भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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तप और ब्रह्मचर्य

सब ब्रह्मचय के अन्तर्गत हैं। अतएव वह सदाचार यही ब्रह्मचर्य है। हम सदाचार को ब्रह्मचर्य से पृथक् नहीं कर सकते।

हमारे विचार से 'ब्रह्मचर्य' ही मूल सदाचार है। क्योंकि सदाचार के जितने गुण हैं, वे सब इसके भीतर आ जाते हैं।

जैसे सदाचार से समस्त दोषों का नाश होता है, वैसे ब्रह्मचर्य से भी किया जा सकता है। अतः ब्रह्मचर्य सदाचार भी सिद्ध हो गया। ब्रह्मचारी ही सच्चा सदाचारी है।

११—तप और ब्रह्मचर्य

“तपो वै ब्रह्मचर्यम्” (श्रुतिः)

वास्तव में ब्रह्मचर्य ही तप है।

“तपो मे हृदयं साक्षात्” (भगवान् विष्णुः)

तप मेरा साक्षात् हृदय है।

पुराणों तथा और अच्छे ग्रन्थों में लिखा है कि भारत के ऋषि-महर्षि तप करते थे—उन लोगों का जीवन प्रायः तप के अनुष्ठान में ही बीतता था। यही कारण था कि वे अपने तपोबल से प्रथिवी पर मनुष्य-जाति का महान् हित कर, आदर्शीय बनते थे।

ऊपर की बात जान कर मनमें यह प्रश्न उठता स्वाभाविक है कि वह तप क्या था? हमारे विचार से वह 'ब्रह्मचर्य' ही था! उसी की रक्षा के लिये विविध प्रकार के उपाय किये जाते थे। उसी की एक मात्र साधना से बड़ी २ सिद्धियाँ प्राप्त होती थीं। उसको एक बार खण्डित होने से भी तपसियों के अनेक वर्ष का