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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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भी अग्निष्ट न हो सका। उन्हें कष्ट देने वाले पहले ही नष्ट हो गये; जो पुरुष इन महोदास का अनुकरण करेगा, वह भी दीर्घजीवी होगा।

हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि आधुनिक समय में भी जा पिता या आचार्य, अपने पुत्र या शिष्य को इस सर्व-श्रेष्ठ (ब्रह्मचर्य) विज्ञान का रहस्य समझा देगा, वह अवश्य ही देश और जाति के सुधार का पुरुष प्राप्त करेगा।

२-ब्रह्मवचस और ब्रह्मलोक

“ब्रह्मभ्यावत्ते, तन्मेषच्छतुमुद्विषां, तन्मे ब्राह्मण-वचसम् ।”

(अथर्ववेद)

मैं ब्रह्म (वीर्य) की उपासना करता हूँ। वह मुझे बल दे और वह मुझे ब्रह्मवचस प्रदान करे।

जितने महाव्रत हैं, उनके पालन से उसके कर्त्ता को कुछ न कुछ फल अवश्य मिलता है। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह निष्काम-कर्म की अपेक्षा सकाम-कर्म को अधिक पसन्द करता है। यदि फल की अशा न हो, तो अनुष्ठान के पूर्ण होने में भी सन्देह ही रहता है। यही बात ब्रह्मचर्य के साथ में भी घटती है। ब्रह्मचर्य का पालन जिन बड़े उद्देश्यों की सिद्धि के लिये किया जाता है, उन्हें हम प्रकट कर देना चाहते हैं। वे इस प्रकार हैं:—

अनेक ग्रन्थों में यह बात लिखी है—बहुत से वैदिक मन्त्रों में भी हम देखते हैं कि भाव-भरे मनोहर शब्दों में ‘ब्रह्मवचस’ के

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ब्रह्मवर्चस् और ब्रह्मलोक

लिये प्रार्थना की गई है। मन्वादि स्मृतियों में भी यह बात स्पष्ट रूप से प्रतिपादित की गई है कि ब्रह्मवर्च्य के पालन का श्रेय ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति है। इसी ब्रह्मवर्चस के लिये कोटि-कोटि महर्षि और मुनीश्वर लोग अखण्ड ब्रह्मवर्च्य की साधना करते रहे। कहने का वात्सय यह है कि ब्रह्मवर्चस को प्राप्त करने का ब्रह्मवर्च्य ही एकमात्र साधन था।

अथर्ववेद में 'ब्रह्मवर्चस' के सम्बन्ध के कई प्रमानोत्पादक मन्त्र हैं। उनमें से एक हम यहाँ उद्धृत करते हैं। उससे हमारी यह बात स्पष्ट हो जायगी:—

सूर्यस्यावृत मन्वावर्ते, दक्षिणा मन्वावर्ते। सामे द्विविर् यच्छतु, सामे ब्राह्मणवर्चसम् ॥

हम प्रकाश-स्वरूप परमात्मा का अनुगमन करते हैं। हम उसकी अनुकूलता की उपासना करते हैं। वह हमें बलप्रदान करे, वह हमें ब्रह्मतेज दे !

इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि हम सूर्य की भाँति शरीर को प्रकाशित करने वाले ब्रह्मवर्च्य का अनुष्ठान करते हैं। उसकी सत्ता का अनुमान करते हैं। वह हमें मनोबल दे—वह हमें ब्रह्मतेज प्रदान करे।

वात्सय में वीर्य ही मनुष्य-शरीर में सूर्य है। इसी के प्रताप से यह प्रकाशित होता है। जिस दिन इस परम प्रकाश का लोप हो जाय, उसी क्षण यह पौर तम से घिर जाता है। अर्थात् वीर्य के बिना शरीर का नाश होना निश्चित है।

ब्रह्मवर्च्य के पालन से ही मनुष्य को ब्रह्मवर्चस की उपलब्धि होती है। ब्रह्मवर्चस नाम है—आत्म-ज्ञान का। जब तक ब्रह्मवर्चस

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नहीं, सिद्ध होता, 'सब-तक 'ब्रह्मलोक' में आत्मा स्वतन्त्र होकर नहीं पहुँच सकता। अर्थात् एक 'साधन' की सिद्धि हो जाने से दूसरे सबूतय की भी सिद्धि होती है।

अब पाठक ब्रह्मचर्य कर रहा है, इसे तो समझ गये होंगे। इसके प्रश्नोत्तर 'ब्रह्मलोक' का भी थोड़ा परिचय कर देना चाहते हैं।

“तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते। तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां स्वर्गेषुलोकेषु फामचारो भवति।” ( छान्दोग्योपनिषत् )

