ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश
Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहाशय रणधीर सिंह जी का जन्म गान्धरा गाँव जिला रोहतक में सन् १६२६ को महाशय श्री भानी सिंह रिसालदार के यहाँ हुआ। आपके पिता श्री बडे धर्मात्मा व दानी महानुभाव थे। अपनी वीरता के कारण ही आपने सेना में रिसालदार का पद प्राप्त किया। सेना से निवृत्त होकर आए तो आपकी दान की ख्याति सुनकर लोग जिस दिन पेंशन लेने आप जाते उस दिन सैंकड़ों याचक आपके समक्ष उपस्थित होते, आप सारी पेंशन का उनको सामान खरीद कर देते जो शेष बच जाते उनको अगली पेंशन के उधार पर सामान दिलवा देते आप घर पर एक भी पैसा नहीं पहुँचा पाते। घर का खर्चा खेती-बाड़ी में चल जाता। स्वयं महाशय रणधीर जी भी पिताश्री से कम नहीं निकले। घर से दूध बेचने के बहाने ले जाते और रोहतक अस्थल बोहर डेरे में साधु सन्तों को पिलाकर वापिस आ जाते। घर का खर्च आपकी धर्मपत्नी धनकौर देवी जी अपनी कर्मठता से तथा आप भी कृषि से चलाते। आपके चार पुत्र, दो पुत्रियाँ क्रमशः राजवीर, तसवीर, सुखवीर, जगवीर, कृष्णा व दर्शना है। पिछले बीस वर्षों से लगातार दैनिक अग्निहोत्र करते हुए यज्ञमय जीवन इस परिवार का चल रहा है। इस यज्ञ ने इस परिवार को प्रत्येक दिशा में उन्नत किया है। श्री राजवीर जी उपासक के मन में एक भावना सदा रहती थी कि मैं खेतों में घर बनाकर योगियों की तरह जीवन जीऊँ वह इच्छा इनकी पूरी हुई आज घरौटी जिला रोहतक
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