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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

४२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अथ नारायणास्त्रेण सा देवी ललितांबिका ।
सर्वा अक्षौहिणीस्तस्य भस्मसादकरोद्रणे ॥१३९
अथ पाशुपतास्त्रेण दीप्तकालानलत्विषा ।
चत्वारिंशच्चमूनाथान्महाराज्ञी व्यमर्दयत् ॥१४०

यह अश्व पर आरूढ़ थे और इनकी श्री प्रदीप्त थी । इनने अट्टहास किया था । उसकी वज्र के समान ध्वनि से सभी किरात बेहोश हो गये थे ।१३४। सब मूर्च्छित होकर नष्ट हो गये थे और शक्तियां हर्षित हो गयी थीं । दशावतारों के नाथों ने इस दुष्कर कर्म को करके सम्पन्न किया था ।१३५। फिर उस ललिता देवी को नमस्कार करके हाथ जोड़कर उसके आगे स्थित हो गये थे । प्रत्येक कल्प में मत्स्य आदि धर्म की रक्षा करने के लिए ललिताम्बा के द्वारा नियुक्त थे वे फिर वैकुण्ठ को चले गये ।१३६। इस रीति से समस्त अस्त्रों के विनाशित होने पर उस दुराशय ने महामोहास्त्र को छोड़ दिया था जिससे समस्त शक्तियां मूर्च्छित हो गयी थी ।१३७। जगदम्बा ने शाम्भव अस्त्र को छोड़कर उस महामोहास्त्र को नष्ट कर दिया था । इस तरह से अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों की धाराओं से महान युद्ध हुआ था । गभस्तीश अरुण अस्ताचल को जा रहा था । उस समय में ललितादेवी ने अस्त्र का प्रहार किया था ।१३८। उस देवी ललिताम्बा ने नारायणास्त्र से युद्ध में उसकी समस्त अक्षौहिणी सेनाओं को भस्मीभूत कर दिया था ।१३९। इसके अनन्तर दीप्त कालाग्नि के समान कान्ति वाले पाशुपतास्त्र से चालीस सेनानियों को महाराज्ञी ने विमर्दित कर दिया था ।१४०।

अर्थकशेषं तं दुष्टं निहताशेषबांधवम् ।
क्रोधेन प्रज्वलंतं च जगद्विप्लवकारिणम् ॥१४१
महासुरं महासत्त्वं भंडं चंडपराक्रमम् ।
महाकामेश्वरास्त्रेण सहस्रादित्यवर्चसा ।
गतासुमकरोन्माता ललिता परमेश्वरी ॥१४२
तदस्त्रज्वालयाक्रान्तं शून्यकं तस्य पट्टनम् ।
सस्त्रीकं च सबालं च सगोष्ठं धनधान्यकम् ॥१४३

भंडासुर वध वर्णन ] [ ४२१

निर्दग्धमासीत्सहसा स्थलमात्रमशिष्यत । भंडस्य संक्षयेणासीत्त्रैलोक्यं हर्षनर्तितम् ॥१४४

इत्थं विधाय सुरकार्यमनिन्द्यनीला श्रीचक्रराज- रथमंडलमंडनश्रीः । कामेश्वरी त्रिजगतां जननी वभासे विद्योतमान-

सैन्यं समस्तमपि सङ्गरकर्मखिन्नं भंडासुरप्रबलबाणकृशानुप्तप्तम् । अस्तं गते सवितरि प्रथितप्रभावा श्रीदेवता शिबिरमात्मन आनिनाय ॥१४६

यो भंडादानववधं ललितांबयेमं क्लृप्तं सकृत्पठति तस्य तपोधनेन्द्र । नाशं प्रयांति कंदनानि धृराष्टसिद्धेर्भुक्तिश्च मुक्तिरपि वर्तत एव हस्ते ॥१४७

इमं पवित्रं ललितापराक्रमं समस्तपापघ्नमशेषसिद्धिदम् । पठन्ति पुण्येषु दिनेषु ये नरा भजंति ते भाग्यसमृद्धिमुत्तमाम् ॥१४८

इसके उपरान्त वह दुष्ट एक ही शेष बच गया था और उसके सब बान्धव मर चुके थे । वह भी क्रोध से प्रज्वलित हो रहा था और इस जगत् के विप्लव को करने वाला था ।१४१। महान् प्रचण्ड महान् सत्व युक्त उस महासुर को सहस्र सूर्यों के समान वर्चस् वाले महाकामेश्वरास्त्र से परमेश्वरी ललिता ने भंड को गत प्राण कर दिया था ।१४२। उसके अस्त्र की ज्वाला से उसका शून्यक नगर भी स्त्रियों—बालों—गोष्ठों और धान्यों के सहित तुरन्त ही निर्दग्ध हो गया था। उस भंडासुर के विनाश से तीनों लोक हर्षित हुए थे ।१४३-१४४। इस प्रकार से अनिन्द्यशील वाली देवी देवों के कार्य को करके श्रीचक्रराज रथ के मंडल की श्री वह तीनों जगतों की जननी वह कामेश्वरी विजय श्री से सुसम्पन्न विद्योतमान वैभव वाली शोभित हुई थी ।१४५। समस्त सेना भी युद्ध कर्म में खिन्न हो गयी थी और

४२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भंडासुर के प्रबल बाणों की अग्नि से संतप्त हो गयी थी । सूर्य के अस्त होने पर प्रथित प्रभाव वाली उसने जो श्री देवता थी अपने शिविर में बुला लिया था ।१४६। हे तपोधनेन्द्र ! जो भी कोई पुरुष ललिताम्बा के द्वारा किये गये इस भंडासुर के वध को एक बार भी पढ़ता है उसके सब दुःख विनष्ट हो जाते हैं और उसको आठ सिद्धियों की प्राप्ति होती है तथा भुक्ति और मुक्ति दोनों ही उसके हाथ में होती है ।१४७। यह पवित्र ललिता का पराक्रम समस्त पापों का नाशक और अशेष सिद्धियों का दाता है । जो मनुष्य पुण्य दिनों में इसको पढ़ते हैं वे उत्तम भाग्य की समृद्धि को प्राप्त किया करते हैं ।१४८।

॥ मदन पुनर्भव वर्णन ॥

अगस्त्य उवाच— अश्वानन महाप्राज्ञ श्रुतमाख्यानमुत्तमम् । विक्रमो ललितादेव्या विशिष्टो वर्णितस्त्वया ॥१॥ चरितैरनघैर्देव्याः सुप्रीतोऽस्मि हयानन । श्रुता सा महती शक्तिर्मंत्रिणीदण्डनाथयोः ॥२॥ पश्चात्किमकरोत्तत्र युद्धानन्तरमंबिका । चतुर्थदिनशर्वर्यां विभातायां हयानन ॥३॥ हयग्रीव उवाच— शृणु कुम्भज तत्प्राज्ञ यत्तया जगदम्बया । पश्चादाचरितं कर्म निहते भंडदानवे ॥४॥ शक्तीनामखिलं सैन्यं दैत्यायुधशतार्दितम् । मुहुराह्लादयामास लोचनैरमृताप्लुतैः ॥५॥ ललितापरमेशान्याः कटाक्षामृतधारया । जुहुयुं द्धपरिश्रांति शक्तयः प्रीतिमानसाः ॥६॥ अस्मिन्नवसरे देवा भंडमर्दनतोषिताः । सर्वेऽपि सेवितुं प्राप्ता ब्रह्मविष्णुपुरोगमाः ॥७॥

