ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश
Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन-सन्देश
हो। स्वाद के लिए जिह्वा के दास न बनें। लाल, काली सफेद, हरी किसी भी प्रकार की मिर्च न खायें। ये सभी ब्रह्मचर्य के लिए विष हैं, सोडावाटर, बर्फ, चाय, कहवा, कॉफी ये सभी वीर्यनाशक हैं, इन्हें कभी न छुयें। माँस, मछली, अण्डे मनुष्य का भोजन नहीं, इन्हे खाकर सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं रह सकता। यदि खाते हैं तो अभी छोड़ दें।
नशों से बचें
हुक्का, बीड़ी, सिगरेट, शराब, गॉंजा, अफीम, चण्डू, भंग आदि खाने-पीने की वस्तु नहीं। इनके खाने-पीनेवाला जीवन से प्रेम छोड़ दे, कफन मंगवाकर घर में रखे। कहो वीर्यरक्षा और कहां ये नशे ओर व्यसन, इनका क्या मेल ? सिगरेट शराब आदि पीने वाला इन्हें बिना छोड़े ही वीर्यरक्षा करना चाहता है। यदि अपना कल्याण चाहते हैं तो आज ही कान पकड़ लें और व्रत लें कि “कभी सिगरेट, शराब आदि विष का पान नहीं करेंगे, चाहे मर भी जायें इन्हे छुयेंगे नहीं।” इनके पीने खानेवाला सर्वथा नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाता है। विशेष विवरण के लिये ‘भोजन’ पुस्तक पढ़ें।
६. शयन
सदा अकेले सोयें। कभी किसी अवस्था में भी किसी के साथ यहाँ तक कि सगे भाई के साथ भी न सोयें। सोने से पूर्व लघुशंका (पेशाब) अवश्य करें। हाथ, पैर, मुख शीतल जल से धोयें। मूत्रेन्द्रिय का स्नान भी हितकर है। अँगोछे से हाथ पैर पोंछलें। कुर्ता धोती आदि सब वस्त्र उतार दें। केवल शुद्ध और बारीक खदर का लंगोट बाँधे रहें। मर्द का लंगोट और घोड़े का तंग २४ घण्टे बँधा ही रहना चाहिए। सदा भूमि पर सोये। एक दरी का बिछौना रखें। यदि जाड़े में न रह सकें तो एक कम्बल और डाललें, रूई के गढ़े वा कोमल बिस्तर पर कभी न सार्यें। सीधे, पेट के बल कभी न सोयें, ब्रह्मचारी को दार्या करवट सोना चाहिए। सोते समय पैर के ऊपर पैर न रखें, आगे पीछे रखें। सिर पूर्व वा दक्षिण की ओर ही रखें।
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