संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तन्मात्रभूतहृदयस्तच्चित्तस्तत्परायणः ।
तत्कथासुधया नीतसमस्तरजनीदिनः ॥८२
तच्छीलवर्णनरतस्तद्रूपालोकनोत्सुकः ।
तच्चारुभोगसंकल्पमालाकरसुमालिकः ।
तन्मयत्वमनुप्राप्तस्ततापातितरां शिवः ॥८३
इमां मनोभवरुजमचिकित्स्यां स धूर्जटिः ।
अवलोक्य विवाहाय भृशमुद्यमवानभूत् ॥८४
वे अपने शरीर की बढ़ी हुई ज्वाला को बार-बार शम भी कर रहे थे और शिला के रूप में जो हिम का जल के पट्ट थे उन पर भी शिव जाकर बैठे थे । वहाँ पर फिर वे शैल सुता के चित्र को नखों से लिखने लग गये थे ।७८। उस चित्र के आलोकन से बहुत ही कामार्ति बढ़ गयी थी । उसका आलेखन ऐसा किया था जो लज्जा से नीचे की ओर मुख वाली थी और कटाक्ष से देख रही थी ।७९। उस चित्र के पट्ट को शिव ने रोमाञ्चित अङ्गों पर प्रक्षिप्त कर लिया था । उस समय बड़ा भारी चिन्ता का सङ्ग था और बहुत ही अधिक रति करने की सम्पत्ति थी । विषमेक्षण बहुत अधिक मदन के ताप से व्यथित हो गये थे ।८०। शिव पार्वती ही को सब ओर देख रहे थे और उसी में अपना मन लगा लिया था । उन्माद से उपपन्न उसी के साथ संलाप करते थे ।८१। उनके हृदय में केवल पार्वती ही थी और वे तच्चित्त और उसी में परायण हो गये थे । उस पार्वती की कथा रूपिणी सुधा से सब दिन और पूरी रात व्यतीत की थी ।८२। उसके ही शील स्वभाव के वर्णन में वे निरत थे और उसके ही रूप के अवलोकन में उत्सुक हो गये थे । उसके साथ भोग के संकल्पों की माला कर में लेकर सुमालिक हो गये थे । शिव तन्मयता को प्राप्त होकर बहुत ही अधिक संतप्त हुए थे ।८३। वह धूर्जटि इस कामदेव की बीमारी को जिसकी कोई भी चिकित्सा नहीं थी जब शिव ने देखा था तो फिर वे विवाह करने के लिए बहुत ही अधिक उद्यमवान हुए थे ।८४।
इत्थं विमोह्य तं देवं कन्दर्पो ललिताज्ञया ।
अथ तां पर्वतसुतामाशुगैरभ्यतापयत् ॥८५
प्रभूतविरहज्वालामलिनैः श्वसितानलैः ।
शुष्यमाणाधरदलो भृशं पांडुकपोलभूः ॥८६