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४२३

अगस्त्यजी ने कहा—हे महान् प्राज्ञ ! हे अश्वानन ! आपने यह उत्तम आख्यान सुन लिया है। आपने जो ललिता देवी के विक्रम को विशेषता से युक्त वर्णन किया है। १। हे हयानन ! देवी के अनघ चरितों से मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ और मैंने मन्त्रिणी और दंडिनी की भी बड़ी भारी शक्ति का श्रवण किया है। २। उस युद्ध के अनन्तर उस अम्बिका ने क्या किया था। हे हयानन ! चौथे दिन की शर्वरी में विभात में क्या किया गया था। ३। हयग्रीव जी ने कहा—हे प्राज्ञ कुम्भज ! आप अब वही सुनिए जो भंडासुर के मरने पर जगदम्बा ने किया था। ४। शक्तियों की सम्पूर्ण सेना को जो दैत्यों के आयुधों से अर्दित हो गयी थी अपने अमृत से प्लुत लोचनों के द्वारा पुनः आह्लादित किया था। ५। परमेशानी ललिता देवी के कटाक्षों की अमृत धारा से शक्तियों ने युद्ध की श्रान्ति का त्याग कर दिया था और वे प्रसन्न मानस वाली हो गयी थीं। ६। इस अवसर में देवगण भंडासुर के मर्दन से प्रसन्न हुए थे। वे सभी जिनमें ब्रह्मा-विष्णु अगुआ थे उस देवी की सेवा करने के लिए समागत हो गये थे। ७।

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च शक्राद्यास्त्रिदशास्तथा ।
आदित्य वसवो रुद्रा मरुतः साध्यदेवताः ॥८

सिद्धाः किंपुरुषा यक्षा निर्ऋत्याद्या निशाचराः ।
प्रह्लादाद्या महादैत्याः सर्वेऽप्यंडनिवासिनः ॥९

आगत्य तुष्टुवुः प्रीत्या सिंहासनमहेश्वरीम् ॥१०

ब्रह्माद्या ऊचुः—
नमोनमस्ते जगदेकनाथे नमोनमः श्रीत्रिपुराभिधाने ।
नमोनमो भंडमहासुरघ्ने नमोऽस्तु कामेश्वरि वामकेशि ॥११

चिंतामणौ चिंतितदानदक्षेऽचिन्त्ये चिराकारतरंगमाले ।
चित्राम्बरे चित्रजगत्प्रसूते चित्राख्यनित्ये सुखदे नमस्ते ॥१२

मोक्षप्रदे मुग्धशशांकचूड़े मुग्धस्मिते मोहनभेददक्षे ।
मुद्रेश्वरीचर्चितराजतन्त्रे मुद्राप्रिये देवि नमोनमस्ते ॥१३

४२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

क्रूरांतकध्वंसिनि कोमलांगे कोपेषु कालीं तनुमादधाने ।
क्रोडानने पालितसैन्यचक्रे क्रोडीकृताशेषभये नमस्ते ॥१४

ब्रह्मा—विष्णु—रुद्र—शक्रादि सब देवगण—आदित्य—वसुगण—मरुद्गण—साध्य देवता—सिद्ध—किम्पुरुष—यक्ष—निर्ऋति आदि निशाचर—प्रह्लाद आदि महादैत्य—सभी अंड में निवास करने वाले वहाँ आकर उपस्थित हुए थे और उन्होंने प्रसन्नता से सिंहासनैश्वरी की स्तुति की थी ।८-१०। ब्रह्मादिक ने कहा—हे इस जगत की एक मात्र स्वामिनि ! आपको बारम्बार नमस्कार है । हे श्री त्रिपुराभिधाने ! आपको नमस्कार अनेक बार है । हे महान भंडासुर के हनन करने वाली ! हे कामेश्वरि ! हे वामकेशि ! आपकी सेवा में अनेकशः प्रणाम समर्पित हैं ।११। हे चिराकार तरङ्गमाले ! आप तो अचिन्तनीय हैं—आप चिन्तामणि के ही समान हैं तथा जो भी प्राणियों का चिन्तित होता है उसके प्रदान करने में दक्ष हैं । हे चित्राम्बदे ! हे चित्र जगत् प्रसूते ! हे चित्राख्य नित्ये ! आप सुखों के देने वाली है । आपको बारम्बार नमस्कार है ।१२। आप मोक्ष देने वाली हैं—मुग्धशशाङ्क चूडे ! आपका स्मित मोहन करने वाला है और आप मोहन करने वाला है और आप मोहन करने में परम दक्ष हैं। हे मुद्रेश्वरी निखिल राजतन्त्रे ! आप मुद्राप्रिया हैं । हे देवि ! आपको अनेक बार प्रणाम हैं ।१३। हे कोमलाङ्गे ! आप तो क्रूर अन्तक के ध्वंस करने वाली हैं। आप कोप के अवसरों पर काली का विग्रह धारण कर लेती हैं । आप कोप के अवसरों पर कालो का पालन किया है । हे क्रोड़ी-कृताशेष भये । आपको मेरा नमस्कार है ।१४।

षडंगदेवीपरिवारकृष्णे षडंगयुक्तश्रुतिवावयसृग्ये ।
षट्चक्रसंस्थे च षडूर्मियुक्ते षड्भावरूपे ललिते नमस्ते ॥१५
कामे शिवे मुख्यसमस्तनित्ये कांतासनान्ते कम लायताक्षि ।
कामप्रदे कामिनि कामशंभोः काम्ये
कलानामधिपे नमस्ते ॥१६
दिव्यौषवाद्ये नगरौघरूपे दिव्ये दिनाधीशसहस्रकांते ।
देदीप्यमाने दयया सनाये देवाधिदेवप्रमदे नमस्ते ॥१७
सदाणिमाद्यष्टकसेवनीये सदाशिवात्मोज्जवलमञ्चवासे ।

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४२५

भव्ये सदेकालयपादपूज्ये सावित्रि लोकस्य नमोनमस्ते ॥ १८ ब्राह्मीमुखैर्मातृगणैर्निषेव्ये ब्रह्मप्रिये ब्राह्मणबन्धभेत्रि । ब्रह्मामृतस्रोतसि राजहंसि ब्रह्मेश्वरि श्रीललिते नमस्ते ॥ १९ संक्षोभिणीमुख्यसमस्तमुद्रासंसेविते संसरणप्रहंत्रि । संसारलीलाकृतिसारसाक्षि सदा नमस्ते ललितेऽधिनाथे । नित्य कलाषोडशकेन नामाकर्षिण्यधीशि प्रमथेन सेव्ये ॥ २० नित्ये निरातंकदयाप्रपंचे नीलालकश्रेणि नमोनमस्ते । अनंगपुष्पादिभिरुन्नदाभिरनंगदेवीभिरजस्रसेव्ये । अभव्यहंत्र्यक्षरराशिरूपे हतारिवर्गे ललिते नमस्ते ॥ २१

