संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैवाहिकोत्सव वर्णन ] [ २१७
सदसत्कर्मरूपां च व्यक्ताव्यक्तो दयात्मिकाम् ।
त्वामेव हि प्रशंसंति पञ्चब्रह्मस्वरूपिणीम् ॥६
त्वामेव हि सृजस्यादौ त्वमेव ह्यवसि क्षणात् ।
भजस्व पुरुषं कंचिल्लोकानुग्रहकाम्यया ॥१०
इति विज्ञापिता देवी ब्रह्मणा सकलैः सुरैः ।
स्रजमुद्यम्य हस्तेन चिक्षेप गगनांतरे ॥११
तयोत्सृष्टा हि सा माला शोभयन्ती नभःस्थलम् ।
पपात कण्ठदेशे हि तदा कामेश्वरस्य तु ॥१२
ततो मुमुदिरे देवा ब्रह्मविष्णुपुरोगमाः ।
ववृषुः पुष्पवर्षाणि मन्दवातेरिता घनाः ॥१३
अथोवाच विधाता तु भगवंतं जनार्दनम् ।
कर्तव्यो विधिनोद्वाहस्त्वनयोः शिवयोर्हरे ॥१४
हे देवि ! आप ही अखिला-अनादि और कार्य का रण दोनों के स्वरूप वाली हैं। सनकादि योगीजन आपको ही खोजा करते हैं। ८। सत् और असत् कर्मों के स्वरूप वाली—व्यक्त तथा अव्यक्त-दया से स्वरूप वाली आप ही की पर ब्रह्म स्वरूप वाली की सब प्रशंसा किया करते हैं। आप ही आरम्भ में सृजन किया करती हैं और आप ही क्षण भर में परिपालन किया करती हैं। अब लोकों पर अनुग्रह करने की आकाङ्क्षा से ही आप किसी भी पुरुष का सेवन करिये। ६-१०। इस प्रकार से ब्रह्माजी तथा समस्त सुरों के द्वारा जब वह देवी विज्ञापित की गयी थी तो उसने अपने हाथ से एक माला उठाकर नभ मण्डल के मध्य में प्रक्षिप्त कर दी थी ।११। उस देवी के द्वारा ऊपर की ओर प्रक्षिप्त की हुई वह माला आकाश मण्डल को सुशोभित करती हुई उस समय में कामेश्वर प्रभु के कण्ठ भाग में आकर गिर गयी थी ।१२। फिर तो ब्रह्मा और विष्णु जिनमें अग्रणी थे ऐसे समस्त देवगण बहुत प्रसन्न हुए थे और मन्द वायु से सम्प्रेरित मेघों ने पुष्पों की वर्षा की थी ।१३। इसके अनन्तर विधाता ने भगवान् जनार्दन से कहा—हे हरे ! अब इन दोनों शिव और शिवा का उद्वाह वैदिक विधान से करा देना चाहिए। ।१४।