भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१६ ] [ कालिका पुराण

कालक्रीता क्रयक्रीता पितृदत्ता स्वयंयुता ।
नारीपुरुषयोरेवमुद्वाहस्तु चतुर्विधः ॥४
कालक्रीता तु वेश्या स्यात्क्रयक्रीता तु दासिका ।
गन्धर्वोद्वाहिता युक्ता भार्या स्यात्पितृदत्तका ॥५
समानधर्मिणी युक्ता पितृवशंवदा ।
यदद्वैतं परं ब्रह्म सदसद्भाववर्जितम् ॥६
चिदानन्दात्मकं तस्मात्प्रकृतिः समजायत ।
त्वमेवासीच्च तद्ब्रह्म प्रकृतिः सा त्वमेव हि ॥७

यह श्रवण करके देवी के मुख कमल पर मन्द सी मुस्कान रेखा दौड़ गयी थी। इसके अनन्तर उस देवी ने उन ब्रह्मादिक जिनमें प्रमुख थे उन देवों से कहा था—हे देवगणो ! मैं परम स्वतन्त्र हूँ और सदा ही अपनी ही इच्छा से विहार करने वाली हूँ। मेरे ही अनुरूप चरित वाला ही मेरा प्रिय होगा ।१-२। ऐसा ही होगा—यह प्रतिज्ञा करके सब देवों के साथ पितामह ने उस देवी से धर्मार्थ के सहित वचन कहा था ।३। विवाह तो चार प्रकार का हुआ करता है—नारी और पुरुष का विवाह होता है—एक तो काल क्रीता नारी होती है—एक क्रय क्रीतानारी है—एक पितृदत्ता है और एक स्वयं युता होती है। काल क्रीता वेश्या होती है जो कुछ काल तक उपभोग के काम आती है। क्रयक्रीता दासी होती है जिसको जीवन भर भोग के लिए खरीद लिया जाया करता है। गान्धर्व विवाह से अर्थात् दोनों ही रजा मन्दी से प्रेम करके नारी बना लेते हैं यह स्वसंयुता होती है और जो भार्या होती है वह तो कन्या को पिता दान किया करता है, यही पितृदत्ता है ।५। समान धर्म वाली भार्यायुक्त होती है जो पिता के वशंवदा होती है और पिता जिसको भी योग्य वर समझता है उसे ही अपनी कन्या को दे दिया करता है। जो ब्रह्म अद्वैत है और सदसद्भाव से वर्जित है वह चिदानन्द स्वरूप वाला है। उससे प्रकृति समुत्पन्न हुआ करती है। आप ही तो वह ब्रह्म हैं और आप ही प्रकृति हैं ।६-७।

त्वमेवानादिरखिला कार्यकारणरूपिणी ।
त्वामेव सि विचिन्वंति योगिनः सनकादयः ॥८