हे ललिते ! आप षडंगदेवी परिवार कृप्ता है । हे षडंगयुक्त श्रुति वाक्यों के द्वारा आप षट्चक्र में विराजमाना हैं । हे षड्भियुक्ते ! आप षड्भाव रूपों वाली हैं । आपको हम सबका प्रणाम हैं ।१५। हे मुख्ये समस्त नित्ये ! हे कामे ! हे शिवे ! हे कान्तासनान्ते ! आपके नेत्र कमलों के समान हैं । आप कामनाओं के देने वाली हैं । हे कामिनि ! आप कामशम्भु की काम्य हैं । हे कलाओं की स्वामिनि ! आपको नमस्कार है ।१६। हे दिव्यौषधाद्ये ! आप नगरोध रूप वाली हैं । हे दिव्ये ! आप दिनाधीश सहस्रों के समान कान्ति वाली हैं । हे सनाये ! आप दया से देदीप्यमाना है । हे देवाधिदेव शम्भु की प्रमदे ! आपको हम सबका प्रणाम निवेदित है ।१७। हे सावित्री ! आप सर्वदा अणिमादिक आठों सिद्धियों के द्वारा सेवा करने के योग्य हैं आप सदा शिव के आत्मोज्ज्वल मञ्च पर निवास किया करती है । हे सदेकालय पादपूज्ये ! हे भव्ये ! आप लोक को रक्षिका है । आप लोक की रक्षिका हैं । आपको बारम्बार नमस्कार है ।१८। ब्राह्मी जिनमें प्रमुख हैं ऐसी मातृ गणों के द्वारा आप सेव्य हैं । आप ब्रह्म प्रिया हैं । हे ब्राह्मण बन्धभेत्रि ! आप तो ब्रह्मामृत की स्रोत हैं । हे राजहंसि ! आप ब्रह्मेश्वरी हैं । हे श्री ललिते ! आपको हमारा प्रणाम है ।१९। संक्षोभिणी जिनमें प्रधान है उन समस्त मुद्राओं के द्वारा संसेवित आप हैं और संसरण का प्रहनन करने वाली हैं । हे संसार लीला कृतिसार साक्षि ! हे संसार लीला कृतिसार साक्षि ! हे अधिनाथे ! ललिते ! आपको हमारा नमस्कार है । हे अधीशि ! आप नित्या हैं और षोडश कला से आकर्षण

४२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

करने वाली हैं तथा प्रमथ के द्वारा सेवन करने के योग्य हैं ।२०। हे नित्ये ! आपकी दया का प्रपञ्च निरांतक है। आपके नीले अलकों की श्रेणियाँ हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। अनंग पुष्पादि एवं उन्मदा अनंग देवियों के द्वारा आप निरन्तर सेवन के योग्य रहती हैं। हे अभव हन्त्रि ! हे अक्षर-राशि रूपे ! आपने समस्त शत्रुओं को निहत कर दिया है। हे ललिते ! आपको हमारा नमस्कार है ।२१।

संक्षोभिणीमुख्यचतुर्दशार्चिर्मालावृतोदारमहाप्रदीप्ते ।
आत्मनमाबिभ्रति विभ्रमाढ्ये शुभ्राश्रये
शुभ्रपदे नमस्ते ॥२२
सशर्वसिद्धादिकशक्तिवन्द्ये सर्वज्ञविज्ञातपदारविन्दे ।
सर्वाधिके सर्वगते समस्तसिद्धिप्रदे श्रीललिते नमस्ते ॥२३
सर्वज्ञजातप्रथमाभिरन्यदेवीभिरप्याश्रितचक्रभूमे ।
सर्वामराकांक्षितपूरयित्रि सर्वस्य लोकस्य सवित्रि पाहि ॥२४
वन्दे वशिन्यादिकवाग्विभूते वर्द्धिष्णुचक्रद्युतिवाहवाहे ।
बलाहकश्यामकचे वचोऽब्धे वरप्रदे सुन्दरि पाहि
विश्वम् ॥२५
बाणादिदिव्यायुधसार्वभौमे भंडासुरानीकवनांतदावे ।
अत्युग्रतेजोज्ज्वलितांबुराशे प्रसेव्यमाने परितो नमस्ते ॥२६
कामेशि वज्रेशि भगेश्य रूपे कन्ये कले कालविलोपदक्षे ।
कथाविशेषीकृतदैत्यसैन्ये कामेशजांते कमले नमस्ते ॥२७
बिन्दुस्थिते बिन्दुकलैक रूपे विद्यात्मिके बृंहितचित्प्रकाशे ।
बृहत्कुचांभोजविलोलहारे वृहत्प्रभावे ललिते नमस्ते ॥२८

आप संक्षोभिणी प्रभृति जिनमें मुख्य हैं ऐसी अर्चि मालाओं से समा-वृत उदार महान प्रदीप्त वाली हैं हे विभ्रमाढ्ये ! आप आत्मा को आवि-भरण करती हैं। आपका शुभ्र आश्रय है। हे शुभ्रपदे ! आपको नमस्कार है ।२२। शम्भु के सहित सिद्ध आदि शक्तियों से आप वन्द्यमान हैं। आपका चरण कमल सर्वज्ञ के द्वारा ही विज्ञात है। आप सबसे बड़ी हैं—आप सबमें विद्यमान हैं और आप सब सिद्धियों के प्रदान करने वाली हैं। हे श्री

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४२७

ललिते ! आपको प्रणाम है ।२३। आप सर्वत्र से समुत्पन्न प्रथम देवियों के द्वारा आश्रित चक्रभूमि वाली हैं। और सब देवों के मनोरथों को पूर्ण करने वाली हैं। आप सम्पूर्ण लोक की माता हैं। हमारी रक्षा कीजिए ।२४। हे वाशिनी आदि वाग्विभूते ! आप वर्धिष्णु चक्र की वाह वाह हैं। आपके केश वलाहक की द्युति वाले हैं। आप वचनों की सागर हैं। आप वरदान देने वाली हैं। हे सुन्दरि ! आप इस विश्व की रक्षा करें ।२५। बाण के आदि विशेष आयुधों की साम्राज्ञी हैं। आप भंडासुर की सेना के वन लिये दावाग्नि हैं। आप अतीव उग्र तेज से अम्बुराशि को भी ज्वलित करने वाली हैं। आप प्रसंयमाना हैं। आपकी सभी ओर से प्रणाम है ।२६। हे कामेशि ! वज्रेशि ! हे भगेशि ! आप रूप रहित हैं। हे कन्ये ! हे कले ! आप काल के विलोप करने में परम दक्ष हैं। आपने दैत्यों की सेनाओं को पूर्णतया समाप्त कर दिया है और अब उनकी केवल कथा ही शेष है। कामेशयान्ते ! हे कमले ! आपको नमस्कार है ।२७। आप बिन्दु में ही संस्थित हैं और आपका रूप बिन्दु कला ही एक है। आप बिन्दु के स्वरूप वाली हैं और आपने ज्ञान के बड़े प्रकाश को किया है। आपके बड़े कुचों पर हार विलुलित हो रहा है। आपका प्रभाव बृहत् है। हे ललिते ! आपको हम सबका नमस्कार है ।२८।

