भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शिखर नाम वाली चोटी है। उस पर पार्वती ने पति के लाभ प्राप्त करने के लिये बड़ा ही महान दुष्कर तप किया था। शीत में जल में निवास करती थी और ग्रीष्म में अग्नि के मध्य में रही थी। सूर्य में दृष्टि लगाकर उसने घोर तप किया।६२-६३।

तेनैव तपसा तुष्टः सान्निध्यं दत्तवाञ्छिवः ।
अङ्गीचकार तां भार्या वैवाहिकविधानतः ॥६४॥
अथाद्रिपतिना दत्तां तनयां नलिनेक्षणाम् ।
सप्तर्षिद्वारतः पूर्वं प्रार्थितामुदवोढ सः ॥६५॥
तया च रममाणोऽसौ बहुकालं महेश्वरः ।
ओषधीप्रस्थनगरे श्वशुरस्य गृहेऽवसत ॥६६॥
पुनः कैलासमागत्य समस्तैः प्रमथैः सह ।
पार्वतीमानिनायाद्रिनाथस्य प्रीतिमावहत् ॥६७॥
रममाणस्तया सार्धं कैलासे मन्दरे तथा ।
विन्ध्याद्रौ हेमशैले च मलये पारियात्रके ॥६८॥
नानाविधेषु स्थानेषु रतिं प्राप महेश्वरः ।
अथ तस्यां ससर्जाग्र्यं वीर्यं सा सोढुमक्षमा ॥६९॥
भुव्यत्यजत्सापि वह्नौ कृत्तिकासु स चाक्षिपत् ।
ताश्च गङ्गाजलेऽमुञ्चन्सा चैव शरकानने ॥१००॥

उसी तप से तुष्ट होकर शिव ने उसका सान्निध्य किया था। उस पार्वती को शिव ने वैवाहिक विधि से अपनी भार्या बनाना स्वीकार कर लिया था ।६४। इसके पश्चात् शिव ने सप्तर्षियों के द्वारा प्रार्थिता उस अद्रिपति के द्वारा प्रदान की हुई नलिनेक्षण पुत्री का उद्वाह कर लिया था ।६५। वह महेश्वर उसके साथ रमण बहुत समय पर्यन्त करते रहे थे और अपने श्वशुर के ही घर में औषधिप्रस्थ नगर में उन्होंने निवास किया था ।६६। फिर कैलास पर आ गये थे और प्रमथों के साथ पार्वती को वहाँ ले आये थे तथा शैलराज की प्रीति भी प्राप्त कर ली थी ।६७। कैलास में तथा मन्दर में उस पार्वती के साथ रमण करते रहे थे। तथा विन्ध्य में—हेमशैल में—मलयाचल में और पारियात्रिक में रमण किया था ।६८। अनेक स्थानों

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