भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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वैवाहिकोत्सव वर्णन ] [ २१५

उन्होंने कहा था कि यह तो उस परमा शक्ति के सर्वथा अनुकूलवर हैं—ऐसा निश्चय करके शिव के ही साथ वे वहाँ देवी के समीप में समागत हो गये थे ।२२। उन ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर ने उस पराशक्ति का स्तवन किया था । उस शक्ति का अवलोकन करके ही जो मृगशावक के समान परम सुन्दर नेत्रों वाली थी वे नीललोहित कुमार समस्त क्रियाओं को भुला कर कामासक्त हो गये थे ।२३। वह तन्वङ्गी भी मूर्त्तिमान् कामदेव के सदृश उनको देखकर मदन से आविष्ट अङ्ग वाली उसने भी उसको अपने ही अनुरूप मान लिया था । परस्पर में एक दूसरे के देखने में आसक्त दोनों ही काम से आतुर हो गये थे । ये दोनों ही सक्त भावों की विशेषता के ज्ञाता- धृति (धीरज) मान् और परम मनस्वी थे । दूसरों के द्वारा इनका चरित्र ज्ञात नहीं हो सकता है ऐसे ये दोनों ही एक मुहूर्त्त मात्र समय तक तो चेतना से शून्य हो गये थे ।२५। इसके उपरान्त ब्रह्मा जी उस लोकों की एक नायिका से बोले—ये देवगण—ऋषि लोग—गन्धर्व और अप्सराओं का समुदाय स्वामिनी आपको इस परमाहव में अपने प्रिय के ही साथ में सम- न्वित देखने की इच्छा रखते हैं ।२६। हे देवि ! अब आप यही कृपया बत- लाइए कि आपका अनुरूप प्रिय कौनसा धन्यतम पुरुष है ? अब आप लोकों के सरक्षण के लिए परम पुरुष का सेवन करिए ।२७। आप इस नगर की महारानी बनिए और इस वरासन पर विराजमान होइए । इन कल्मष रहित देवर्षियों के द्वारा ही हे महाभागे आप अभिषिक्त हो जाइए ।२८। हम तो अब यही अपने नेत्रों से देखने की अभिलाषा रखते हैं कि आप साम्राज्य के चिह्नों से समन्विता होवें और सभी आभरणों से समलङ्कृत होवें । आप अपने परम प्रिय के साथ आसन पर स्थित होवें ।२६।

—X—

वैवाहिकोत्सव वर्णन

तच्छ्रुत्वा वचनं देवी मंदस्मितमुखांबुजा । उवाच स ततो वाक्यं ब्रह्मविष्णुमुखान्सुरान ॥१ स्वतंत्राहं सदा देवाः स्वेच्छाचारविहारिणी । ममानुरूपचरितो भविता तु मम प्रियः ॥२ तथेति तत्प्रतिश्रुत्य सर्वैर्देवैः पितामहः । उवाच च महादेवीं धर्मार्थसहितं वचः ॥३