कामेश्वरोत्संगसदानिवासे कालात्मिके देवि कृतानुकम्पे । कल्पावसानोत्थितकालिरूपे कामप्रदे कल्पलते नमस्ते ॥२९॥

सवारुणे सांद्रसुधांशुशीते सारंगशावाक्षि सरोजवक्त्रे । सारस्य सारस्य सदैकभूमे समस्तविद्येश्वरि संनतिस्ते ॥३०॥

तव प्रभावेण चिदग्निजायां श्रीशम्भुनाथप्रकटीकृतायाः । भंडासुराद्याः समरे प्रचंडा हता जगत्कंटकतां प्रयाताः ॥३१॥

नव्यानि सर्वाणि वपूंषि कृत्वा हि सांद्रकारुण्यसुधाप्ल्यैर्नः। त्वया समस्तं भुवनं सहर्षं सुजीवितं सुन्दरि सभ्यलभ्ये ॥३२॥

श्रीशम्भुनाथस्य महाशयस्य द्वितीयतेजः प्रसरात्मके यः । स्थाण्वाश्रमे कॢप्ततया विरक्तः सतीवियोगेन । विरस्तभोगः ॥३३॥

४२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तेनाद्रिवंशे धृतमन्मलाभां कन्यामुमां योजयितुं प्रवृत्ताः । एवं स्मरं प्रेरितवंत एव तस्यांतिकं घोरतपः स्थितस्य ॥३४

तेनाथ वैराग्यतपोविघातक्रोधेन लालाटकृशानुदग्धः । भस्मावशेषो मदनस्ततोऽभूत्ततो हि भंडासुर एष जातः ॥३५

आप कामेश्वर की गोद में ही सदा निवास किया करती हैं और आपका काल ही स्वरूप है। हे देवि ! आपने बड़ी अनुकम्पा की है । आप कल्प के अन्त में उठी हुई काली के स्वरूप वाली हैं। आप कामनाओं के देने वाली हैं और आप साक्षात् कल्पलता हैं । आपको नमस्कार है । आप सवारुणा हैं और सान्द्रशीतांशु के समान शीतल हैं। आपके नेत्र हरिण के बच्चे के तुल्य हैं और आपका मुख कमल जैसा है। आप सार के भी सार की सदा एक भूमि है। आप समस्त विद्याओं की स्वामिनी हैं । आपको हमारा प्रणिपात है ।२६-३०। आपके प्रभाव से श्री शम्भुनाथ के द्वारा प्रकटित अग्निजा में चित् है। समर में महान् प्रचण्ड भंडासुर प्रभृति सब जो जगत के कंटक थे, मारे गये हैं।३१। सब शरीरों को नवीन करके हमको स्वस्थ बना दिया है और आपने सान्द्र करुणा की सुधा से ही कर दिया था । आपने समस्त भुवन को हर्ष के साथ जीवित कर दिया है। हे सभ्य-लक्ष्म्ये ! आप तो परम सुन्दरी है।३२। महान् आशय वाले श्री शम्भु के आप द्वितीय तेज के प्रसर के स्वरूप वालो हैं । जो स्थाणु के आश्रम से कॢप्तता से विरक्त सती के वियोग से विरस्त भोग वाला है। ३३। इससे आद्रि के वंश में जन्म का लाभ प्राप्त करने वाली कन्या उमा को योजित करने के लिए सब प्रवृत्त हुए थे । घोर तपस्या में वर्त्तमान उनके समीप में कामदेव को भेजने की प्रेरणा की थी ।३४। उन्होंने वैराग्य से किये जाने वाले तप के विघात से जो क्रोध हुआ था उससे वह कामदेव ललाट की अग्नि से दग्ध कर दिया था । फिर मदन भस्म मात्र रह गया था । वही मदन फिर भंडासुर होकर उत्पन्न हुआ था । ३५।

ततो वधस्तस्य दुराशयस्य कृतो भवत्या रणदुर्मदस्य । अथास्मदर्थे त्वतनुस्सजातस्त्वं कामसंजीवनमाशु कुर्याः ॥३६

इयं रतिर्भर्तृवियोगखिन्ना वैधव्यमत्यंतमभव्यमाप । पुनस्त्वदुत्पादितकामसंगाद्भविष्यति श्रीललिते सनाथा ॥३७

मदन पुनर्भंव वर्णन ] [ ४२६

तया तु दृष्टेन मनोभवेन संमोहितः पूर्ववदिन्दुमौलिः । चिरं कृतात्यंतमहासपर्यां तां पार्वतीं द्राक्परिणेष्यतीशः ॥३८ तयोश्च संगाद्भाविता कुमारः समस्तगीर्वाणचमूविनेता । तेनैव वीरेण रणे निरस्य स तारको नाम सुरारिराजः ॥३६ यो भंडदैत्यस्य दुराशयस्य मित्रं स लोकत्रयधूमकेतुः । श्रीकण्ठपुत्रेण रणे हतश्चेत्प्राणप्रतिष्ठैव तदा भवेन्नः ॥४० तस्मात्त्वमंब त्रिपुरे जनानां मानापहं मन्मथवीरवर्यम् । उत्पाद्य रत्या विधवात्वदुःखमपाकुरु व्याकुलकुन्तलायाः॥४१ एषा त्वनाथा भवतीं प्रपन्ना भर्तृप्रणाशेन कृशांगयष्टिः । नमस्करोति त्रिपुराभिधाने तदत्र कारुण्यकलां विधेहि ॥४२

इसके अनन्तर आपने दुराशय का जो रण में बहुत ही दुर्मद था वध किया था और हम लोगों के लिए वह बिना शरीर वाला हो गया है। उस कामदेव के संजीवन को आप शीघ्र ही कर दीजिए ।३६। यह रति बिचारी अपने स्वामी के वियोग से बहुत ही खिन्न है। उसको अत्यन्त बुरा वैधव्य प्राप्त हो गया है। हे श्रीललिते ! फिर आपके द्वारा उत्पन्न किये गये कामदेव के सङ्ग से वह सनाथा होगी ।३७। उसी भाँति उस दुष्ट कामदेव ने फिर इन्दुमौलि को पूर्व की ही भाँति संमोहित किया है वह ईश चिरकाल पर्यन्त अर्चा करने वाली उस पार्वती के साथ शीघ्र ही विवाह करेंगे ।३८। उन दोनों (पार्वती-शिव) के संयोग से कुमार उत्पन्न होगा जो समस्त देवगणों की सेना का सेनानी होगा। उस ही वीर के द्वारा रण में असुरों का राजा वह तारक पराजित किया गया ।३६। वह तीनों लोकों का धूमकेतु परम दुष्ट भंडासुर का मित्र था। वह रण में श्रीकण्ठ के पुत्र के द्वारा ही मारा गया था। उसी समय में हमारे प्राणों की प्रतिष्ठा हुई थी ।४०। इस कारण से हे अम्ब ! हे त्रिपुरे ! जनों के मान के अपहर्त्ता वीरवर कामदेव को उत्पन्न करके विचारी उस व्याकुल कुन्तला रति के विधवापने को आप दूर कर दीजिए ।४१। यह विचारी अनाथ है और अपने भर्त्ता के प्रणाश होने से अत्यन्त कृश अङ्गों वाली आपकी शरणागति में प्राप्त हुई है। हे त्रिपुराभिधाने ! यह आपको नमस्कार करती है। अतएव इस बिचारी पर आप करुणा करिए ।४२।

