भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

नरकाख्यो महावीरो विष्णुरूपी मुरासुरः । अनेके सह सेनाभिरुत्थिताः शस्त्रपाणयः ॥१२५ तान्विनाशयितुं सर्वान्वासुदेवः सनातनः । श्रीदेवीवामहस्ताब्जानामिकानखसंभवः ॥१२६

नीले वस्त्रसे उसका अङ्गपिनद्ध था और कैलासके समज निर्मल था । द्विविदास्त्र से उत्पन्न समस्त कपियों का उसने विनाश कर दिया था ।१२०। उस महा बलवान ने राजासुर नामक महान अस्त्र को छोड़ा था । उस अस्त्र से बहुत से भूत दानव समुत्पन्न हुए थे ।१२१। उनमें शिशुपाल दन्त वक्त्र-शाल्व-काशीपति-पौण्ड्रक-वासुदेव-रुक्मीडिम्भक हंसक थे ।१२२। शम्बर-प्रलम्ब-बाणासुर भी था । कंस-चाणूर मल्ल-मुष्टिक-उत्पल शेखर थे ।१२३। अरिष्ट-धेनु-ककेशी-कालिय-यमलार्जुन-पूतना-शकर-तृणावर्त्त आदि असुर सभी थे ।१२४। महावीर नरक ओर विष्णुरूपी मुर असुर था । ऐसे बहुत से हथियारों को हाथों में लेकर सेनाओं के साथ आविर्भूत हो गये थे ।१२५। उन सबके विनाश करने के लिए श्री देवी के बाँये हाथ की अनामिका के नख से संभूत सनातन वासुदेव प्रकट हुए थे ।१२६।

चतुर्व्यूहं समातेने चत्वारस्ते ततोऽभवन् । वासुदेवो द्वितीयस्तु संकर्षण इति स्मृतः ॥१२७ प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च ते सर्वे प्रोद्यतायुधाः । तानशेषान्दुराचारान्भूमेर्भारप्रवर्तकान् ॥१२८ नाशयामासुरुर्वीशवेषच्छन्नान्महासुरान् ॥१२९ अथ तेषु विनष्टेषु संक्रुद्धो भंडदानवः । धर्मविप्लावकं घोरं कल्यस्त्रं सममुञ्चत ॥१३० ततः कल्यस्त्रतो जाता आंध्राः पुण्ड्राश्च भूमिपाः । किराताः शवरा हूणा यवनाः पापवृत्तयः ॥१३१ वेदविप्लावका धर्मद्रोहिणः प्राणिहिंसकाः । वर्णाश्रमेषु सांकर्यकारिणो मलिनांगकाः ।