भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भंडासुर वध वर्णन ] [ ४२१

निर्दग्धमासीत्सहसा स्थलमात्रमशिष्यत । भंडस्य संक्षयेणासीत्त्रैलोक्यं हर्षनर्तितम् ॥१४४

इत्थं विधाय सुरकार्यमनिन्द्यनीला श्रीचक्रराज- रथमंडलमंडनश्रीः । कामेश्वरी त्रिजगतां जननी वभासे विद्योतमान-

सैन्यं समस्तमपि सङ्गरकर्मखिन्नं भंडासुरप्रबलबाणकृशानुप्तप्तम् । अस्तं गते सवितरि प्रथितप्रभावा श्रीदेवता शिबिरमात्मन आनिनाय ॥१४६

यो भंडादानववधं ललितांबयेमं क्लृप्तं सकृत्पठति तस्य तपोधनेन्द्र । नाशं प्रयांति कंदनानि धृराष्टसिद्धेर्भुक्तिश्च मुक्तिरपि वर्तत एव हस्ते ॥१४७

इमं पवित्रं ललितापराक्रमं समस्तपापघ्नमशेषसिद्धिदम् । पठन्ति पुण्येषु दिनेषु ये नरा भजंति ते भाग्यसमृद्धिमुत्तमाम् ॥१४८

इसके उपरान्त वह दुष्ट एक ही शेष बच गया था और उसके सब बान्धव मर चुके थे । वह भी क्रोध से प्रज्वलित हो रहा था और इस जगत् के विप्लव को करने वाला था ।१४१। महान् प्रचण्ड महान् सत्व युक्त उस महासुर को सहस्र सूर्यों के समान वर्चस् वाले महाकामेश्वरास्त्र से परमेश्वरी ललिता ने भंड को गत प्राण कर दिया था ।१४२। उसके अस्त्र की ज्वाला से उसका शून्यक नगर भी स्त्रियों—बालों—गोष्ठों और धान्यों के सहित तुरन्त ही निर्दग्ध हो गया था। उस भंडासुर के विनाश से तीनों लोक हर्षित हुए थे ।१४३-१४४। इस प्रकार से अनिन्द्यशील वाली देवी देवों के कार्य को करके श्रीचक्रराज रथ के मंडल की श्री वह तीनों जगतों की जननी वह कामेश्वरी विजय श्री से सुसम्पन्न विद्योतमान वैभव वाली शोभित हुई थी ।१४५। समस्त सेना भी युद्ध कर्म में खिन्न हो गयी थी और