४३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

हयग्रीव उवाच- इति स्तुत्वा महेशानीं ब्रह्माद्या विबुधोत्तमाः । तां रतिं दर्शयामासुर्मलिनां शोककर्शिताम् ॥४३ सा पर्यश्रुमुखी कीर्णकुन्तला धूलिधूसरा । ननाम जगदम्बां वै वैधव्यत्यक्तभूषणा ॥४४ अथ तद्दर्शनोत्पन्नकारुण्या परमेश्वरी । ततः कटाक्षादुत्पन्नः स्मयमानमुखाम्बुजः ॥४५ पूर्वदेहाधिकरुचिर्मन्मथो मदमेदुरः । द्विभुजः सर्वभूषाढ्यः पुष्पेषुः पुष्पकार्मुकः ॥४६ आनन्दयन्कटाक्षेण पूर्वजन्मप्रियां रतिम् । अथ सापि रतिर्देवी महत्यानन्दसागरे । मज्जन्ती निजभर्त्तारमवलोक्य मुदं गता ॥४७ आनन्दितांतरात्मानौ भक्तिनिर्भरमानसौ । ज्ञात्वाथ तौ महाराज्ञी मन्दस्मितमुखाम्बुजा । व्रीडानतां रतिं वीक्ष्य श्यामलामिदमब्रवीत् ॥४८ श्यामले स्नपयित्वैनां वस्त्रकाञ्च्यादिभूषणैः । अलंकृत्य यथापूर्वं शीघ्रंमानीयतामिह ॥४६

हयग्रीवजी ने कहा—उत्तम देव ब्रह्मा आदि ने इस रीति से उस ईशानी की स्तुति की थी और उस रति को बहुत ही मलिन और शोक से कशित थी दिखा दिया था ।४३। वह मुख पर आँसू फैलाती हुई बिखरे हुए केशों वाली और धूलि से धूसर और विधवा होने के कारण भूषणों को त्याग देने वाली उस रति ने उस जगदम्बा की सेवा में प्रणाम किया था ।४४। इसके अनन्तर उस बिचारी वैधव्य को प्राप्त हुई रति की ओर देख-कर जगदम्बा के हृदय में करुणा उत्पन्न हो गयी थी और उस परमेश्वरी के कटाक्ष से मुस्कराते हुए मुख वाला कामदेव समुत्पन्न हो गया था ।४५। उसके देह की कान्ति पूर्व के देह से भी अधिक थी और वह मद से मेदुर हो गया था । उसको दो बाहू थीं—वह समस्त भूषणों से सम्पन्न था और पुष्पों के बाणों वाला तथा कुसुमों के धनुष वाला था ।४६। पूर्वजन्म की प्रिया

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३१

रति को कटाक्ष के द्वारा आनन्दित कर रहा था। वह रति भी महान् आनन्द के सागर में मग्न होकर अपने स्वामी को देखती हुई आनन्द को प्राप्त हुई थी ।४७। महाराज्ञी उन दोनों रति और कामदेव को भक्ति से निर्भर मानस वाले तथा परम प्रसन्न अन्तरात्मा वाले देखकर मन्दस्मित मुखकमल वाली हुई थी और लज्जा से नम्रमुखी उस रति को देखकर श्यामला से यह बोली थी ।४८। हे श्यामले ! इसको स्नान कराकर वस्त्रों और कांची आदि भूषणों से भूषित करके पूर्व की ही भाँति शीघ्र यहाँ लाओ ।४६।

तदाज्ञां शिरसा धृत्वा श्यामा सर्वं तथाकरोत् ।
ब्रह्मर्षिभिर्वसिष्ठाद्यै र्वैवाहिकविधानतः ॥५०
कारयामास दम्पत्योः पाणिग्रहणमंगलम् ।
अप्सरोभिश्च सर्वाभिनृत्यगीतादिसंयुतम् ॥५१
एतद्दृष्ट्वा महेन्द्राद्या ऋषयश्च तपोधनाः ।
साधुसाध्विति शंसंतस्तुष्टुवुर्ललितांबिकाम् ॥५२
पुष्पवृष्टिं विमुञ्चन्तः सर्वे सन्तुष्टमानसाः ।
बभूवुस्तौ महाभक्त्या प्रणम्य ललितेश्वरीम् ॥५३
तत्पार्श्वे तु समागत्य बद्धांजलिपुटौ स्थितौ ।
अथ कंदर्पवीरोऽपि नमस्कृत्य महेश्वरीम् ।
व्यज्ञापयदिदं वाक्यं भक्तिनिर्भरमानसः ॥५४
यदग्धमीशनेत्रेण वपुर्मे ललितांबिके ।
तत्त्वदीयकटाक्षस्य प्रसादात्पुनरागतम् ॥५५
तव पुत्रोऽस्मि दासोऽस्मि क्वापि कृत्ये नियुंक्ष्व माम् ।
इत्युक्ता परमेशानी तमाह मकरध्वजम् ॥५६

उस महाराज्ञी की आज्ञा को शिर पर धारण करके उस श्यामला ने सब कुछ वैसा ही कर दिया था। वसिष्ठ आदि ब्रह्मर्षियों के द्वारा वैवाहिक विधान किया गया था ।५०। उन दम्पतियों का पाणिग्रहण का मङ्गल किया गया जो सभी अप्सराओं के द्वारा नृत्य और गीत आदि से समन्वित था। ।५१। यह सब कुछ देखकर महेन्द्र आदि देवगण तथा तपोधन ऋषियों ने

४३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अच्छा हुआ-अच्छा हुआ -यह कहकर ललिताम्बा की स्तुति की थी ।५२। सबने परम सन्तुष्ट होते हुए नभो मंडल से पुष्पों की वर्षा थी । वे दोनों भी बहुत प्रसन्न हुए थे और उन्होंने महा भक्ति से ललितेश्वरी को प्रणाम किया था ।५३। वे दोनों ललितेश्वरी के समीप में समागत होकर दोनों हाथों को जोड़कर समीप में स्थित हो गये थे ? इसके अनन्तर कामदेव भी महेश्वरी को प्रणाम करके भक्ति भाव से परिपूर्ण मन वाला होकर इस वाक्य को बोला था ।५४। हे ललिताम्बिके ! शम्भु के नेत्र से जो मेरा शरीर दग्ध हो गया था वह आपके कृपा कटाक्ष से पुनः प्राप्त हो गया है ।५५। मैं आपका ही पुत्र हूँ । किसी भी सेवा में मुझे नियुक्त कीजिए । इस प्रकार से जब परमेशानी से कहा गया था तो उस देवी ने कामदेव से कहा था ।५६।

