ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमूषकचर्या-विज्ञान
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इमने मूषकचर्या को ही तप सिद्धाक्रिया है। प्राचीन काल में प्रभा- नतया यही तप साधा जाता था। इमारे भव की पुष्टि नीचे लिखे वैदिक मन्त्र से भी होती है:—
“मूषकचर्येण ततसा देवा मृत्युमुपाज्यन्त ।”
( अथर्व वेद )
मूषकचर्या स्वपी तप से देवों को अमरता प्राप्त हुई।
अब पाठक समझ गये होंगे कि तप की रू आश्रयचर्या में कुछ भी अन्तर नहीं। आजकल जो तप के नाम से प्रसिद्ध है, वह वास्तव में यही मूषकचर्या था, जिसके लिये जनेक वर्ष तक लोग यल्ल-पूतक तपस्या करते थे, और उसके निर्वात्र अर्थस्त हो जाने पर, मूष की प्राप्ति होती थी। परन्तु मूषकचर्या सिद्ध हो जाता था।
१२—योग और आश्रयचर्या
योगार्त्तमाप्यते धर्म, योगो धर्मैत्यल्लक्षणम् ।
योगो परन्तपोऽप्येतत्समाद्रु योगं ससम्भ्यसेत्॥
( महासुति काशि )
योग से ज्ञान की प्राप्ति होती है—योग ही धर्म का रूप है, और योग ही परम तप माना जाता है। अतएव ऐसे योग का अभ्यास करना चाहिये।
महर्षि पतञ्जलि ने अपने शास्त्र में इस प्रकार योग का लक्षण किया है:—
“योगश्चित्तवृत्ति-निरोधाः ।”
( योगदर्शन )
चित्त की वृत्तियों को रोकने का नाम योग है। अब सफ