संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तत्राथ नगरीं रम्यां साट्टप्राकारतोरणाम् ।
गजाश्वरथशालाढ्यां राजवीथिविराजिताम् ॥६
सामंतानाममात्यानां सैनिकानां द्विजन्मनाम् ।
वेतालदासदासीनां गृहाणि रुचिराणि च ॥१०
मध्यं राजगृहं दिव्यं द्वारगोपुरभूषितम् ।
शालाभिर्बहुभिर्युक्तं सभाभिरुपशोभितम् ॥११
सिंहासनसभां चैव नवरत्नमयीं शुभाम् ।
मध्ये सिंहासनं दिव्यं चिंतामणिविनिर्मितम् ॥१२
स्वयं प्रकाशमद्वंद्वमुदयादित्यसंनिभम् ।
विलोक्य चिंतयामास ब्रह्मा लोकपितामहः ॥१३
यस्त्वेतत्समधिष्ठाय वर्तते बालिशोऽपि वा ।
पुरस्यास्य प्रभावेण सर्वलोकाधिको भवेत् ॥१४
महान् गणों के ईश्वर स्वामी कार्त्तिकेय-वटुक-वीरभद्र-इन सबने आकर उस समय में प्रणत होकर महादेवी का स्तवन किया था।८। वहाँ पर जो एक नगरी की थी वह नगरी परमाधिक सुरम्य थी उसमें बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं—प्राकार और विशाल तोरण थे। उसमें गजअश्व और रथ शालाएं थीं। तथा राज वीथियाँ भी विद्यमान थीं। जिनसे वह परम शोभित हो रही थी ।६। उसमें सभी के पृथक्-पृथक् परम सुन्दर गृह बने थे—सामन्तों के—अमात्यों के—सैनिकों के और ब्राह्मणों के एवं वेताल के—दासों के और दासियों के गृह निर्मित थे ।१०। उस नगरी के मध्य में द्वारों और गोपुरों से समन्वित परम दिव्य राजगृह था। जिसमें बहुत सी शालायें और सभाएँ बनी हुई थीं। जिससे वह राजगृह उपशोभित था ।११। उसमें एक सिंहासन सभा थी जो नौ प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण और परम शुभ थी। उसके मध्य में एक दिव्य सिंहासन था जो चिन्ता मणियों के द्वारा ही निर्मित था। जिस मणि के समक्ष में जो चिन्तन किया जावे वही प्राप्त हो जाता है उसी को चिन्तामणि कहा जाता है ।१२। वह सिंहासन स्वयं प्रकाश करने वाला—अद्वन्द्व और उदित सूर्य के समान प्रभा वाला था। लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने जब उसका अवलोकन किया तो वे मन में चिन्तन करने लगे थे ।१३। जो भी कोई चाहे बालिश (महामूर्ख) ही क्यों