श्रीदेव्युवाच-

वत्सागच्छ मनोजन्मन्न भयं तव विद्यते ।
मत्प्रसादाज्जगत्सर्वं मोहयाव्याहताशुग ॥५७
तद्वाणपातनाज्जातधैर्यविप्लव ईश्वरः ।
पर्वतस्य सुतां गौरीं परिणेष्यति सत्वरम् ॥५८
सहस्रकोटयः कामा मत्प्रसादात्त्वदुद्भवाः ।
सर्वेषां देहमाविश्य दास्यंति रतिमुत्तमाम् ॥५९
मत्प्रसादेन वैराग्यात्संक्रुद्धोऽपि स ईश्वरः ।
देहदाहं विधातुं ते न समर्थो भविष्यति ॥६०
अदृश्यमूर्तिः सर्वेषां प्राणिनां भवमोहनः ।
स्वभार्याविरह शंकी देहस्यार्धं प्रदास्यति ।
प्रयातोऽसौ कातरात्मा त्वद्बाणाहतमानसः ॥६१
अद्य प्रभृति कन्दर्प मत्प्रसादान्महीयसः ।
त्वन्निंदां ये करिष्यन्ति त्वयि वा विमुखाशयाः ।
अवश्यं क्लीवतैव स्यात्तेषां जन्मनिजन्मनि ॥६२
ये पापिष्ठा दुरात्मानो मद्भक्तद्रोहिणश्च हि ।
तानगम्यासु नारीषु पाययित्वा विनाशय ॥६३

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३३

श्री देवी ने कहा-हे वत्स ! आओ, हे मनोजन्मन् आपको अब कुछ भी कहीं पर भय नहीं है। हे अव्याहत बाणों वाले ! मेरे प्रसाद से आप सम्पूर्ण जगत को मोहित करो ।५७। तुम्हारे बाणों के पातन से धैर्य के विप्लव होने से शम्भु पर्वत हितवान् की सुता पार्वती को शीघ्र ही व्याह लेंगे ।५८। मेरे प्रसाद से तुमसे समुत्पन्न सहस्रों करोड़ कामदेव सबके देहों में प्रवेश करके उत्तम रति को देंगे ।५६। मेरे प्रसाद से क्रुद्ध भी भगवान शम्भु जिनको कि वैराग्य हो गया है, तुम्हारे देह को दग्ध करने में समर्थ नहीं होंगे ।६०। भव को मोहित करने वाला कामदेव सब प्राणियों में अदृश्य मूर्ति वाला होकर रहेगा । अपनी भार्या के विरह की आशंका वाला देह के आधे भाग को दे देता । तुम्हारे बाण से आहत मानस वाले यह कातरात्मा होकर प्रयाण कर गये हैं ।६१। आज से लेकर हे कन्दर्प ! महान् मेरे प्रसाद से जो तेरी निन्दा करेंगे अथवा तुझसे विमुख विचार वाले होंगे उनको अवश्य ही नपुंसकता जन्म-जन्मों में हो जायगी ।६२। जो पापिष्ठ हैं और मेरे भक्तों के द्रोही हैं उनको अगम्या अर्थात् न गमन करने के योग्य नारियों में गिराकर विनाश करदो ।६३।

येषां मदीय पूजासु मद्भक्तेष्वादृतं मनः ।
तेषां कामसुखं सर्वं संपादय समीप्सितम् ॥६४

इति श्रीललितादेव्या कृताज्ञावचनं स्मरः ।
तथेति शिरसा बिभ्रत्सांजलिनिर्ययौ ततः ॥६५

तस्यानंगस्य सर्वेभ्यो रोमकूपेभ्य उत्थिताः ।
बहवः शोभनाकारा मदना विश्वमोहनाः ॥६६

तैर्विमोह्य समस्तं च जगच्चक्रं मनोभवः ।
पुनः स्थाण्वाश्रमं प्राप चन्द्रमौलेर्जिगीषया ॥६७

वसंतेन च मित्रेण सेनान्या शीतरोचिषा ।
रागेण पीठमर्देन मन्दानिलरयेण च ॥६८

पुंस्कोकिलगलत्स्वानकाकलीभिश्च संयुतः ।
शृङ्गारवीरसंपन्नो रत्यालिंगितविग्रहः ॥६६

जैत्रं शरासनं धुन्वन्प्रवीराणां पुरोगमः ।
मदनारेरभिमुखं प्राप्य निर्भय आस्थितः ॥७०

४३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जिनके हृदय मेरी पूजा में और मेरे भक्तों में आदर करने वाले हैं उनको समस्त कार्य का सुख दो और उनका अभीष्ट पूर्ण कर दो ।६४। कामदेव ने इस श्री ललितादेवी के आज्ञा वचन को शिर से ग्रहण करके फिर हाथों को जोड़े हुए वह कामदेव वहाँ से निकल कर चला गया था ।६५। उस कामदेव के समस्त रोमों के छिद्रों से उठे हुए बहुत से परम शोभन आकार वाले कामदेव सम्पूर्ण विश्व को मोहन करने वाले थे ।६६। कामदेव ने उन बहुत से अनङ्गों के द्वारा इस सम्पूर्ण जगत के मंडल को मोहित कर दिया था ओर फिर भगवान् शम्भु पर विजय पाने की इच्छा से स्थाणु के आश्रय में प्राप्त हो गया था ।६७। अपने मित्र वसन्त के साथ तथा सेनानी शीतांशु के सहित पीठमर्द राग से संयुत एवं मन्द वायु के सहित और पुंस्कोकिल के निकले हुए शब्द की काकलियों से समंवित-शृङ्गार वीर सम्पन्न रति से आलिङ्गित वपु वाला कामदेव जयशील धनुष को हिलाता हुआ प्रवीरों का अग्रगामी होकर मदन के अरि शिव के समक्ष में पहुँचकर निडर होकर समास्थित हो गया था ।६८-७०।

तपोनिष्ठं चन्द्रचूडं ताडयामास सायकैः ।
अथ कन्दर्पबाणौघैस्ताडितश्चन्द्रशेखरः ।
दूरीचकार वैराग्यं तपस्तत्याज दुष्करम् ॥७१
नियमानखिलांस्त्यक्त्वा त्यक्तधैर्यः शिवः कृतः ।
तामेव पार्वतीं ध्यात्वा भूयोभूयः स्मरातुरः ॥७२
निशश्वास बहून्शर्वः पांडुरं गण्डमंडलम् ।
बाष्पायमाणो विरही संतप्तो धैर्यविप्लवात् ।
भूयोभूयो गिरिसुतां पूर्वदृष्टामनुस्मरन् ॥७३
अनंगबाणदहनैस्तप्यमानस्य शूलिनः ।
न चन्द्ररेखा नो गङ्गा देहतापच्छिदेऽभवत् ॥७४
नन्दिभृङ्गिमहाकालप्रमुखैर्गणमंडलैः ।
आहृते पुष्पशयने विलुलोठ मुहुर्मुहुः ॥७५
नन्दिनो हस्तमालंब्य पुष्पत्तल्पान्तरात्पुनः ।
पुष्पतल्पान्तरं गत्वा व्यचेष्टत मुहुर्मुहुः ॥७६

