संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभण्डपुत्र वध वर्णन ] [ ३४६
ताभिर्न निहतो दुष्टो यस्माद्वध्यः स दानवः । दण्डनाथाशरेणैव कालदण्डसमत्विषा ॥१०३ तस्मिन्पलायिते दुष्टे विषङ्गे भण्डसोदरे । स विभाता च रजनी प्रसन्नाश्चाभवन्दिशः ॥१०४ पलायितं रणे वीरमनुसर्तुं मनौचिती । इति ताः समरान्नित्यास्तस्मिन्काले व्यरंसिषुः ॥१०५
चित्रा ने चन्द्रगुप्त को और दुश्शील चित्र का विमर्दन किया था। सभी दुरात्मा सेनापतियों के निहत हो जाने पर विषङ्ग युद्ध के लिये चल दिया था । ९९। विषम बड़ा बलवान् था और बहुत क्रुद्ध होकर आगे गया था। इसके बाद रात्रि में एक प्रहर शेष रह गया था जो केवल दो घड़ी का समय था ।१००। उस दुष्ट आशय वाले ने नित्याओं के साथ संग्राम किया था किन्तु जब उसने यह देखा था जीत नहीं हो सकती है तो उसने वहाँ से भाग जाने की ही इच्छा की थी ।१०१। कामेश्वरी के हाथों से खींचे हुए धनुष से निकले हुए पैने बाणों से विषङ्ग का कवच छिन्न हो गया था और वह बहुत अधिक विह्वल हो गया था। वहाँ पर जो भी मरने से बचे थे उन सभी सैनिकों के ही साथ में भाग खड़ा हुआ था ।१०२। उन्होंने उस दुष्ट का वध नहीं किया था क्योंकि वह दानव तो कालदण्ड की कान्ति वाले दण्डनाथा के ही शर से मारे जाने योग्य था ।१०३। भण्ड के सहोदर उस दुष्ट विषंग के भाग जाने पर वह रात्रि विभात हो गयी थी और सब दिशाएँ प्रसन्न हो गयी थीं ।१०४। रण में भागे हुए के पीछे गमन करना उचित नहीं था अतएव वे नित्याएं उस संग्राम से उस समय विरत हो गयी थीं ।१०५।
दैत्यशस्त्रव्रणस्यंदिशोणितप्लुतविग्रहाः । नित्याः श्रीललितां देवीं प्रणिपेतूर्जयोद्धताः ॥१०६ इत्थं रात्रौ महद्युद्धं तत्र जातं भयंकरम् । नित्यानां रूपजालं च शस्त्रक्षतमलोकयत् ॥१०७ श्रुत्वोदन्तं महाराज्ञी कृपापांगेन सैक्षत । तदालोकनमात्रेण व्रणो निर्व्रणतामगात् ॥१०८ नित्यानां विक्रमैश्चापि ललिता प्रीतिमासदत् ॥१०६