ब्रह्मचर्य से ही 'ब्रह्मलोक' की स्थिति है। ब्रह्मचर्य के ही द्वारा 'ब्रह्मलोक' मिलता है। ब्रह्मचारियों का ही 'ब्रह्मलोक' पर अधिकार है, अन्य का नहीं। जो ब्रह्मचर्य चुक पुलप हैं, वे सभी लोकों में विचरण कर सकते हैं।

इसका अभिप्राय यह है कि इस शरीर के ही अन्तर्गत 'ब्रह्मलोक' है। ब्रह्मचर्य की निष्ठा से आत्मा को वह अवस्था प्राप्त होती है। जिस ब्रह्मचारी को आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है, वह शरीर के भीतर के दूसरे लोकों में भी पहुँच सकता है। अर्थात् उसका अनुभव सब प्रकार के सद्भावों में परिणत हो सकता है।

'ब्रह्मलोक' आत्मा की वह अवस्था है, जिसमें वह परम सुख का अनुभव करता है। इस लोक में पहुँचने पर, उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं मिलता। 'ब्रह्मलोक' सब लोकों से श्रेष्ठ है। यह सब से ऊपर मस्तिष्क में है। प्राणों के यह पहुँचने से जीव का मोच होता है। उसे फिर यहिक हृदयों से मुक्ति मिल जाती है। इसीसे 'ब्रह्मलोक' का आशय है—परमानन्द।

अब पाठक समझ गये होंगे कि चौर्य-सत्ता (ब्रह्मचर्य से) की

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प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य

मनुष्य को आत्मज्ञान प्राप्त होता है, और आत्मज्ञान प्राप्त होने पर ही परमात्मन्द (ब्रह्मलोक) की प्राप्ति हो सकती है। इस अवस्था के प्राप्त होने पर, फिर कुछ भी प्राप्त करने के लिये शेष नहीं रह जाता।

हमारे विचार से यही 'ब्रह्मवचन' और 'ब्रह्मलोक' का मूल रहस्य है। इन दोनों के लिये प्रयत्न करना मनुष्य-जाति का प्रधान ध्येय होता चाहिये। जो लोग अपने जन्म को सार्थक करना चाहें, वे ब्रह्मचर्य रूढ़ी सुधुपाय को साथ कर 'ब्रह्मवचन' और 'ब्रह्मलोक'—'आत्मज्ञान' और 'परमात्मन्द' को अवश्य प्राप्त करें !

९—प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य

मन्ये विधात्रा जगदेक कानम् । विनिर्मितं वर्षं भिदं सुशोभनम् ॥ धर्माख्यं पुष्पाणि कियन्ति यत्र वै । कैवलय रूपञ्च फलं प्रचीयते ॥

यह वात सब पर विदित है कि इस देश के निवासी आर्य नाम से विश्व-भरपल में विख्यात थे। उनकी इस महत्ता का कारण क्या था? उनका सदाचारमय-धर्मनिष्ठ-लोकोपकारी जीवन। वे निरन्तर साधुता-पूर्ण तथा सब चरित्र का अभ्यास करते थे। इस बात से वे बहुत उन्नत तथा सद्गुण-सम्पन्न थे। उनके जीवन को सुधारने वाला प्रधान साधन यही 'ब्रह्मचर्य' था। इसी ब्रह्मचर्य के ऊपर उनका सामाजिक तथा नैतिक जीवन प्रधानतया

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अधिष्ठित था, और सारे देश में सुख-शान्ति का अनुपम साम्राज्य हो गया था। पर हाय ! महाभारत के साथ ही आर्यों के सस्ति-ख़ातों का हास होने लग गया। दिन पर दिन आर्यों की सब प्रकार की अवनति होती गई। अन्त में यह दशा हुई कि हम उन्हीं की एक मात्र सन्तान, उनके आदर्शों के शिखर से अनाचार के कूप में गिर गये। आर्यों के उन्नत चरित्र के सम्बन्ध में बहुत से विद्वानों ने अपने ग्रन्थों में सुसम्पत्तियों प्रकट की हैं। उनके देखने से हमें पूर्ण रूप से अनुमान हो जाता है कि कुछ ही दिन पहले, खदेड़ी शासन में हम, कितने गौरवान्वित तथा उच्च थे। हमारी ब्रह्मचर्य की प्रणाली ज्यों ज्यों अवनत होती गई, त्यों त्यों जाति की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अवनति भी बढ़ती ही गई।

आर्यों के विषय में कहा गया है कि वे बड़े ऊँचे, हृद-पुष्ट और पराक्रमी थे। उनका वर्ण गौर, शरीर तेजस्वी, उन्नत वक्ष-स्थल और दिव्य सुख-मण्डल था। बड़े नेत्र और लम्बी भुजायें थीं। मुख में शूल्ता दिखलाते थे। धर्म-पालन में दृढ़ और ईश्वर के परम भक्त थे। उनको स्त्रियों सदाचारिणी, पति-भक्ता तथा देवी-स्वरूपा थीं।

