संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४२३
अगस्त्यजी ने कहा—हे महान् प्राज्ञ ! हे अश्वानन ! आपने यह उत्तम आख्यान सुन लिया है। आपने जो ललिता देवी के विक्रम को विशेषता से युक्त वर्णन किया है। १। हे हयानन ! देवी के अनघ चरितों से मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ और मैंने मन्त्रिणी और दंडिनी की भी बड़ी भारी शक्ति का श्रवण किया है। २। उस युद्ध के अनन्तर उस अम्बिका ने क्या किया था। हे हयानन ! चौथे दिन की शर्वरी में विभात में क्या किया गया था। ३। हयग्रीव जी ने कहा—हे प्राज्ञ कुम्भज ! आप अब वही सुनिए जो भंडासुर के मरने पर जगदम्बा ने किया था। ४। शक्तियों की सम्पूर्ण सेना को जो दैत्यों के आयुधों से अर्दित हो गयी थी अपने अमृत से प्लुत लोचनों के द्वारा पुनः आह्लादित किया था। ५। परमेशानी ललिता देवी के कटाक्षों की अमृत धारा से शक्तियों ने युद्ध की श्रान्ति का त्याग कर दिया था और वे प्रसन्न मानस वाली हो गयी थीं। ६। इस अवसर में देवगण भंडासुर के मर्दन से प्रसन्न हुए थे। वे सभी जिनमें ब्रह्मा-विष्णु अगुआ थे उस देवी की सेवा करने के लिए समागत हो गये थे। ७।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च शक्राद्यास्त्रिदशास्तथा ।
आदित्य वसवो रुद्रा मरुतः साध्यदेवताः ॥८
सिद्धाः किंपुरुषा यक्षा निर्ऋत्याद्या निशाचराः ।
प्रह्लादाद्या महादैत्याः सर्वेऽप्यंडनिवासिनः ॥९
आगत्य तुष्टुवुः प्रीत्या सिंहासनमहेश्वरीम् ॥१०
ब्रह्माद्या ऊचुः—
नमोनमस्ते जगदेकनाथे नमोनमः श्रीत्रिपुराभिधाने ।
नमोनमो भंडमहासुरघ्ने नमोऽस्तु कामेश्वरि वामकेशि ॥११
चिंतामणौ चिंतितदानदक्षेऽचिन्त्ये चिराकारतरंगमाले ।
चित्राम्बरे चित्रजगत्प्रसूते चित्राख्यनित्ये सुखदे नमस्ते ॥१२
मोक्षप्रदे मुग्धशशांकचूड़े मुग्धस्मिते मोहनभेददक्षे ।
मुद्रेश्वरीचर्चितराजतन्त्रे मुद्राप्रिये देवि नमोनमस्ते ॥१३