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३५

न पुष्पशयनेनेन्दुखण्डनिर्गलितामृते । न हिमानोपयसि वा निवृत्तस्तद्वपुर्ज्वरः ॥७७॥

तपश्चर्या में स्थित भगवान् चन्द्रचूड़ को सायकों से तड़ित करने लगा था। इसके पश्चात् काम के बाणों से शम्भु ताड़ित हुए थे और उन्होंने वैराग्य को दूर कर दिया था तथा दुष्कर तप को त्याग दिया था ॥७१॥ समस्त नियमों को छोड़कर शम्भु धैर्य त्याग देने वाले कर दिये गये थे। अब तो उसी पार्वती का ध्यान करके बारम्बार काम से आतुर हो गये थे। ।७२। शिव निःश्वास ले रहे थे और उनका गंड मंडल पाण्डुर हो गया था। अश्रु निकल रहे थे तथा धैर्य के विप्लव होने से विरही बहुत ही संताप युक्त हो गये थे। बारम्बार पूर्व में देखी हुई गिरि की सुता का अनुस्मरण करने लगे थे ।७३। कामदेव के बाणों की अग्नि से संतप्त होते हुए शिव के दाह को दूर करने में न तो चन्द्ररेखा और न गंगा समर्थ हुए थे ।७४। नन्दी-भृङ्गी—और महाकाल आदि प्रमुखों के द्वारा लाई हुई पुष्पों की शय्या में शिव बार-बार लोट लगा रहे थे ।७५। नन्दी के हाथ का सहारा ग्रहण करके फिर दूसरी पुष्पों की शय्या पर भी पहुँचे थे। दूसरी पुष्पों की शय्या पर पहुँचकर भी बार-बार विशेष चेष्टा शान्ति पाने के लिए की थी ।७६। किन्तु उनके देह का काम ज्वरोत्पन्न सन्ताप पुष्पों की शय्या से—चन्द्रकला से निर्गत अमृत से और हिमानी के जल से भी शान्त नहीं हुआ था ।७७।

स तनोरतनुज्वालां शमयिष्यन्मुहुर्मुहुः । शिलीभूतान्हिमपयः पट्टानध्यवसच्छिवः । भूयः शैलसुतारूपं चित्रपट्टे नखैर्लिखत् ॥७८॥

तदालोकनतोऽदूरमनंगातिमवर्धयत् । तामालिख्य ह्रिया नम्रां वीक्षमाणां कटाक्षतः ॥७९॥

तच्चित्रपट्टमंगेषु रोमहर्षेषु चाक्षिपत् । चिन्तासंगेन महता महत्या रतिसंपदा । भूयसा स्मरतापेन विव्यथे विषमेक्षणः ॥८०॥

तामेव सर्वतः पश्यंस्तस्यामेव मनो दिशन् । तयैव संल्लपन्सार्धमुन्मादेनोपपन्नया ॥८१॥

४३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तन्मात्रभूतहृदयस्तच्चित्तस्तत्परायणः ।
तत्कथासुधया नीतसमस्तरजनीदिनः ॥८२
तच्छीलवर्णनरतस्तद्रूपालोकनोत्सुकः ।
तच्चारुभोगसंकल्पमालाकरसुमालिकः ।
तन्मयत्वमनुप्राप्तस्ततापातितरां शिवः ॥८३
इमां मनोभवरुजमचिकित्स्यां स धूर्जटिः ।
अवलोक्य विवाहाय भृशमुद्यमवानभूत् ॥८४

वे अपने शरीर की बढ़ी हुई ज्वाला को बार-बार शम भी कर रहे थे और शिला के रूप में जो हिम का जल के पट्ट थे उन पर भी शिव जाकर बैठे थे । वहाँ पर फिर वे शैल सुता के चित्र को नखों से लिखने लग गये थे ।७८। उस चित्र के आलोकन से बहुत ही कामार्ति बढ़ गयी थी । उसका आलेखन ऐसा किया था जो लज्जा से नीचे की ओर मुख वाली थी और कटाक्ष से देख रही थी ।७९। उस चित्र के पट्ट को शिव ने रोमाञ्चित अङ्गों पर प्रक्षिप्त कर लिया था । उस समय बड़ा भारी चिन्ता का सङ्ग था और बहुत ही अधिक रति करने की सम्पत्ति थी । विषमेक्षण बहुत अधिक मदन के ताप से व्यथित हो गये थे ।८०। शिव पार्वती ही को सब ओर देख रहे थे और उसी में अपना मन लगा लिया था । उन्माद से उपपन्न उसी के साथ संलाप करते थे ।८१। उनके हृदय में केवल पार्वती ही थी और वे तच्चित्त और उसी में परायण हो गये थे । उस पार्वती की कथा रूपिणी सुधा से सब दिन और पूरी रात व्यतीत की थी ।८२। उसके ही शील स्वभाव के वर्णन में वे निरत थे और उसके ही रूप के अवलोकन में उत्सुक हो गये थे । उसके साथ भोग के संकल्पों की माला कर में लेकर सुमालिक हो गये थे । शिव तन्मयता को प्राप्त होकर बहुत ही अधिक संतप्त हुए थे ।८३। वह धूर्जटि इस कामदेव की बीमारी को जिसकी कोई भी चिकित्सा नहीं थी जब शिव ने देखा था तो फिर वे विवाह करने के लिए बहुत ही अधिक उद्यमवान हुए थे ।८४।

इत्थं विमोह्य तं देवं कन्दर्पो ललिताज्ञया ।
अथ तां पर्वतसुतामाशुगैरभ्यतापयत् ॥८५
प्रभूतविरहज्वालामलिनैः श्वसितानलैः ।
शुष्यमाणाधरदलो भृशं पांडुकपोलभूः ॥८६

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३७

नाहारे वा न शयने न स्वापे धृतिमिच्छति ।
सखीसहस्रैः सिषिचे नित्यं शीतोपचारकैः ॥८७
पुनः पुनस्तप्यमाना पुनरेव च विह्वला।
न जगाम रुजा शांतिं मन्मथाग्नेर्महीयसः ॥८८
न निद्रां पार्वती भेजे विरहेणोपतापिता ।
स्वतनोस्तापनेनासौ पितुः खेदमवर्धयत् ॥८९
अप्रतीकारपुरुषं विरहं दुहितुः शिवे ।
अवलोक्य स शैलेन्द्रो महादुःखमवाप्तवान् ॥६०
भद्रे त्वं तपसा देवं तोषयित्वा महेश्वरम् ।
भर्तारं तं समृच्छेति पित्रा सम्प्रेरिताथ सा ॥६१
हिमवच्छैलशिखरे गौरीशिखरनामनि ।
चकार पतिलाभाय पार्वती दुष्करं तपः ॥६२
शिशिरेषु जलावासा ग्रीष्मे दहनमध्यगा ।
अर्के निविष्टदृष्टिश्च सुघोरं तप आस्थिता ॥६३

