ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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तप और ब्रह्मचर्य
यह है कि ब्रह्मचर्य ही परम तप है, और इसको पालन करने वाला पुरुष ही सच्चा तपस्वी है ।
भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी गीता में शारीरिक, वाचिक और मानसिक—इन तीन प्रकार के तपों का वर्णन किया है । उसे हम यहाँ देते हैं:—
देवद्विजगुरुमाक्ष-पूजनं, शौचं मार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसाच, शारीरं तप उच्यते ॥
( श्रीभगवद्गीता )
देव, द्विज, गुरु और विद्वान् की पूजा (सत्कार) पवित्रता और सरलता, तथा ब्रह्मचर्य और अहिंसा को शारीरिक तप कहते हैं ।
। अनुद्देश-करं चाक्यं, सत्यं प्रियं हितश्चयत् ।
स्वाध्यायान्यसनं चैव, वाङ्मयं तप उच्यते ॥
( श्रीभगवद्गीता )
किसी का हृदय न दुखाने वाला, सत्य-प्रिय तथा परोपकारों वचन, और वेदों के अभ्यास को वाचिक तप कहते हैं ।
मनः प्रसादः सौम्यत्वं, मौनमात्म-विनिग्रहः ।
भाव-संशुद्धिं रित्येतत्तपो मानस उच्यते ॥
( श्रीभगवद्गीता )
अर्थात् चित्त की प्रसन्नता, सौम्यता, मननशीलता, विषयों से विरक्तता तथा भावों की शुद्धता को मानसिक तप कहते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण के मत से भी ब्रह्मचर्य की गणना शारीरिक तप में हुई है । पर हमारे विचार से ऊपर जिन तपों का वर्णन किया गया है, वे सभी साधनार्थ, एक ब्रह्मचर्य के ही अन्तर्गत आ जाती हैं । ब्रह्मचर्य के बिना पालन किये, वे कदापि निवह नहीं सकते । अतएव ब्रह्मचर्य को महत्तम जानना चाहिये ।