संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैवाहिकोत्सव वर्णन ] [ २१६
अग्नि देव ने किरीट समर्पित किया था और चन्द्र तथा भास्कर देवों ने दो ताटंक दिये थे। रत्नाकर ने स्वयं समुपस्थित होकर नौ प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण भूषा प्रदान की थी ॥२१॥
ददौ सुराणामधिपो मधुपात्रमथाक्षयम् ।
चिन्तामणिमयीं मालां कुबेरः प्रददौ तदा ॥२२
साम्राज्यसूचकं छत्रं ददौ लक्ष्मीपतिः स्वयं ।
गङ्गा च यमुना ताभ्यां चामरे चन्द्रभास्वरे ॥२३
अष्टौ च वसवो रुद्रा आदित्याश्चाश्विनौ तथा ।
दिक्पाला मरुतः साध्या गन्धर्वाः मथेश्वराः ।
स्वानिस्वान्यायुधान्यस्यै प्रददुः परितोषिताः ॥२४
रथांश्च तुरगान्नागान्महावेगान्महाबलान् ।
उष्ट्रानरोगानश्वांस्तांक्ष् तृष्णापरिवर्जितान् ।
ददुर्वज्रोपमाकारान्सायुधान्सपरिच्छदान् ॥२५
अथाभिषेकमातेनुः साम्राज्ये शिवयोः शिवम् ।
अथाकरोद्विमानं च नाम्ना तु कुसुमाकरम् ॥२६
विधाताम्लानमालं वै नित्यं चाभेद्यमायुधैः ।
दिवि भुव्यंतरिक्षे च कामगं सुसमृद्धिमत् ॥२७
यद्गन्धघ्राणमात्रेण भ्रांतिरोगक्षुधार्त्तयः ।
तत्क्षणादेव नश्यन्ति मनोल्हादकरं शुभम् ॥२८
सुरगणों के अधिप महेन्द्र ने उस समय में एक अक्षय मधुपात्र दिया था। उस समय में कुबेर ने एक माला दी थी जो चिन्तामणियों से निर्मित की हुई थी ।२२। लक्ष्मी के स्वामी नारायण ने स्वयं ही एक साम्राज्य का सूचक छत्र अर्पित किया था। गङ्गा और यमुना ने उनको चन्द्र के ही समान भास्कर दो चमर दिए थे ।२३। आठ वसुगण रुद्रगण—आदित्य—अश्विनी-कुमार—दिक्पाल—मरुद्गण—साध्य—गन्धर्व—प्रमथेश्वर—इन सभी ने परम परितोषित होते हुए अपने-अपने आयुध उस महादेवी के लिए समर्पित किये थे ।२४। और रथ—तुरग तथा नाग जो महान बली और अधिक वेग से समन्वित थे एवं नीरोग उष्ट्र (ऊँट) और अश्व जो क्षुधा और प्यास से रहित