संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभण्डासुर वध वर्णन ] [ ४१७
व्यनाशयच्छक्तिसैन्यं क्रूरकेंकारकारिणः ॥११८
अथ श्रीललितावामहस्तमध्यांगुलीनखात् । आविर्बभूव तालांकः क्रोधमध्यारुणेक्षणः ॥११९
वह सहस्रों राक्षसों की सेना से घिरा हुआ था। छोटा भाई कुम्भकर्ण और नन्दन मेघनाद को लेकर उसने शक्तियों की सेना को दूर तक मर्दित कर दिया था ॥११३। इसके अनन्तर ललिता देवी के बाँये हाथ की कनिष्ठिका के अग्रभाग से लक्ष्मण के सहित कोदण्डराम उत्पन्न हुए थे ॥११४। वह श्रीराम जटा और मुकुट धारी थे जिनके पृष्ठ पर तूणीर था—वे नीलकमल के समान श्याम वर्ण के थे और बार-बार धनुष को विस्फारित कर रहे थे ॥११५। उन्होंने एक ही क्षण में दिव्यास्त्रों से राक्षसों की सेना का विनाश कर दिया। कुम्भकर्ण भाई को और पोलस्त्य को मर्दित कर दिया था। लक्ष्मण ने मेघनाद को जो महान वीर था विनष्ट कर दिया था ॥११६। भंड ने फिर द्विविदास्त्र को उत्पन्न किया था। उससे अनेक कपिगण पिङ्गलोचनों वाले उत्पन्न हो गये थे ॥११७। वे क्रोध से अत्यन्त ताम्रमुखों वाले थे और सभी हनुमान के तुल्य थे। वे क्रूर केङ्कारकारी थे और उन्होंने शक्तियों की सेना का विनाश किया था। ११८। इसके उपरान्त श्री ललिता के बाँये हाथ की मध्यमा के नख से तालाङ्क आविर्भूत हुआ था जो क्रोध से अरुण लोचनों वाला था ॥११६।
नीलांवरपिनद्धांगः कैलासाचलनिर्मलः । द्विविदास्त्रसमुद्भूतान्कपीन्सर्वान्व्यनाशयन् ॥१२०
राजासुरं नाम महत्ससर्जास्त्रं महाबलः । तस्मादस्त्रात्समुद्भूता बहवो नृपदानवाः ॥१२१
शिशुपालो दन्तवक्त्रः शाल्वः काशीपतिस्तथा । पौंड्रको वासुदेवश्च रुक्मी डिंभकहंसको ॥१२२
शम्बरश्च प्रलंबश्च तथा बाणासुरोऽपि च । कंसश्चाणूरमल्लश्च मुष्टिकोत्पलशेखरौ ॥१२३
अरिष्टो धेनुकः केशी कालियो यमलार्जुनौ । पूतना शकटश्चैव तृणावर्तादयोऽसुराः ॥१२४