भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मदन पुनर्मंन वर्णन ] [ ४३६

में महेश्वर ने रति प्राप्त की थी। इसके बाद उसमें अपना उग्रवीर्य छोड़ा था जिसके सहन करने में वह असमर्थ हो गयी थी ॥६६॥ इसने भी उस वीर्य को भूमि में—वह्नि में—कृतिकाओं में—क्षिप्त कर दिया था। उन्होंने गङ्गाजल में छोड़ दिया था और उसने शर कानन में छोड़ा था ॥१००॥

तत्रोद्भूतो महावीरो महासेनः षडाननः । गङ्गायाश्चांतिकं नीतो धूर्जटिवृद्धिमागमत् ॥१०१ स वर्धमानो दिवसे दिवसे तीव्रविक्रमः । शिक्षितो निजतातेन सर्वा विद्या अवाप्तवान् ॥१०२ अथ तातकृतानुज्ञः सुरसैन्यपतिर्भवन् । तारकं मारयामास समस्तैः सह दानवैः ॥१०३ ततस्तारकदैत्येन्द्रवधसन्तोषशालिना । शक्रेण दत्तां स गुहो देवसेनामुपानयत् ॥१०४ सा शक्रतनया देवसेना नाम यशस्विनी । आसाद्य रमणं स्कन्दमानन्दं भृशमादधौ ॥१०५ इत्थं संमोहिताशेषविश्वचक्रो मनोभवः । देवकार्यं सुसम्पाद्य जगाम श्रीपुरं पुनः ॥१०६ यत्र श्रीनगरे पुण्ये ललिता परमेश्वरी । वर्तते जगतामृद्ध्यै तत्र तां सेवितुं ययो ॥१०७

वहाँ पर महान् सेनानी महावीर षडानन समुत्पन्न हुए थे गङ्गा के समीप में पहुँचाया गया था और धूर्जटि वृद्धि को प्राप्त हुए थे ॥१०१॥ वह प्रतिदिन बढ़ने लगे थे और परम तीव्र विक्रम वाले हुए थे। अपने ही पिता के द्वारा उसको शिक्षा दी गयी थी और उसने समस्त विद्याएँ प्राप्त कर ली थीं ॥१०२॥ इसके पश्चात् पिता की आज्ञा प्राप्त करके देवों के सेनापति का पद ग्रहण कर लिया था। फिर उसने समस्त दानवों के साथ तारक को मार डाला था ॥१०३॥ फिर तारक दैत्य के वध से सन्तोष शाली इन्द्र ने देवों की सेना दी थी और गुह देव सेना को प्राप्त हो गये थे। फिर शुक्र की पुत्री देवसेना नाम वाली यशस्विनी ने स्कन्द को अपना स्वामी प्राप्त करने पर अधिक आनन्द प्राप्त किया था ॥१०४-१०५॥ इस रीति से कामदेव ने