भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३७

नाहारे वा न शयने न स्वापे धृतिमिच्छति ।
सखीसहस्रैः सिषिचे नित्यं शीतोपचारकैः ॥८७
पुनः पुनस्तप्यमाना पुनरेव च विह्वला।
न जगाम रुजा शांतिं मन्मथाग्नेर्महीयसः ॥८८
न निद्रां पार्वती भेजे विरहेणोपतापिता ।
स्वतनोस्तापनेनासौ पितुः खेदमवर्धयत् ॥८९
अप्रतीकारपुरुषं विरहं दुहितुः शिवे ।
अवलोक्य स शैलेन्द्रो महादुःखमवाप्तवान् ॥६०
भद्रे त्वं तपसा देवं तोषयित्वा महेश्वरम् ।
भर्तारं तं समृच्छेति पित्रा सम्प्रेरिताथ सा ॥६१
हिमवच्छैलशिखरे गौरीशिखरनामनि ।
चकार पतिलाभाय पार्वती दुष्करं तपः ॥६२
शिशिरेषु जलावासा ग्रीष्मे दहनमध्यगा ।
अर्के निविष्टदृष्टिश्च सुघोरं तप आस्थिता ॥६३

ललिता देवी की आज्ञा से उस कन्दर्प ने इस तरह से शिव को विमोहित करके फिर उसने पार्वती को अपने बाणों से अभितप्त कर दिया था ।८५। बढ़े हुए विरह की ज्वाला से मलिन श्वासों की वायुओं से उसके अधर दल सूख गये थे और उसके कपोल पाण्डु वर्ण के हो गये थे ।८६। पार्वती को आहार में—शयन में—स्नान में कही भी धैर्य नहीं होता था। सहस्रों सखियां नित्य ही शीतल उपचारों से उसका सेचन किया करती थीं ।८७। बार-बार तापमान होती हुई वह फिर-फिर कर बेचैन हो जाती थी। कामाग्नि से जो अधिक थी वह उस रोग की शान्ति नहीं प्राप्त कर सकी थी ।८८। विरह से उप तापित होकर पार्वती को निद्रा भी नहीं आती थी। अपने शरीर के सन्तापन से उसने पिता के भी खेद को बढ़ा दिया था ।८९। जिसका कुछ भी प्रतिकार नहीं था ऐसा शिव के विषय में दुहिता के विरह को देखकर शैलराज को महान् दुःख प्राप्त हो गया था ।६०। पिता ने उसको प्रेरणा दी थी कि हे भद्रे ! तुम तप के द्वारा महेश्वर को प्रसन्न करो और उनको अपना भर्त्ता प्राप्त करो ।६१। हिमवान् पर्वत के शिखर पर एक गौरी