषि ने देवकी के पुत्र श्री कृष्ण से अध्ययन के समय कहा कि ब्रह्मचारी के लिये विशेष कर्म नहीं हैं । उसे मरणकाल में चाहिये कि इस प्रकार कह कर मुक्त हो जायः—

हे परमात्मन् ! आप ‘श्रुतिनाशी’ हैं । हे देव ! आप ‘पक्करस’ रहने वाले हैं, और आप ही ‘जीवनदाता तथा श्रुतिसुन्दरम्’ हैं । वस, इतने से ही उसकी सन्तुति हो जायगी । इसका अभिप्राय यह है । कि यही उसके लिये अन्तिम यज्ञ है । इसलिये इस उपदेश को सुन कर श्री कृष्ण भी अन्य विचारों को छोड़ कर परमात्मपरायण हो गये । अब यह बात भी सिद्ध हो गई कि ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ यज्ञ भी है । और ब्रह्मचारी ही यज्ञ कर्त्ता है ।

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१८—दो आदर्श ब्रह्मचारी

‘ब्रह्मचारी सिद्धति सानौ रेतः। पृथिव्यां तेनजावन्ति प्रदि शश्वतत्तः।’

(अथर्ववेद)

ब्रह्मचारी अपने सद्वृत्तान्त, पराक्रम, सिद्धान्त, सदाचार तथा उत्तम गुणों को, वक्के-छोटे का विचार न कर, सब में फैलाता है। इससे चारों ओर की जनता में तब-जीवन का सञ्चार होता है।

हमारे पाठक इस बात को भली भाँति समझ चुके हैं कि ब्रह्मचर्य जैसे उच्च तथा सर्वोपकारी विज्ञान का पहले पहल इसी देश में आविष्कार हुआ था। यही कारण है कि अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ इसका सुधार और प्रचार विशेष रूप से हुआ।

हमारे मत से भूमण्डल के इतिहास में जितने अधिक उदाहरण ब्रह्मचर्य के यहाँ मिल सकते हैं, उतने और कहीं मिलने सम्भव नहीं।

इस देश में अनेक पुरुषों ने ब्रह्मचर्य-पालन की चेष्टा की है। उनमें से कुछ लोग अपने व्रत से विंचलित भी हो गये। बहुतांश का सफलता भी मिला, पर हम उन दो आदर्श ब्रह्मचारियों का परिचय करा देना चाहते हैं, जो वास्तव में अद्वितीय हुये हैं। वे अपने उर्दौ ब्रह्मचर्य के प्रभाव से आज भी जनता के अन्ना-भाजन हो रहे हैं। समस्त भारत के आर्य-साहित्य में उन दोनों महावर्षाओं का व्यक्तिगत जीवन हमें अमूल्य शिक्षा प्रदान करता है।

इनमें से पहले ब्रह्मचारी का नाम जगद्विख्यात महावीर हर्यमान है। इनकी कथा रामायण में मिलती है। ये अपने जीवन

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दो आदर्श ब्रह्मचारी

पर्यन्त अलुएण ब्रह्मचारी रहे। इन्होंने अपने ब्रह्मचर्य का यहाँ तक पालन किया कि स्वप्न में भी कभी इनका वीर्य स्वलिप्त न होने पाया। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से इनका शरीर वज्र के समान दृढ़-मुष्ट हो गया था। वे महावीर्य के प्रभाव से कठिन से कठिन कार्य कर सकते थे। इनके ब्रह्मचर्य का उद्देश्य केवल सेवा-कार्य था। इन्होंने वली से वली राक्षसों का मद्द चूर्ण कर डाला। अनुकरणीय स्वामि-भक्ति, असम पराक्रम, तेजस्वी स्वभाव और पवित्र अन्तःकरण के लिये भी ये परम प्रसिद्ध थे। इन गुणों से युक्त होने पर भी, वे बहुत बड़े विद्वान और मेधावी थे। वक्तूत्कला से दूसरों का हृदय अपनी ओर भली भाँति खींचना जानते थे।

