संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभंडासुर वध वर्णन ] [ ४१६
ललिताशक्तिसैन्यानि भूयोभूयो व्यमर्दयन् ॥१३२
अथ श्रीललितावामहस्तपद्मस्य भास्वतः।
कनिष्ठिकानखोद्भूतः कल्किर्नाम जनार्दनः ॥१३३
वे चारों ने चतुर्व्यूह बनाया था जो फिर हुए थे। उनमें वासुदेव—दूसरे संकर्षण थे। १२७। तीसरे प्रद्युम्न और चौथे अनिरुद्ध थे। ये सभी आयुधों से समुद्यत थे। इन्होंने उन दुराचारियों को जो भूमि पर भार के प्रवर्त्तक थे। १२८। वे राजा के रूप में छिपे हुए महासुर थे उन सबका विनाश कर दिया था। १२९। इन सबके विनष्ट होने पर भण्डासुर बहुत क्रुद्ध हुआ था और फिर उसने धर्म के विप्लावक घोर कलि के अस्त्र को छोड़ा था। १३०। उससे आन्ध्र और पुण्ड्र राजा उत्पन्न हुए थे। किरात-शवर-हूण और यवन पापवृत्ति वाले उत्पन्न हुए। १३१। ये सब वेदों के विप्लावक—धर्मद्रोही और प्राणियों के हिंसक थे। इनके अङ्ग मलिन थे तथा वर्णाश्रमों में सांकर्य करने वाले थे। इन्होंने ललिता शक्ति की सेनाओं का बार-बार विमर्दन किया था। १३२। इसके पश्चात् ललिता के वाम कर कमल से जो प्रज्वलित कनिष्ठका के नख से उत्पन्न कल्कि नामक जनार्दन प्रभु हुए थे। १३३।
अश्वारूढः प्रदीप्तश्रीरट्टहासं चकार सः।
तस्यैव ध्वनिना सर्वे वज्रनिष्पेषबन्धुना ॥१३४
किराता मूच्छिता नेशुः शक्तयश्चापि हर्षिताः।
दशावतारनाथास्ते कृत्वेदं कर्म दुष्करम् ॥१३५
ललितां तां नमस्कृत्य बद्धांजलिपुटाः स्थिताः।
प्रतिकल्पं धर्मरक्षां कतुं मत्स्यादिजन्मभिः।
ललितांबानियुक्तास्ते वैकुण्ठाय प्रतस्थिरे ॥१३६
इत्थं समस्तेष्वस्त्रेषु नाशितेषु दुराशयः।
महामोहास्त्रमसृजच्छक्तयस्तेन मूर्च्छिताः ॥१३७
शांभवास्त्रं विसृज्यांबा महामोहास्त्रमक्षिणोत्।
अस्त्रप्रत्यस्त्रधाराभिरित्थं जाते महाहवे।
अस्तशैलं गभस्तीशो गन्तुमारभतारुणः ॥१३८