ऊपर की बातों के अवलोकन से हमारे मनमें यह स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि वे ऐसे क्यों थे, और आज हम उन्हीं के वंशज होकर, इस दुर्गति को क्यों प्राप्त हैं ? इसका उत्तर यह सूझता है कि इन सब अवनतियों का प्रधान कारण ब्रह्मचर्य-हीनता है। ब्रह्मचर्य की साधना से आर्यों का प्राचीन समय में चत्थान हुआ था। और उसके विपरीत चलने से ही हमारा

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प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य

अघःपात हुआ। यदि उसी ब्रह्मचर्य-प्रथा को पुनर्जीवित कर दिया जाय, तो हमारे अनुमान से आर्यों की दशवीं पीढ़ी में पुनः आर्यों के वंशधर अपनी प्राचीन अवस्था को प्राप्त कर सकेंगे।

अब हम इस देश के प्राचीन आर्यों के चरित्र के सम्बन्ध में कुछ विदेशी विद्वानों के मतों का संग्रह करते हैं। इन विद्वानों में प्रायः सभी भारतवर्ष में आकर यहाँ की अवस्था अपनी आँखों देख गये हैं, और अपने देश में जोकर अपने ग्रन्थों में यहाँ का विस्तृत वर्णन किया है, तथा जो कुछ कहा है, उससे उनकी निष्पक्षता प्रकट होती है:—

जोर्जस—

“धर्म तथा सभ्यता के प्राचीनत्व के विचार से पृथ्वी की कोई भी जाति आर्य-जाति के समकक्ष नहीं।”

हयनसिंग—

“सबरिजता वा सत्यता के लिये आर्य-जाति चिरकाल से विषय में प्रसिद्ध है।”

मेगास्थनीज—

“आर्यों में दासत्व-भाव बिलकुल नहीं। उनकी स्त्रियों में पातित्रत्व और पुरुषों में वीरत्व असीम है। साहसिकता में आर्य-जाति पृथ्वी भर की अन्य जातियों में श्रेष्ठ है—परिग्रभी, शिल्पी तथा नग्न प्रकृति है।”

मैक्समूलर—

“जैसे पृथ्वी पर स्वर्ग कहने में भी मुझे आनन्द होता है। यदि कोई मुझसे कहे कि किस देश के आकाश के नीचे मनुष्य के अन्तःकरण की पूर्णता प्राप्त हुई, तो मैं कहूँगा कि वह देश भारतवर्ष है।”

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मिसेज पर्नीवेसॅट—

“हिन्दु-धर्म के सामने पारवाल सम्भ्या अत्यन्त हीन ज्ञात होता है । ज्ञान की कृष्णी सदा से हिन्दुओं के हाथ में रही है ।”

अपर की सम्पातियों के अतिरिक्त इस देश के विद्वानों के भी अनेक सदूभाव हैं, जो यहाँ पर अनावश्यक समय कर नहीं दिये गये । क्योंकि स्वदेशी लोग अपने देश का पक्षपात भी थोड़ा-बहुत कर सकते हैं, पर विदेशी लोगों को इससे क्या काम ! अतः इस सम्बन्ध में उन्हें के विचार मूल्यवान हो सकते हैं ।

१७—धर्म और ब्रह्मचर्य

“धर्मोर्ध्व जगत्सुप्रहितमिदम् ।”

“धर्मो विभ्रत्य जगत्ः प्रतिष्ठा,

प्रजा उपसर्पन्ति धर्मेष ।”

( नारयणगीतम् )

धर्म से ही वह संसार सुरक्षित है । धर्म से ही इस दृष्टि की मर्यादा है । धर्म से ही प्रजा अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकती है ।

विचार-दृष्टि से देखने पर विदित होता है कि वास्तव में धर्म मनुष्य-जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक साधन है । धर्म से ही सब प्रकार की उन्नतियाँ हो सकती हैं । धर्म मनुष्य की उस योग्यता का नाम है, जिसके आश्रय से, वह अपने पद को सार्थक बनाता है । जैसे धरि का धर्म धन्वज—जल का वरलाल है,

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धर्म शौर्य ब्रह्मचर्य

वैसे ही इस शरीका धर्म संयम-नियम और आत्मा, का ब्रह्मचर्य है। जो पदार्थ अपने धर्म को छोड़ देता है, वह उसी समय अपने अस्तित्व को भी खो बैठता है।

उक्तंति निखिला ज्ञावा, धर्मैरेव कृमादिह।

विदधानाः सावधानाः, लभन्तेऽन्ते परं पदम्॥

(महर्षिः व्याख्या)

इस लोक में समस्त जीव धर्म से ही विकास को प्राप्त करते हैं। धर्म के नियमों को पालने वाले, और उसके साधन में सामान्य रहने वाले नर ही अन्त में उत्तम पद के अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं !

महर्षि कृष्णद ने अपने ग्रन्थ में धर्म की बहुत ही विख्यापक तथा अकाट्य परिभाषा की है, जो सदा और सर्वत्र एक सी घटती है, उसे हम यहाँ देते हैं :—

“यतोऽभ्युदय निः श्रेयस सिद्धिः सधर्मः।”

(बैशोपिकदर्शन)

जिस उपाय के अवलम्बन से इस लोक तथा परलोक दोनों का सुख प्राप्त हो, उसे धर्म कहते हैं। इसके विपरीत अधर्म है। ‘अभ्युदय’ नाम है—ऐहिक उन्नतियों का। सुन्दर स्वास्थ्य, दीर्घ-जीवन, प्रचुर-सम्पत्ति, सुख्य तथा अच्छी सन्तान को ही लोग इसलोक की उन्नतियों में गिनते हैं। ये सभी उन्नतियाँ ‘ब्रह्मचर्य’ के अधीन हैं। एक ब्रह्मचारी पुरुष—इन सबों को सहज में प्राप्त कर लेता है।

‘निःश्रेयस’ नाम है—पारलौकिक विकास का। आत्मानन्द, जीव-बुधा, परमोत्साह, उच्च कर्तव्य-शीलता, सद्भावना और

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मोक्ष, इनकी गणना पारलौकिक विद्या से है। ये सभी ब्रह्मचर्य के प्रताप से सुलभ हैं। एक ब्रह्मचारी इन्हें कुछ ही दिन के सहस्र्यास से, निश्चय रूप से अधिकृत कर लेता है।

किंवदन्ता एक ही ब्रह्मचर्य में धर्म के दोनों उद्देश्यों की सिद्धि हो जाती है। अतएव हम ब्रह्मचर्य को ही धर्म का साक्षात् स्वरूप समझते हैं।

ब्रह्मचर्य शरीर और आत्मा का प्रधान धर्म है। इससे शारीरिक तथा मानसिक विकास स्वयं हो जाता है। इसलिये ब्रह्मचर्य को सर्व-प्रथम स्थान मिला है।

एक बार नारद जी भगवान् विष्णु के पास बैठकृष्ट में गये। अभिवादन तथा कुशल-प्रश्न के पश्चात् नारदजी ने भगवान् से पूछा कि महाराज ! मैं आप से कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। इस पर विष्णु भगवान् ने उन्हें पूछने की आज्ञा दी।

उन्होंने पूछा कि हे सब के हृदय की वात जानने वाले प्रभो ! आप की भाया में सब जीव मूल हैं। भला यह तो बताइये कि आप को सब से भिन्न वस्तु क्या है ? मैं आप के ही श्रीमुख से यह रहस्य प्रकट कराना चाहता हूँ।

नारद जी का प्रश्न सुन कर भगवान् बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि हे ऋषिवर ! आपने संसार के लाम की इच्छा से यह प्रश्न किया है, अतएव मैं आप से अपने मन की बात बतलाता हूँ। सुमे ब्रह्मचर्य-धर्म सब से भिन्न है। जो पुरुष मन, वचन तथा कर्म से इसका उचित रीति से पालन करता है, वह निश्चय ही सुभ्म को प्राप्त होता है। यही कारण है कि बड़े-बड़े योगी लोग ब्रह्मचर्य-सिद्धि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते।

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सदाचार और ब्रह्मचर्य

जीव के लिये ब्रह्मचर्य से बद्ध कर दूसरा धर्म त्रिलोक में नहीं। इस पर नारद जी भगवान् की स्तुति कर वहाँ से प्रसन्न चित्त हा कर अन्य कर्तव्यों के लिये विदा हुये।

११—सदाचार और ब्रह्मचर्य

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तयद्देवतेरोजनः । स यत्प्रमार्गं कुरुते, लोकस्तदनुवर्तते ॥

(श्रीभगवद्गीता)

श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, वैसा दूसरे लोग भी उनकी देखा-देखी करते हैं, और वे जा कुछ नियम निर्धारित करते हैं, लोग वन्हीं के अनुकूल चलने लगते हैं।

“आचारः प्रथमो धर्मः।”

(मनुस्मृति)

सदाचार ही परम धर्म है। भगवान् मनु ने उपर्युक्त शब्दों में सदाचार को प्रधानता दी है।

वास्तव में मनुष्य-जीवन का सार सदाचार है। सदाचार से ही, दोनों ही, व्यक्तिगत तथा समाजिक सुधार हो सकते हैं। जो जाति, और जो देश अपने सदाचार से पलित नहीं होता, वह अपनी सुखमय अवस्था से हीन नहीं हो सकता है।