एक स्थान पर किंकल्धा-काण्ड में श्रीरामचन्द्र भगवान् ने स्वयं अपने मुख से हनुमान को विद्वत्ता और वाक्-चातुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वह यों है:—

महावली वालि ने अपने भाई सुग्रीव को मार-पीट कर घर से निकाल दिया था। वे ऋष्यमुक्त पर्वत पर जाकर इन्हीं हनुमान के साथ रहने लगे थे। एक दिन श्रीरामजी जानकीजी को खोजते हुये लक्ष्मण के साथ उधर आ निकले। सुग्रीव के मन में सन्देह और भय हुआ। उसने इन्हे रहस्य लेने के लिये भेजा। हनुमान भी विप्ररूप धर कर श्रीराम और लक्ष्मण से मिले। उनके भाषण से प्रसन्न होकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा:—

तमस्यमाप सौमित्रे ! सुग्रीव-सच्चिर् कपिम् । वाक्यम् मधुरैवाक्यैः, स्नेहयुक्तं मरिन्दमम् ॥ नानुग्वेदं विनीतस्य, नाथस्युर्वेदं धारिणः । नासातमेवद-विदुषः, शक्यमेव विभावितुम् ॥

ब्रह्मवर्ध-विज्ञान

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नूनं व्याकरणं कृत्स्नं मनोने बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरत्मानेन, न किञ्चिदपशब्दितम् ॥ न मुखेनेत्रयोश्चापि, ललाटे च ध्रुवोत्तथा । श्रान्येचपि च सर्वेषु, दोषः संपिदितः क्वचित् ॥ अविस्तरं मत्सनिर्गुणं मविलम्बितं मव्ययम् । उत्तर्यं कण्ठगे वाक्यं, वर्तते मध्यमस्वरम् ॥ संस्कार-क्रम-संपन्ना मद्रूता मविलम्बिताम् । उच्चारयति कल्याणीं, चाचं हृदय-हर्पिषीम् ॥

( वाल्मीकि-रामायण )

हे लक्ष्मण ! मधुर वाक्य से स्नेहयुक्त सुभीष के वाणी-विशारद सचिव हनुमान से भाषण कर, यह ज्ञात हुआ कि च्द्रवेद, यजुर्वेद और सामवेद के न जानने वाले इस प्रकार का भाषण नहीं कर सकते । अर्थात् ये वेद-शास्त्रज्ञ जान पड़ते हैं । निश्चय, ही इन्होंने व्याकरण का अच्छा अध्ययन किया है । कारण यह है कि इन्होंने इतना अधिक बोलने पर भी एक अक्षुद्धि नहीं की । मुख में, नेत्रों में और श्रुभाग में तथा अन्य किसी भी अवयव में इनके कहीं भी दोष नहीं दिखाई पड़ा ।

सूक्ष्म राति से, स्पष्ट-स्पष्ट, अखलित श्रुति-मधुर, न तो बहुत धीरे-धीरे और न बहुत जोर-जोर से, अर्थात् मध्यम स्वर में इन्होंने भाषण किया है । सुसंस्कृत नियमयुक्त, अद्भुत प्रकार से, भिन्न तथा हृदय को हर्षित करने वाली वाणी इनके मुख से उच्चरित हुई है ।

अब हम इनकी दृढ़ प्रतिज्ञता तथा पराक्रम-शीलता का परिचय इन्हीं के कहे हुये वाक्यों से कराते हैं:—

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दो आदरी ब्रह्मचारी

श्रीजानकी को खोजते हुये वानर लोग समुद्र-तीर पर पहुँचे । सबों ने समुद्र लाँघने के लिये अपने-अपने बल का बणन किया । जान्चवन्त ने देखा कि यिना हनुमान के काम न चलेगा । अतः उन्होंने उन्हें उत्कर्ष-वचनों द्वारा उत्साहित किया । इस पर हनुमान ने उत्तेजित होकर वानरी-सेना को इस प्रकार सन्तुष्ट किया:—

