संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अथ नारायणास्त्रेण सा देवी ललितांबिका ।
सर्वा अक्षौहिणीस्तस्य भस्मसादकरोद्रणे ॥१३९
अथ पाशुपतास्त्रेण दीप्तकालानलत्विषा ।
चत्वारिंशच्चमूनाथान्महाराज्ञी व्यमर्दयत् ॥१४०
यह अश्व पर आरूढ़ थे और इनकी श्री प्रदीप्त थी । इनने अट्टहास किया था । उसकी वज्र के समान ध्वनि से सभी किरात बेहोश हो गये थे ।१३४। सब मूर्च्छित होकर नष्ट हो गये थे और शक्तियां हर्षित हो गयी थीं । दशावतारों के नाथों ने इस दुष्कर कर्म को करके सम्पन्न किया था ।१३५। फिर उस ललिता देवी को नमस्कार करके हाथ जोड़कर उसके आगे स्थित हो गये थे । प्रत्येक कल्प में मत्स्य आदि धर्म की रक्षा करने के लिए ललिताम्बा के द्वारा नियुक्त थे वे फिर वैकुण्ठ को चले गये ।१३६। इस रीति से समस्त अस्त्रों के विनाशित होने पर उस दुराशय ने महामोहास्त्र को छोड़ दिया था जिससे समस्त शक्तियां मूर्च्छित हो गयी थी ।१३७। जगदम्बा ने शाम्भव अस्त्र को छोड़कर उस महामोहास्त्र को नष्ट कर दिया था । इस तरह से अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों की धाराओं से महान युद्ध हुआ था । गभस्तीश अरुण अस्ताचल को जा रहा था । उस समय में ललितादेवी ने अस्त्र का प्रहार किया था ।१३८। उस देवी ललिताम्बा ने नारायणास्त्र से युद्ध में उसकी समस्त अक्षौहिणी सेनाओं को भस्मीभूत कर दिया था ।१३९। इसके अनन्तर दीप्त कालाग्नि के समान कान्ति वाले पाशुपतास्त्र से चालीस सेनानियों को महाराज्ञी ने विमर्दित कर दिया था ।१४०।
अर्थकशेषं तं दुष्टं निहताशेषबांधवम् ।
क्रोधेन प्रज्वलंतं च जगद्विप्लवकारिणम् ॥१४१
महासुरं महासत्त्वं भंडं चंडपराक्रमम् ।
महाकामेश्वरास्त्रेण सहस्रादित्यवर्चसा ।
गतासुमकरोन्माता ललिता परमेश्वरी ॥१४२
तदस्त्रज्वालयाक्रान्तं शून्यकं तस्य पट्टनम् ।
सस्त्रीकं च सबालं च सगोष्ठं धनधान्यकम् ॥१४३