भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 624, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 624

२१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कि उसी समय में ब्रह्माजी के आगे महेश्वर प्रकट हो गये थे ।१८। उनका स्वरूप उस समय में करोड़ों कामदेवों के लावण्य से युक्त था और परम दिव्य शरीर से वे युक्त थे । उनके वस्त्र भी परम दिव्य थे तथा मालाऐं धारण किये हुए दिव्य सुगन्धित अनुलेपन वाले थे ।१६। वे किरीट—कुण्डल—केयूर और हार आदि आभरणों से समलङ्कृत थे । इस प्रकार का जगत् के तोहन करने वाले स्वरूप को धारण किये हुए ब्रह्माजी के सामने प्रादुर्भूत हुए थे ।२०। लोक पितामह ब्रह्माजी ने उस कुमार का आलिङ्गन करके उनका नाम कामेश्वर रख दिया था क्योंकि वे परम कमनीय को धारण करने वाले थे ।२१।

तस्यास्तु परमाशक्तेरनुरूपो वरस्त्वयम् ।
इति निश्चिय्य तेनैव सहितास्तामथाययुः ॥२२

अस्तुवंस्तु परां शक्तिं ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
तां दृष्ट्वा मृगशावाक्षीं कुमारो नीललोहितः ।
अभवन्मन्मथाविष्टो विस्मृत्य सकलाः क्रियाः ॥२३

सापि तं वीक्ष्य तन्वङ्गीमूर्तिमंतमिव स्मरम् ।
मदनाविष्टसर्वाङ्गी स्वात्मरूपममन्यत ।
अन्योन्यालोकनासौ तावुभौ मदनातुरौ ॥२४

सर्वभावविशेषज्ञौ धृतिमंतौ मनस्विनौ ।
परैज्ञातचारित्रौ मुहूर्तंस्वस्थचेतनौ ॥२५

अथोवाच महादेवीं ब्रह्मा लोकैकनायिकाम् ।
इमे देवाश्च ऋषयो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
त्वामीशां द्रष्टुमिच्छन्ति सप्रियां परमाहवे ॥२६

को वानुरूपस्ते देवि प्रियो धन्यतमः पुमान् ।
लोकसंरक्षणार्थाय भजस्व पुरुषं परम् ॥२७

राज्ञी भव पुरस्यास्य स्थिता भव वरासने ।
अभिषिक्तां महाभागैर्देवर्षिभिरकल्मषैः ॥२८

साम्राज्यचिह्नसंयुक्तां सर्वाभरणसंयुताम् ।
सप्रियामासनगतां द्रष्टुमिच्छामहे वयम् ॥२६