संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 834, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंमदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४२५
भव्ये सदेकालयपादपूज्ये सावित्रि लोकस्य नमोनमस्ते ॥ १८ ब्राह्मीमुखैर्मातृगणैर्निषेव्ये ब्रह्मप्रिये ब्राह्मणबन्धभेत्रि । ब्रह्मामृतस्रोतसि राजहंसि ब्रह्मेश्वरि श्रीललिते नमस्ते ॥ १९ संक्षोभिणीमुख्यसमस्तमुद्रासंसेविते संसरणप्रहंत्रि । संसारलीलाकृतिसारसाक्षि सदा नमस्ते ललितेऽधिनाथे । नित्य कलाषोडशकेन नामाकर्षिण्यधीशि प्रमथेन सेव्ये ॥ २० नित्ये निरातंकदयाप्रपंचे नीलालकश्रेणि नमोनमस्ते । अनंगपुष्पादिभिरुन्नदाभिरनंगदेवीभिरजस्रसेव्ये । अभव्यहंत्र्यक्षरराशिरूपे हतारिवर्गे ललिते नमस्ते ॥ २१
हे ललिते ! आप षडंगदेवी परिवार कृप्ता है । हे षडंगयुक्त श्रुति वाक्यों के द्वारा आप षट्चक्र में विराजमाना हैं । हे षड्भियुक्ते ! आप षड्भाव रूपों वाली हैं । आपको हम सबका प्रणाम हैं ।१५। हे मुख्ये समस्त नित्ये ! हे कामे ! हे शिवे ! हे कान्तासनान्ते ! आपके नेत्र कमलों के समान हैं । आप कामनाओं के देने वाली हैं । हे कामिनि ! आप कामशम्भु की काम्य हैं । हे कलाओं की स्वामिनि ! आपको नमस्कार है ।१६। हे दिव्यौषधाद्ये ! आप नगरोध रूप वाली हैं । हे दिव्ये ! आप दिनाधीश सहस्रों के समान कान्ति वाली हैं । हे सनाये ! आप दया से देदीप्यमाना है । हे देवाधिदेव शम्भु की प्रमदे ! आपको हम सबका प्रणाम निवेदित है ।१७। हे सावित्री ! आप सर्वदा अणिमादिक आठों सिद्धियों के द्वारा सेवा करने के योग्य हैं आप सदा शिव के आत्मोज्ज्वल मञ्च पर निवास किया करती है । हे सदेकालय पादपूज्ये ! हे भव्ये ! आप लोक को रक्षिका है । आप लोक की रक्षिका हैं । आपको बारम्बार नमस्कार है ।१८। ब्राह्मी जिनमें प्रमुख हैं ऐसी मातृ गणों के द्वारा आप सेव्य हैं । आप ब्रह्म प्रिया हैं । हे ब्राह्मण बन्धभेत्रि ! आप तो ब्रह्मामृत की स्रोत हैं । हे राजहंसि ! आप ब्रह्मेश्वरी हैं । हे श्री ललिते ! आपको हमारा प्रणाम है ।१९। संक्षोभिणी जिनमें प्रधान है उन समस्त मुद्राओं के द्वारा संसेवित आप हैं और संसरण का प्रहनन करने वाली हैं । हे संसार लीला कृतिसार साक्षि ! हे संसार लीला कृतिसार साक्षि ! हे अधिनाथे ! ललिते ! आपको हमारा नमस्कार है । हे अधीशि ! आप नित्या हैं और षोडश कला से आकर्षण