संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अथ क्रुद्धो भंडदैत्यः क्रोधाद्धंकारमातनोत् ।
तस्माद्धंकारतो जातश्चंद्रहासकृपाणवान् ॥११२
फिर महादेवी के दाहिने हाथ की कनिष्ठिका के नख के अग्रभाग से महान् ओज वाले वामन सैकड़ों ही उसके दर्प के विनाश करने के लिए हुए थे जो छोड़े गये थे ।१०६। एक-एक क्षण में बढ़े हुए—हाथों में पाश लिये हुए महा बलवान् अस्त्र से समुत्पन्न बलीन्द्रों को पाशों बन्धनों से बाँधते हुए थे ।१०७। दाहिने हाथ की कनिष्ठा के अग्रभाव से कामेशयोषित् उत्पन्न हुई थीं जिनके विशाल शरीर थे और महान उत्साह था अस्त्र का उन्होंने विनाश कर दिया था ।१०८। भंडदैत्य ने फिर उस संग्राम में हैहयास्त्र छोड़ा था। उससे सहस्रों ही सहस्रार्जुन समुत्पन्न हो गये थे ।१०६। इसके पश्चात् ललिता के अंगुष्ठ के अग्रभाग से क्रोधयुक्त प्रज्वलित सिंहनाद वाले भार्गव राम प्रकट हुए थे ।११०। उन्होंने कठोर परशु की धार से इन सब सहस्रों सहस्रार्जुनो को विदीर्ण करके एक ही क्षण में विनष्ट कर दिया था ।१११। इसके पश्चात् भंड दैत्य ने क्रोध से हुङ्कार की थी। उस हुङ्कार से चन्द्रहास कृपाणवान् उत्पन्न हो गया था ।११२।
सहस्राऽक्षौहिणीरक्षः सेनया परिवारितः ।
कनिष्ठं कुम्भकर्णं च मेघनादं च नन्दनम् ।
गृहीत्वा शक्तिसैन्यं तदतिदूरममर्दयत् ॥११३
अथ श्रीललितावामहस्ततर्जनिकानखात् ।
कोदण्डरामः समभूल्लक्ष्मणेन समन्वितः ॥११४
जटामुकुटवान्वल्लीबद्धतूणीरपृष्ठभूः ।
नीलोत्पलदलश्यामो धनुर्विस्फारयन्मुहुः ॥११५
नाशयामास दिव्यास्त्रैः क्षणाद्राक्षससैनिकम् ।
मर्दयामास पौलस्त्यं कुम्भकर्णं च सोदरम् ।
लक्ष्मणो मेघनादं च महावीरमनाशयत् ॥११६
द्विविदास्त्रं महाभीममसृजद्भंडदानवः ।
तस्मादनेकशो जाताः कपयः पिंगलोचनाः ॥११७
क्रोधेनात्यंतताम्रास्याः प्रत्येकं हनुमत्समाः ।