सदाचार का अर्थ है—सज्जनों का आचरण। वे उत्तम नियम, जिन पर कि उच्च पुरुष चलते हैं—अथवा शास्त्र-सम्मत वे कार्य, जिनके करने से मनुष्य-समाजको सुख और शान्ति मिलती है।

ब्रह्मचर्य-चिन्तामणि

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यह बात सभी लोग जानते हैं कि हमारे ऋषि-महर्षि सदाचारों और श्रेष्ठ पुरुष थे। उनके निर्धारित किये हुये कर्म भी सदाचार हैं। वे जैसा आचरण करते थे, वैसा ही प्रजा को भी करने का उपदेश देते थे। वे भी ब्रह्मचर्य को सदाचार मानते थे। यही कारण था कि प्राचीन कालिक जनता ब्रह्मचर्य के पालन में अत्यधिक उद्यत थी।

धर्मज्ञ-शिरौभूषण मनु ने सदाचार से प्राप्त होने वाले उत्तम फलों का इस प्रकार वर्णन किया है:—

श्राचापारुलभते ध्यायुराचारदीप्सिताः प्रजाः ।

श्राचारान्न मन्वृष्य माचारो हन्त्यलक्षणम् ॥

( मनुस्मृति )

सदाचार का पालन करने से मनुष्य को दीर्घायु, मन चाही सन्तान और अमित धन मिलता है। सदाचार से जनक दुर्गुण भी नष्ट हो जाते हैं। वे फिर कहते हैं:—

सर्वं लक्षण-हीनोऽपि, यः सदाचारवाचस्वः ।

श्रद्धामनोऽनस्यश्च, शर्तः वर्षाणि जीवति ॥

( मनुस्मृति )

सब शुभ लक्षणों से रहित होने पर भी, जो सदाचारी पुरुष है—शास्त्रों पर श्रद्धा रखने वाला और ईर्ष्या से घृणा रखने वाला है; वह सौ वर्षों तक जीता है।

अब हमारे पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि सदाचार मनुष्य-जाति का कितना हित करने वाला साधन है। अतः इस का पालन करना भी कितना आवश्यक है।

ऊपर जिन ऊँचे वर्र्द्यों को सिद्धि सदाचार से होती है, सो

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तप और ब्रह्मचर्य

सब ब्रह्मचय के अन्तर्गत हैं। अतएव वह सदाचार यही ब्रह्मचर्य है। हम सदाचार को ब्रह्मचर्य से पृथक् नहीं कर सकते।

हमारे विचार से 'ब्रह्मचर्य' ही मूल सदाचार है। क्योंकि सदाचार के जितने गुण हैं, वे सब इसके भीतर आ जाते हैं।

जैसे सदाचार से समस्त दोषों का नाश होता है, वैसे ब्रह्मचर्य से भी किया जा सकता है। अतः ब्रह्मचर्य सदाचार भी सिद्ध हो गया। ब्रह्मचारी ही सच्चा सदाचारी है।

११—तप और ब्रह्मचर्य

“तपो वै ब्रह्मचर्यम्” (श्रुतिः)

वास्तव में ब्रह्मचर्य ही तप है।

“तपो मे हृदयं साक्षात्” (भगवान् विष्णुः)

तप मेरा साक्षात् हृदय है।

पुराणों तथा और अच्छे ग्रन्थों में लिखा है कि भारत के ऋषि-महर्षि तप करते थे—उन लोगों का जीवन प्रायः तप के अनुष्ठान में ही बीतता था। यही कारण था कि वे अपने तपोबल से प्रथिवी पर मनुष्य-जाति का महान् हित कर, आदर्शीय बनते थे।

ऊपर की बात जान कर मनमें यह प्रश्न उठता स्वाभाविक है कि वह तप क्या था? हमारे विचार से वह 'ब्रह्मचर्य' ही था! उसी की रक्षा के लिये विविध प्रकार के उपाय किये जाते थे। उसी की एक मात्र साधना से बड़ी २ सिद्धियाँ प्राप्त होती थीं। उसको एक बार खण्डित होने से भी तपसियों के अनेक वर्ष का

ब्रह्मचर्य-विद्यान

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परिश्रम और अनुष्ठान नष्ट हो जाता था। वे जो कुछ करना चाहते थे, वह मनोरथ नहीं सधता था। वे लोग उसी ब्रह्मचर्य की रक्षा करने के लिये नगरों को त्याग कर वनों में तथा पर्वतों पर जा कर रहते थे। फलाहार कर अपने शरीर को क्षीण कर देते थे। बहुत से लोग वृक्षों के पत्तों, वनस्पतियों तथा वायु पर ही अपना निर्वाह करते थे। देह के दुर्वल हो जाने से उन्हें फाम-बिकार नहीं सताता था। काम-बिकार के न उत्पन्न होने से उनका वीर्य रक्षित रहता था। वीर्य के सुरक्षित रहने से आत्म-वेद वदुता था, जिससे चित्त में शान्ति आती थी। चित्त के स्थिर हो जाने के कारण, वे योग कर सकते थे। अर्थात् मन को आधमा या परमात्मा में लीन करते थे। इस प्रकार उन्हें उस ज्ञान या परमानन्द की प्राप्ति ही जाती थी, जिससे वे मुक्ति-पद (परम शान्ति) को पा जाते थे।

अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य ही वह परम तप था। उसी का पालन करने के लिये जन्म भर चक्र किये आते थे। अनेक विघ्न पड़ते पर भी यह महाप्रव नहीं छोड़ा जाया था। जो तपस्वी अपनी इस साधना में सफल हो जाते थे, वे ही सफल मनोरथ होते थे। इसी से भगवान् शिव ने इस प्रकार अपने हृदय का भाव प्रकट किया है:—

“न तपस्तप हृत्पाहुर्ब्रह्मचर्यतपोत्तमम्।”

(तन्त्रशास्त्र)

अर्थात् तप कुछ नहीं है ! ब्रह्मचर्य ही उत्तम तप है।

इस अवतरण से भी हमें यही भासता है कि शिवजी ने भी ब्रह्मचर्य को ही उत्तम तप माना है। अतः हमारे कहने का तात्पर्य

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तप और ब्रह्मचर्य

यह है कि ब्रह्मचर्य ही परम तप है, और इसको पालन करने वाला पुरुष ही सच्चा तपस्वी है ।

भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी गीता में शारीरिक, वाचिक और मानसिक—इन तीन प्रकार के तपों का वर्णन किया है । उसे हम यहाँ देते हैं:—

देवद्विजगुरुमाक्ष-पूजनं, शौचं मार्जवम् ।

ब्रह्मचर्यमहिंसाच, शारीरं तप उच्यते ॥

( श्रीभगवद्गीता )

देव, द्विज, गुरु और विद्वान् की पूजा (सत्कार) पवित्रता और सरलता, तथा ब्रह्मचर्य और अहिंसा को शारीरिक तप कहते हैं ।

। अनुद्देश-करं चाक्यं, सत्यं प्रियं हितश्चयत् ।

स्वाध्यायान्यसनं चैव, वाङ्मयं तप उच्यते ॥

( श्रीभगवद्गीता )

किसी का हृदय न दुखाने वाला, सत्य-प्रिय तथा परोपकारों वचन, और वेदों के अभ्यास को वाचिक तप कहते हैं ।

मनः प्रसादः सौम्यत्वं, मौनमात्म-विनिग्रहः ।

भाव-संशुद्धिं रित्येतत्तपो मानस उच्यते ॥

( श्रीभगवद्गीता )

अर्थात् चित्त की प्रसन्नता, सौम्यता, मननशीलता, विषयों से विरक्तता तथा भावों की शुद्धता को मानसिक तप कहते हैं ।

भगवान् श्रीकृष्ण के मत से भी ब्रह्मचर्य की गणना शारीरिक तप में हुई है । पर हमारे विचार से ऊपर जिन तपों का वर्णन किया गया है, वे सभी साधनार्थ, एक ब्रह्मचर्य के ही अन्तर्गत आ जाती हैं । ब्रह्मचर्य के बिना पालन किये, वे कदापि निवह नहीं सकते । अतएव ब्रह्मचर्य को महत्तम जानना चाहिये ।

मूषकचर्या-विज्ञान

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इमने मूषकचर्या को ही तप सिद्धाक्रिया है। प्राचीन काल में प्रभा- नतया यही तप साधा जाता था। इमारे भव की पुष्टि नीचे लिखे वैदिक मन्त्र से भी होती है:—

“मूषकचर्येण ततसा देवा मृत्युमुपाज्यन्त ।”

( अथर्व वेद )

मूषकचर्या स्वपी तप से देवों को अमरता प्राप्त हुई।

अब पाठक समझ गये होंगे कि तप की रू आश्रयचर्या में कुछ भी अन्तर नहीं। आजकल जो तप के नाम से प्रसिद्ध है, वह वास्तव में यही मूषकचर्या था, जिसके लिये जनेक वर्ष तक लोग यल्ल-पूतक तपस्या करते थे, और उसके निर्वात्र अर्थस्त हो जाने पर, मूष की प्राप्ति होती थी। परन्तु मूषकचर्या सिद्ध हो जाता था।

१२—योग और आश्रयचर्या

योगार्त्तमाप्यते धर्म, योगो धर्मैत्यल्लक्षणम् ।

योगो परन्तपोऽप्येतत्समाद्रु योगं ससम्भ्यसेत्॥

( महासुति काशि )

