भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 833

४२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

क्रूरांतकध्वंसिनि कोमलांगे कोपेषु कालीं तनुमादधाने ।
क्रोडानने पालितसैन्यचक्रे क्रोडीकृताशेषभये नमस्ते ॥१४

ब्रह्मा—विष्णु—रुद्र—शक्रादि सब देवगण—आदित्य—वसुगण—मरुद्गण—साध्य देवता—सिद्ध—किम्पुरुष—यक्ष—निर्ऋति आदि निशाचर—प्रह्लाद आदि महादैत्य—सभी अंड में निवास करने वाले वहाँ आकर उपस्थित हुए थे और उन्होंने प्रसन्नता से सिंहासनैश्वरी की स्तुति की थी ।८-१०। ब्रह्मादिक ने कहा—हे इस जगत की एक मात्र स्वामिनि ! आपको बारम्बार नमस्कार है । हे श्री त्रिपुराभिधाने ! आपको नमस्कार अनेक बार है । हे महान भंडासुर के हनन करने वाली ! हे कामेश्वरि ! हे वामकेशि ! आपकी सेवा में अनेकशः प्रणाम समर्पित हैं ।११। हे चिराकार तरङ्गमाले ! आप तो अचिन्तनीय हैं—आप चिन्तामणि के ही समान हैं तथा जो भी प्राणियों का चिन्तित होता है उसके प्रदान करने में दक्ष हैं । हे चित्राम्बदे ! हे चित्र जगत् प्रसूते ! हे चित्राख्य नित्ये ! आप सुखों के देने वाली है । आपको बारम्बार नमस्कार है ।१२। आप मोक्ष देने वाली हैं—मुग्धशशाङ्क चूडे ! आपका स्मित मोहन करने वाला है और आप मोहन करने वाला है और आप मोहन करने में परम दक्ष हैं। हे मुद्रेश्वरी निखिल राजतन्त्रे ! आप मुद्राप्रिया हैं । हे देवि ! आपको अनेक बार प्रणाम हैं ।१३। हे कोमलाङ्गे ! आप तो क्रूर अन्तक के ध्वंस करने वाली हैं। आप कोप के अवसरों पर काली का विग्रह धारण कर लेती हैं । आप कोप के अवसरों पर कालो का पालन किया है । हे क्रोड़ी-कृताशेष भये । आपको मेरा नमस्कार है ।१४।

षडंगदेवीपरिवारकृष्णे षडंगयुक्तश्रुतिवावयसृग्ये ।
षट्चक्रसंस्थे च षडूर्मियुक्ते षड्भावरूपे ललिते नमस्ते ॥१५
कामे शिवे मुख्यसमस्तनित्ये कांतासनान्ते कम लायताक्षि ।
कामप्रदे कामिनि कामशंभोः काम्ये
कलानामधिपे नमस्ते ॥१६
दिव्यौषवाद्ये नगरौघरूपे दिव्ये दिनाधीशसहस्रकांते ।
देदीप्यमाने दयया सनाये देवाधिदेवप्रमदे नमस्ते ॥१७
सदाणिमाद्यष्टकसेवनीये सदाशिवात्मोज्जवलमञ्चवासे ।

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