ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विद्यान
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परिश्रम और अनुष्ठान नष्ट हो जाता था। वे जो कुछ करना चाहते थे, वह मनोरथ नहीं सधता था। वे लोग उसी ब्रह्मचर्य की रक्षा करने के लिये नगरों को त्याग कर वनों में तथा पर्वतों पर जा कर रहते थे। फलाहार कर अपने शरीर को क्षीण कर देते थे। बहुत से लोग वृक्षों के पत्तों, वनस्पतियों तथा वायु पर ही अपना निर्वाह करते थे। देह के दुर्वल हो जाने से उन्हें फाम-बिकार नहीं सताता था। काम-बिकार के न उत्पन्न होने से उनका वीर्य रक्षित रहता था। वीर्य के सुरक्षित रहने से आत्म-वेद वदुता था, जिससे चित्त में शान्ति आती थी। चित्त के स्थिर हो जाने के कारण, वे योग कर सकते थे। अर्थात् मन को आधमा या परमात्मा में लीन करते थे। इस प्रकार उन्हें उस ज्ञान या परमानन्द की प्राप्ति ही जाती थी, जिससे वे मुक्ति-पद (परम शान्ति) को पा जाते थे।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य ही वह परम तप था। उसी का पालन करने के लिये जन्म भर चक्र किये आते थे। अनेक विघ्न पड़ते पर भी यह महाप्रव नहीं छोड़ा जाया था। जो तपस्वी अपनी इस साधना में सफल हो जाते थे, वे ही सफल मनोरथ होते थे। इसी से भगवान् शिव ने इस प्रकार अपने हृदय का भाव प्रकट किया है:—
“न तपस्तप हृत्पाहुर्ब्रह्मचर्यतपोत्तमम्।”
(तन्त्रशास्त्र)
अर्थात् तप कुछ नहीं है ! ब्रह्मचर्य ही उत्तम तप है।
इस अवतरण से भी हमें यही भासता है कि शिवजी ने भी ब्रह्मचर्य को ही उत्तम तप माना है। अतः हमारे कहने का तात्पर्य