भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मुहूर्तो देवसम्प्राप्तो जगन्मंगलकारकः । त्वद्रूपा हि महादेवी सहजश्च भवानपि ॥१५ दातुमर्हंसि कल्याणीमस्मै कामशिवाय तु । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य देवदेवस्त्रिविक्रमः ॥१६ ददौ तस्यै विधानेन प्रीत्या तां शङ्कराय तु । देवर्षिपितृमुख्यानां सर्वेषां देवयोगिनाम् ॥१७ कल्याणं कारयामास शिवयोरादिकेशवः । उपायनानि प्रददु सर्वे ब्रह्मादयः सुराः ॥१८ ददौ ब्रह्मेक्षुचापं तु वज्रसारमनश्वरम् । तयोः पुष्पायुधं प्रादादम्लानं हरिरव्ययम् ॥१६ नागपाशं ददौ ताभ्यां वरुणो यादसांपतिः । अङ्कुशं च ददौ ताभ्यां विश्वकर्मा विशांपतिः ॥२० किरीटमग्निः प्रायच्छत्ताटंकौ चन्द्रभास्करौ । नवरत्नमयीं भूषां प्रादाद्रत्नाकरः स्वयम् ॥२१

अब देव से सम्प्राप्त जगत् का मङ्गल करने वाला मुहूर्त्त प्राप्त हो गया है । यह महादेवी आपके ही स्वरूप वाली है और आप भी सहज ही हैं ।१५। इस कल्याणी को आप देने के योग्य होते हैं और इन काम रूप शिव के लिये प्रदान कर दीजिए । देवों के देव त्रिविक्रम भगवान् ने यह श्रवण करके उस देवी का दान करने का उपक्रम किया था ।१६। उन देवगण योगिगण सब देव-ऋषि और पितृगणों के मध्य में भगवान् विष्णु ने उस देवी को वैदिक विधि से भगवान् शङ्कर को प्रदान किया था और बड़ी प्रसन्नता से वह कन्यादान किया था ।१७। आदि केशव प्रभु ने उन दोनों शिवा और शिव का कल्याण करा दिया था और समस्त ब्रह्मादिक सुरगणोंने बहुतसे उपायन समर्पित किये थे ।१८। ब्रह्माजी ने तो इक्षु चाप दिया था श्री अविनाशी और वज्र के समान सार वाला था । भगवान् श्रीहरि ने उन दोनों पति-पत्नी को अविनाशी और अम्लान कुसुमों का आयुध समर्पित किया था ।१६। जल सागरों के स्वामी वरुण ने उन दोनों के लिए नाग पाश दिया था और निशापति विश्वकर्मा ने उन दोनों के लिए अंकुश अर्पित किया था ।२०।