यथा राघव-निर्मुक्तः, शरः श्वसन-चिकमः । गच्छेत्सहस्रगमिष्यामि, लङ्कां रावणपालिताम् ॥ नहि द्रव्यामि यदितो, लङ्कायां जनकाम्बजाम् । श्रमेनैव हि वेगेन, गमिष्यामि छुरालयम् ॥ यद्विवात्रिदिषे स्तीर्ता, न द्रव्यामि कृतश्रमः ॥ यदृश्या राक्षस-राजान मानयिष्यामि रावणम् ॥ सर्वथा कृत कार्योऽह मेऽप्यामि सह सीतया । ज्ञानयिष्यामि वालङ्कां, समुत्पाद्य सरावणम् ॥

( वाल्मीकि रामायण )

जिस प्रकार श्रीरामचन्द्र का चलाया हुआ बाण सन-सन करता हुआ जाता है, उसी भाँति मैं रावण के द्वारा रक्षा की गई लङ्कापुरी में जाऊँगा । यदि मैं उस लङ्का में जानकी को न देखूँगा, तो उसी वेग से स्वर्ग में चला जाऊँगा । यदि मैं इतना परिश्रम करने पर भी त्रिलोक में सीता को न पा सकूँगा, तो मैं राक्षसों के राजा रावण को बाँध कर यहाँ ले आऊँगा, या तो मैं कृतकार्य होकर सीता के साथ आऊँगा, या लङ्का को भली भाँति नष्ट-भ्रष्ट करके रावण को साथ पकड़ ले आऊँगा ।

पाठकों ने एक आदरी ब्रह्मचारी का परिचय पा लिया । इनकी वाणी में कैसा तेज है ? अब हम दूसरे का परिचय कराते हैं ।

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दूसरे ब्रह्मचारी का नाम भीष्म पितामह है। महाभारत के चरित-नायकों में ये प्रधान माने जाते हैं। इनका परम स्वारूप-त्याग उद्यम-धर्म-नीतिज्ञता, अद्भुत पराक्रम, शस्त्रास्त्र चलाने में निपुणता, युद्ध-कौशल, विपुल पाण्डित्य तथा उदार चरित्र प्रायः सब पर अवस्थात है।

ये भी बाल-ब्रह्मचारी थे। पहले इनका नाम 'देवव्रत' था, पर जब से इन्होंने अपने पिता के विवाह के लिये ब्रह्मचर्य की कठिन प्रतिज्ञा की, तब से लोग इन्हें 'भीष्म' कहने लगे।

इस महापुरुष के उन्नत व्यक्तित्व के सम्बन्ध में एक बहुत ही प्रचलित उक्त्य श्लोक है, उसे हम यहाँ देते हैं:—

भीष्मः सर्वं गुणोपेतः; ब्रह्मचारी दृढव्रतः। लोक-विश्रुत कीर्तिश्च, सख्यमर्गभूम्याहमतिः ॥

(दृष्टि)

भीष्म सर्व गुण-सम्पन्न, ब्रह्मचारी, दृढव्रती, धर्म के पालन करनेवाले, बुद्धिमान और संसार में बड़े यशस्वी पुरुष थे।

भीष्म की विमता ने वंश-विच्छेद होता हुआ देख कर, इनको विवाह कर लेने की आज्ञा दी। महर्षि व्यास ने भी ब्रह्मचर्य छोड़ कर, विवाह करने के लिये, बहुत प्रकार से समझाया। बहुत से लोगों ने इन्हें अपनी प्रतिज्ञा छोड़ने के लिये आग्रह किया, पर इस मनस्सा ने अपना प्रयत्न नहीं छोड़ा। जब सब लोग समझा कर हार गये, तब इन्होंने अन्त में अपने विचार की अटलता जिन ओजस्वी भावों में प्रकट किया, उन्हें यहाँ उद्धृत करते हैं:—

त्यजेच्छ पृथ्वी गन्धमापश्चरस मालमनः— व्योतिस्तथा त्यजेद्भूषं, वायुःस्पर्शगुणव्यजेत् ॥