योग से ज्ञान की प्राप्ति होती है—योग ही धर्म का रूप है, और योग ही परम तप माना जाता है। अतएव ऐसे योग का अभ्यास करना चाहिये।

महर्षि पतञ्जलि ने अपने शास्त्र में इस प्रकार योग का लक्षण किया है:—

“योगश्चित्तवृत्ति-निरोधाः ।”

( योगदर्शन )

चित्त की वृत्तियों को रोकने का नाम योग है। अब सफ

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योग और अद्भुतचर्य

चित्त-वृत्तियों अपने अधिकार में नहीं हो जातीं, तब तक लाख उपाय करने पर भी रोके नहीं रुक सकतीं। चित्त-वृत्तियों को अधिकार में करने के लिये, मन की साधना की जाती है। यह मन की साधना बिना अद्भुतचर्य के हो नहीं सकती। यही कारण है कि योग करने के पहले, अद्भुतचर्य-व्रत का पालन करना पड़ता है। जिसका अद्भुतचर्य स्थिर नहीं, वह पुरुष योग-व्रत होकर अपने ध्युत्थान से गिर जाता है। एक अद्भुतचर्य पुरुष में ही चित्त-वृत्ति को रोकने की शक्ति रह सकती है।

योग का उद्देश्य आत्मा और परमात्मा को प्राप्त करना है। उपनिषदों में आत्मा और परमात्मा में लीन होने के उपायों का वर्णन है। प्रमाण के लिये एक मन्त्र उद्धृत किया जाता है।—

सत्येन सत्यस्त्वत्सा शेष आत्मा ।

सत्यग्वानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ॥

अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि ध्रुवो ।

संश्रयन्ति यतयः क्षीणं शोबाः ॥

सत्य से, तप से, पूर्ण ज्ञान से और अविचल अद्भुतचर्य से आत्मा ( ईश्वर ) का लाभ हो सकता है। वह अन्तःकरण में श्रियोतिर्मय और निर्मल रूप से विराजमान है। जो लोग सिद्ध और निष्पाप हैं, वे ही उसके दर्शन कर सकते हैं।

हमारे विचार से सत्य, तप और आत्मज्ञान सब योग से ही सिद्ध होते हैं। वह योग भी अद्भुतचर्य पर स्थित है। इसलिये अद्भुतचर्य ही सच्चा योग है। इसका निभाने वाला पुरुष ही कर्मनिष्ठ योगी है। जिस चित्त-वृत्ति निरोध से योग सिद्ध होता है, उसी से अद्भुतचर्य का भी पालन किया जाता है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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योग-शास्त्र में योग के साधने की तीन कियायें या साधन इस प्रकार वतलाये गये हैं:—

“तपः स्वाध्यायेश्चर-प्रणिधानानि क्रिया-योगः ।”

तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान को क्रिया-योग कहते हैं। हमारे ब्रह्मचर्य में भी, ये तीनों कियायें प्रधानरूप से विद्यमान हैं। जिन भाठ अंगों से योग सिद्ध होता है, उन्हीं के पालन से ब्रह्मचर्य को भी पूर्णता प्राप्त होती है।

अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य एक प्रकार से योग भी है। जिसने ब्रह्मचर्य का पालन किया, उसने योग-साधन भी कर लिया।

१३—सत्य और ब्रह्मचर्य

सत्येन धार्यते पृथ्वी, सत्येन तपते रविः।

सत्येन वातिवायुश्च, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥

सत्य से पृथिवी ठहरी हुई है, सत्य से सूर्य अपना प्रकाश करता है और सत्य से ही वायु चलती है। एक सत्य में सब कुछ प्रतिष्ठित है।

वास्तव में संसार का वीजरूप एक सत्य ही है। सभी पदार्थों में सत्य विराजमान है। जहाँ वह नहीं है, वहाँ कुछ भी नहीं रह सकता। जिस पदार्थ का सत्य नष्ट हो जाता है, वह स्वयं भी नाश को प्राप्त होता है। सत्य का ही दूसरा नाम अस्तित्व है।

इस शरीर का सत्य बल है—इसके भीतर रहने वाले आत्मा का सत्य ब्रह्मचर्य है। बल के न रहने पर शरीर और ब्रह्मचर्य

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सत्य और ब्रह्मचर्य

से हीन होने पर आत्मा का अस्तित्व नहीं रह सकता । जैसा कि उपनिषदों में लिखा है:—

सत्य मेव जयते नाशुतम् । सत्येन पन्थावित्तो देवयानः ॥ येनाक्रमन्तृषयो ह्यासकामा । यत्र तत्सत्यस्य परमनिधानम् ॥

सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं ! सत्य से ही देवों का मार्ग मिलता है । ऋषि लोग भी सत्य के प्रभाव से सफल होते हैं, जहाँ सत्य की सत्ता है, वहाँ सब सुख है ।

