भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-चिन्तामणि

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यह बात सभी लोग जानते हैं कि हमारे ऋषि-महर्षि सदाचारों और श्रेष्ठ पुरुष थे। उनके निर्धारित किये हुये कर्म भी सदाचार हैं। वे जैसा आचरण करते थे, वैसा ही प्रजा को भी करने का उपदेश देते थे। वे भी ब्रह्मचर्य को सदाचार मानते थे। यही कारण था कि प्राचीन कालिक जनता ब्रह्मचर्य के पालन में अत्यधिक उद्यत थी।

धर्मज्ञ-शिरौभूषण मनु ने सदाचार से प्राप्त होने वाले उत्तम फलों का इस प्रकार वर्णन किया है:—

श्राचापारुलभते ध्यायुराचारदीप्सिताः प्रजाः ।

श्राचारान्न मन्वृष्य माचारो हन्त्यलक्षणम् ॥

( मनुस्मृति )

सदाचार का पालन करने से मनुष्य को दीर्घायु, मन चाही सन्तान और अमित धन मिलता है। सदाचार से जनक दुर्गुण भी नष्ट हो जाते हैं। वे फिर कहते हैं:—

सर्वं लक्षण-हीनोऽपि, यः सदाचारवाचस्वः ।

श्रद्धामनोऽनस्यश्च, शर्तः वर्षाणि जीवति ॥

( मनुस्मृति )

सब शुभ लक्षणों से रहित होने पर भी, जो सदाचारी पुरुष है—शास्त्रों पर श्रद्धा रखने वाला और ईर्ष्या से घृणा रखने वाला है; वह सौ वर्षों तक जीता है।

अब हमारे पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि सदाचार मनुष्य-जाति का कितना हित करने वाला साधन है। अतः इस का पालन करना भी कितना आवश्यक है।

ऊपर जिन ऊँचे वर्र्द्यों को सिद्धि सदाचार से होती है, सो