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दो आदर्श ब्रह्मचारी

विक्रमं वृत्रहाजद्यादमै जहान्मच्च धर्मराट् । नत्वंहं सत्यमुत्तपट्टुं, व्ययसेयं कथञ्जन ॥

(महाभारत)

चाहे भूमि आपना गुण गन्ध छोड़ दे । जल अपना तरलत्व त्याग दे—सुय अपना तेज छोड़ दे—वायु अपना स्पर्श त्याग दे, इन्द्र पराक्रम रहित हो जाय, और धर्मराज धर्म से विमुख होकर रहें, पर मैं जिस ब्रह्मचर्य रूपी सत्य को, धारण कर चुका हूँ, उसे कदापि नहीं छोड़ सकता । इससे बढ़कर और क्या एक सत्य-शील ब्रह्मचारी कह सकता है !

ऊपर के दो आदर्श ब्रह्मचारियों के चरित्र से परम सुख देने वाले 'ब्रह्मचर्य' की महिमा भली भाँति प्रकट होती है । उनके समान यदि एक भी ब्रह्मचारी इस देश में हो जाय, तो उद्धार होने में रक्ष-मात्र सन्देह नहीं ।

अखण्ड ब्रह्मचर्य के पालन करने से ही हनुमान की वर-घर मूर्तियाँ स्थापित कर, पूजन होता है ।

इसी व्रत में सफल होने के कारण श्रीसीताजी के स्नेह-पात्र हुये और उन्हें यह आशीर्वाद मिला—

अजर-अमर गुणनिधि सुत होइ ।

करहि सदा रघुनायक छोइ ॥

(रामचरित मानस)

इसी सर्वोत्तम गुण के कारण श्रीरामचन्द्र जी श्रीमत् के समान श्रेष्ठ मानते रहे । और इसी के एक मात्र कारण से वे 'महावीर' पदवी से विभूषित हुये ।

अचल ब्रह्मचर्य के कारण ही भीष्म का नाम तर्पण में लिया जाता है ।

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इसी के कारण वे इच्छा मरणीयुही और महाभारत के रणक्षेत्र में कोई भी उनका सामना न कर सका ।

अतएव महल की इच्छा रखने वाले पुरुषों को चाहिये कि इन दोनों सत्पुरुषों का अनुकरण कर, अपने को वैसा ही बनायें ।

१६---ब्रह्मचर्य के दो बड़े आचार्य

“आचार्यों ब्रह्मचर्येण, ब्रह्मचारिण निष्ठुते ।”

( भयर्वेद )

आचार्य अपने ब्रह्मचर्य के चल से ब्रह्मचारियों का हित करता है । अर्थात् योग्य बनाता है ।

‘आचार्यः परमः पिता ।’

( सूक्ति )

धार्मिक दृष्टि से आचार्य भी विद्यार्थी का परम पिता होता है ।

प्राचीन समय में ब्रह्मचर्य के अनेक आचार्य हो गये हैं । देव लोग तो ब्रह्मचर्य-श्रव के लिये प्रधान ही माने जाते थे, पर असुर लोग भी विद्वानों की कृपा से, इस महाश्रव का माहात्म्य जानते थे । आचार्यों का यही काम था कि वे स्वयं ब्रह्मचर्य के लिये दृढ़ सङ्कल्प रहते थे और अपने शिष्यों को भी इसका पाठ पढ़ा देते थे । इनमें महादेव भगवान् शङ्कर और दानव-गुरु शुक्र बहुत बड़े थे । अतएव हम इन दोनों के विषय में प्रथक्-प्रथक् वर्णन करते हैं ।

भगवान् शङ्कर परम योगी थे । ये ‘ब्रह्मचर्य’ के अधिष्ठाता

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महाचर्य के दो बड़े श्राचार्य

और शिक्क थे । सुर और असुर इनकी प्रसन्नता के लिये, और वर-दान प्राप्त करने की इच्छा से महाचर्य-व्रत का पालन करते, और वाञ्छित वर पाते थे ।