हमारे विचार से जिस सत्य का वर्णन ऊपर आया है, वह यही ब्रह्मचर्य है । जो पुरुष ब्रह्मचर्य का नाश करता है, वह अपने को सत्य से प्रत्यक् करता है । इसके पालन से मनुष्य सत्य को अधिकार में कर लेता है, और वह सत्य उस को सुखी बनाता है ।

हमारे भीष्म पितामह ने ब्रह्मचर्य को सत्य शब्द से अभिहित किया है । अपनी प्रसिद्धा की दृढ़ता प्रकट करने के लिये, उन्होंने सत्य का ही नाम लेकर, ब्रह्मचर्य को महत्व दिया है ।

विक्रमं वृजहा जहाद्भर्म जहाच्च धर्मराज । नत्वहं सत्यमुत्पृङ्, व्यवसेयं कथञ्चन ॥

(महाभारत)

चाहे इन्द्र अपने पराक्रम को छोड़ दें, और धर्मराज अपने धर्म को छोड़ दें, पर जिस सत्य (ब्रह्मचर्य) को मैंने धारण किया है, उसे कदापि नहीं छोड़ सकता ।

ब्रह्मचर्य-विधान

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अब पाठक सत्य और ब्रह्मचर्य की एकता और रहस्य को समझ गये होंगे ।

भिस पुरुष के हृदय में सत्य की कुछ भी प्रतिष्ठा है—जो सत्य का पालन करना चाहता है, वह इस ब्रह्मचर्य रूपी सत्य का पालन कर सद्गति को प्राप्त हो ।

१४—कर्तव्य और ब्रह्मचर्य

“जयं प्राप्नोति संज्ञामे, यः सुकार्याण्यनुष्ठते ।”

( विदुरनीति )

सर्कतव्यों का पालन करने वाला ही पुरुष संज्ञाम में विजय-लाम करता है ।

कर्तव्य मेव कर्तव्यं, प्राप्तेः कण्ठगतेरपि ।

अकर्तव्यं न कर्तव्यं, प्राप्तेः कण्ठगतेरपि ॥

( नीति-शास्त्र )

अपने कर्तव्य का पालन प्राणों के निकलने तक करना चाहिये ! पर जिसे हम अकर्तव्य समझते हैं, उसे प्राणों के जाने पर भी करना योग्य नहीं ।

कर्तव्य से ही समाज की स्थिति है—कर्तव्य से ही दोषों का नाश होता है—कर्तव्य के पालन से ही मनुष्य को सुख-शान्ति मिल सकती है, और कर्तव्य ही सब का सार है । कर्तव्य से हीन होने पर कदापि सुख नहीं मिलता । अकर्तव्य के समान पाप भी नहीं ।

हम ब्रह्मचर्य को ही सब कर्तव्यों का कर्तव्य मानते हैं ।

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कर्तव्य और ब्रह्मचर्य

संसार के सारे कर्तव्य एक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता रखते हैं। ब्रह्मचर्य के बिना एक भी कर्तव्य नहीं हो सकता !

“कर्तव्य सर्व-साधकम् ।”

( सूक्ति )

कर्तव्य ही मनुष्य के सब कार्यों को साधने वाला है । हमारा ब्रह्मचर्य भी सब का साधने वाला सिद्ध हो चुका है । अतएव वह पूर्ण रूप से कर्तव्य कहा जा सकता है । इस कर्तव्य के सामने विश्व के सभी कर्तव्य मूक हो जाते हैं । इस ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष ही सब कर्तव्यशील है, और वह सब सुखों को सहज में प्राप्त कर लेता है ।

वैश्वीर्योपनिषद् में आचार्य-द्वारा कर्तव्य की बहुत ही उत्तम परिभाषा की गई है, और उसी वचन में कर्तव्य-पालन की आह्वा भी ब्रह्मचारी को दी है । उसे हम यहाँ उद्धृत करते हैं :—

“यान्यनवधानिकर्माणि तानि सेवितव्यानि, नो इत्पाणि ।” ( उपनिषत् )

जो निर्दोष कर्म हैं, वे ही कर्तव्य हैं । अकर्तव्य का सेवन करना योग्य नहीं वरन् मूर्खता है ।

इस से यह विदित होता है कि जिसने दोष-रहित कर्म हैं, सब की गणना कर्तव्य में है । उनका पालन करना शास्त्र-सङ्गत है । वे सभी कर्तव्य ब्रह्मचर्य के बिना नहीं सध सकते । अतः इस प्रकार वे भी ब्रह्मचर्य सब कर्तव्यों का मूल है ।

अब पाठक भलीभाँति समझ गये होंगे कि ‘ब्रह्मचर्य’ ही श्रेष्ठ कर्तव्य है, अतएव जिसे कर्तव्य का पालन करना हो, वह ब्रह्मचर्य का पालन करे ।