संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमदन कामेश्वर प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २१३
न हो, इस पर अधिष्ठित होता है वह इस परम सुरम्यपुर के प्रभाव से सभी लोकों से अधिक होता है ।१४।
न केवला स्त्री राज्यार्हा पुरुषोऽपि तया विना ।
मंगलाचार्यसंयुक्तं महापुरुषलक्षणम् ।
अनुकूलांगनायुक्तमभिषिच्छेदिति श्रुतिः ॥१५॥
विभातीयं वरारोहा मूर्ता शृङ्गारदेवता ।
वरोऽस्यास्त्रिषु लोकेषु न चान्यः शङ्करादृते ॥१६॥
जटिलो मुण्डधारी च विरूपाक्षः कपालभृत् ।
कल्माषी भस्मदिग्धांगः श्मशानास्थिविभूषणः ॥१७॥
अमंगलास्पदं चैनं वरयेत्सा सुमंगला ।
इति चिंतयमानस्य ब्रह्मणोऽग्रे महेश्वरः ॥१८॥
कोटिकन्दर्पलावण्ययुक्तो दिव्यशरीरवान् ।
दिव्यांबरधरः स्रग्वी दिव्यगन्धानुलेपनः ॥१९॥
किरीटहारकेयूरकुण्डलाद्यैरलंकृतः ।
प्रादुर्बभूव पुरतो जगन्मोहनरूपधृक् ॥२०॥
तं कुमारमथालिंग्य ब्रह्मा लोकपितामहः ।
चक्रे कामेश्वरं नाम्ना कमनीयवपुर्धरम् ॥२१॥
केवल स्त्री तो इस राज्य के योग्य नहीं है और केवल पुरुष भी स्त्री से रहित जो हो वह भी इसके योग्य नहीं है । श्रुति का कथन तो यही है कि—मङ्गल मय आचार्य से संयुत और महापुरुषों के लक्षण वाला तथा जो अनुकूल अङ्गना से युक्त हो उसीका राज्यासन पर अभिषेक करना चाहिए ।१५। यह वरारोहा शोभित होती है जो मूर्तिमती शृङ्गार की देवता है । इसका वर भी तीनों लोकों में भगवान् शिव के अतिरिक्त अन्य कोई भी नहीं है ।१६। किन्तु शङ्कर तो जटा जूट धारीमुण्डों की माला धारण करने वाले-विरूप नेत्रों से युक्त और हाथ में कपाल ग्रहण करने वाले हैं वे तो कल्माषी-भस्म से भूषित अङ्गों वाले और श्मशान की अस्थियों के भूषणों वाले हैं ।१७। शिव तो पूर्णतया अमङ्गलों के स्थान हैं । क्या यह सुमङ्गला उनका वरण करेगी यही इस प्रकार से ब्रह्माजी मन में विचार कर रहे थे