संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३५
न पुष्पशयनेनेन्दुखण्डनिर्गलितामृते । न हिमानोपयसि वा निवृत्तस्तद्वपुर्ज्वरः ॥७७॥
तपश्चर्या में स्थित भगवान् चन्द्रचूड़ को सायकों से तड़ित करने लगा था। इसके पश्चात् काम के बाणों से शम्भु ताड़ित हुए थे और उन्होंने वैराग्य को दूर कर दिया था तथा दुष्कर तप को त्याग दिया था ॥७१॥ समस्त नियमों को छोड़कर शम्भु धैर्य त्याग देने वाले कर दिये गये थे। अब तो उसी पार्वती का ध्यान करके बारम्बार काम से आतुर हो गये थे। ।७२। शिव निःश्वास ले रहे थे और उनका गंड मंडल पाण्डुर हो गया था। अश्रु निकल रहे थे तथा धैर्य के विप्लव होने से विरही बहुत ही संताप युक्त हो गये थे। बारम्बार पूर्व में देखी हुई गिरि की सुता का अनुस्मरण करने लगे थे ।७३। कामदेव के बाणों की अग्नि से संतप्त होते हुए शिव के दाह को दूर करने में न तो चन्द्ररेखा और न गंगा समर्थ हुए थे ।७४। नन्दी-भृङ्गी—और महाकाल आदि प्रमुखों के द्वारा लाई हुई पुष्पों की शय्या में शिव बार-बार लोट लगा रहे थे ।७५। नन्दी के हाथ का सहारा ग्रहण करके फिर दूसरी पुष्पों की शय्या पर भी पहुँचे थे। दूसरी पुष्पों की शय्या पर पहुँचकर भी बार-बार विशेष चेष्टा शान्ति पाने के लिए की थी ।७६। किन्तु उनके देह का काम ज्वरोत्पन्न सन्ताप पुष्पों की शय्या से—चन्द्रकला से निर्गत अमृत से और हिमानी के जल से भी शान्त नहीं हुआ था ।७७।
स तनोरतनुज्वालां शमयिष्यन्मुहुर्मुहुः । शिलीभूतान्हिमपयः पट्टानध्यवसच्छिवः । भूयः शैलसुतारूपं चित्रपट्टे नखैर्लिखत् ॥७८॥
तदालोकनतोऽदूरमनंगातिमवर्धयत् । तामालिख्य ह्रिया नम्रां वीक्षमाणां कटाक्षतः ॥७९॥
तच्चित्रपट्टमंगेषु रोमहर्षेषु चाक्षिपत् । चिन्तासंगेन महता महत्या रतिसंपदा । भूयसा स्मरतापेन विव्यथे विषमेक्षणः ॥८०॥
तामेव सर्वतः पश्यंस्तस्यामेव मनो दिशन् । तयैव संल्लपन्सार्धमुन्मादेनोपपन्नया ॥८१॥