ललिता देवी की आज्ञा से उस कन्दर्प ने इस तरह से शिव को विमोहित करके फिर उसने पार्वती को अपने बाणों से अभितप्त कर दिया था ।८५। बढ़े हुए विरह की ज्वाला से मलिन श्वासों की वायुओं से उसके अधर दल सूख गये थे और उसके कपोल पाण्डु वर्ण के हो गये थे ।८६। पार्वती को आहार में—शयन में—स्नान में कही भी धैर्य नहीं होता था। सहस्रों सखियां नित्य ही शीतल उपचारों से उसका सेचन किया करती थीं ।८७। बार-बार तापमान होती हुई वह फिर-फिर कर बेचैन हो जाती थी। कामाग्नि से जो अधिक थी वह उस रोग की शान्ति नहीं प्राप्त कर सकी थी ।८८। विरह से उप तापित होकर पार्वती को निद्रा भी नहीं आती थी। अपने शरीर के सन्तापन से उसने पिता के भी खेद को बढ़ा दिया था ।८९। जिसका कुछ भी प्रतिकार नहीं था ऐसा शिव के विषय में दुहिता के विरह को देखकर शैलराज को महान् दुःख प्राप्त हो गया था ।६०। पिता ने उसको प्रेरणा दी थी कि हे भद्रे ! तुम तप के द्वारा महेश्वर को प्रसन्न करो और उनको अपना भर्त्ता प्राप्त करो ।६१। हिमवान् पर्वत के शिखर पर एक गौरी

४३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शिखर नाम वाली चोटी है। उस पर पार्वती ने पति के लाभ प्राप्त करने के लिये बड़ा ही महान दुष्कर तप किया था। शीत में जल में निवास करती थी और ग्रीष्म में अग्नि के मध्य में रही थी। सूर्य में दृष्टि लगाकर उसने घोर तप किया।६२-६३।

तेनैव तपसा तुष्टः सान्निध्यं दत्तवाञ्छिवः ।
अङ्गीचकार तां भार्या वैवाहिकविधानतः ॥६४॥
अथाद्रिपतिना दत्तां तनयां नलिनेक्षणाम् ।
सप्तर्षिद्वारतः पूर्वं प्रार्थितामुदवोढ सः ॥६५॥
तया च रममाणोऽसौ बहुकालं महेश्वरः ।
ओषधीप्रस्थनगरे श्वशुरस्य गृहेऽवसत ॥६६॥
पुनः कैलासमागत्य समस्तैः प्रमथैः सह ।
पार्वतीमानिनायाद्रिनाथस्य प्रीतिमावहत् ॥६७॥
रममाणस्तया सार्धं कैलासे मन्दरे तथा ।
विन्ध्याद्रौ हेमशैले च मलये पारियात्रके ॥६८॥
नानाविधेषु स्थानेषु रतिं प्राप महेश्वरः ।
अथ तस्यां ससर्जाग्र्यं वीर्यं सा सोढुमक्षमा ॥६९॥
भुव्यत्यजत्सापि वह्नौ कृत्तिकासु स चाक्षिपत् ।
ताश्च गङ्गाजलेऽमुञ्चन्सा चैव शरकानने ॥१००॥

उसी तप से तुष्ट होकर शिव ने उसका सान्निध्य किया था। उस पार्वती को शिव ने वैवाहिक विधि से अपनी भार्या बनाना स्वीकार कर लिया था ।६४। इसके पश्चात् शिव ने सप्तर्षियों के द्वारा प्रार्थिता उस अद्रिपति के द्वारा प्रदान की हुई नलिनेक्षण पुत्री का उद्वाह कर लिया था ।६५। वह महेश्वर उसके साथ रमण बहुत समय पर्यन्त करते रहे थे और अपने श्वशुर के ही घर में औषधिप्रस्थ नगर में उन्होंने निवास किया था ।६६। फिर कैलास पर आ गये थे और प्रमथों के साथ पार्वती को वहाँ ले आये थे तथा शैलराज की प्रीति भी प्राप्त कर ली थी ।६७। कैलास में तथा मन्दर में उस पार्वती के साथ रमण करते रहे थे। तथा विन्ध्य में—हेमशैल में—मलयाचल में और पारियात्रिक में रमण किया था ।६८। अनेक स्थानों

मदन पुनर्मंन वर्णन ] [ ४३६

में महेश्वर ने रति प्राप्त की थी। इसके बाद उसमें अपना उग्रवीर्य छोड़ा था जिसके सहन करने में वह असमर्थ हो गयी थी ॥६६॥ इसने भी उस वीर्य को भूमि में—वह्नि में—कृतिकाओं में—क्षिप्त कर दिया था। उन्होंने गङ्गाजल में छोड़ दिया था और उसने शर कानन में छोड़ा था ॥१००॥

तत्रोद्भूतो महावीरो महासेनः षडाननः । गङ्गायाश्चांतिकं नीतो धूर्जटिवृद्धिमागमत् ॥१०१ स वर्धमानो दिवसे दिवसे तीव्रविक्रमः । शिक्षितो निजतातेन सर्वा विद्या अवाप्तवान् ॥१०२ अथ तातकृतानुज्ञः सुरसैन्यपतिर्भवन् । तारकं मारयामास समस्तैः सह दानवैः ॥१०३ ततस्तारकदैत्येन्द्रवधसन्तोषशालिना । शक्रेण दत्तां स गुहो देवसेनामुपानयत् ॥१०४ सा शक्रतनया देवसेना नाम यशस्विनी । आसाद्य रमणं स्कन्दमानन्दं भृशमादधौ ॥१०५ इत्थं संमोहिताशेषविश्वचक्रो मनोभवः । देवकार्यं सुसम्पाद्य जगाम श्रीपुरं पुनः ॥१०६ यत्र श्रीनगरे पुण्ये ललिता परमेश्वरी । वर्तते जगतामृद्ध्यै तत्र तां सेवितुं ययो ॥१०७

वहाँ पर महान् सेनानी महावीर षडानन समुत्पन्न हुए थे गङ्गा के समीप में पहुँचाया गया था और धूर्जटि वृद्धि को प्राप्त हुए थे ॥१०१॥ वह प्रतिदिन बढ़ने लगे थे और परम तीव्र विक्रम वाले हुए थे। अपने ही पिता के द्वारा उसको शिक्षा दी गयी थी और उसने समस्त विद्याएँ प्राप्त कर ली थीं ॥१०२॥ इसके पश्चात् पिता की आज्ञा प्राप्त करके देवों के सेनापति का पद ग्रहण कर लिया था। फिर उसने समस्त दानवों के साथ तारक को मार डाला था ॥१०३॥ फिर तारक दैत्य के वध से सन्तोष शाली इन्द्र ने देवों की सेना दी थी और गुह देव सेना को प्राप्त हो गये थे। फिर शुक्र की पुत्री देवसेना नाम वाली यशस्विनी ने स्कन्द को अपना स्वामी प्राप्त करने पर अधिक आनन्द प्राप्त किया था ॥१०४-१०५॥ इस रीति से कामदेव ने