एक बार की बात है कि ये अपने महाचर्य-व्रत की दृढ़ता के लिये तपस्या कर रहे थे । इन्द्र ने कामदेव को इनके पास तपो-भङ्ग करने के लिये भेजा । वे भी कैलास में पहुँच कर, एक दृष्टि की ओट से अपना बाण, शङ्कर पर चलाये लगे । उनके मन में क्षोभ उत्पन्न हुआ । वे अपने योग-वल से इसका कारण समझ गये । उन्हें कामदेव के कपट-व्यवहार पर अत्यन्त क्रोध हुआ, और उन्होंने अपना प्रलयङ्कारी रूक्षीय नेत्र खोल दिया । इस घटना का उल्लेख महाकवि कालिदास ने बड़े ही उत्कर्ष-वर्द्धक प्रकार से 'कुमार-सम्भव' में किया है । उसे हम यहाँ देते हैं :—

क्रोधं प्रभो ! संहर संहरति ।

याचद् गिरा खे मरुतां चरन्ति ।

तावत्स्रं वक्षि भिष-नेष-जन्मा ।

भस्मावशेषं मदन स्त्रकार ॥

हे प्रभो ! अपने क्रोध को शान्त कीजिये ! शान्त कीजिये ! जब तक, ये शब्द आकाश-पथ में उँले, तब तक तो शिव के अप्र नेत्र से उत्पन्न—उस अग्नि ने, कामदेव को जला कर भस्म कर डाला, और हाहाकार मच गया । यह तो हुई एक कान्यमयी पौराणिक कथा । अब इसका आध्यात्मिक रहस्य भी सुनिये ! यह जानने ही योग्य है :—

मनुष्य का शरीर ही कैलास है । उसमें योगयुक्त रहने वाला वीर्यमय जीव ही 'शङ्कर' है । मनो-विकार ही 'कामदेव' है

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और विवेक ही दोष-नाराक 'तीसरा नेत्र'। ब्रह्मचर्य की अवस्था में मनो-विकार उसका अद्युष्टान भङ्ग करता चाहता है, परन्तु जब वह अपनी विवेक-दृष्टि से देखता है, तो यह उसकी काम-दासना तरङ्गण नष्ट हो जाती है।

प्राचीन समय में शुक्राचार्य नाम के एक असुरों के गुह्य थे। वे वीर्य-रक्षा के लिये अनेक उपाय बताते थे। एक बार उनकी शिष्यों को प्रहण कर दानव लोग बड़े वशित हो गये थे। अब तो उनसे देव लोग भी भय-भीत होने लगे। कहा जाता है कि इन आचार्य के पास 'सखीवनी' नाम की एक विद्या थी, जिससे ये सूतक को भी जीवित कर सकते थे। इसीलिये देवों ने अपने 'कच' नामक एक व्यक्ति को उनके पास यह अमौघ ज्ञान प्राप्त करने के लिये भेजा। शुक्राचार्य के प्रताप से इनको भी वह विद्या आ गई। यह सखीवनी-विद्या क्या था, जिसे कि केवल कच ने बड़े परिश्रम-द्वारा प्राप्त किया? वीर्य-रक्षा की प्रकाण्ड प्रणाली, जिन पर चलने से लोग सूतक होने से बच जाते थे। शुक्राचार्य ने एक बार कच को मरने से बचा भी लिया था। वह आख्यान आगे दिया जायगा।

अंब पाठक काम-नाशक 'रुतीय नेत्र' और 'सखीवनी-विद्या' का अद्भुत भेद समझ गये होंगे।

अम्ब्यास और वैद्यग्य नाम के दो नेत्र हैं। 'रुतीय नेत्र' जो कि मस्तिष्क में है, वह आत्मज्ञान है। उसके सुलने से काम का निर्मूल्य हो जाता है। शिव के पास यही नेत्र था। इसी लिये उन्होंने कामदेव को जला कर चार कर दिया। यदि तुम