संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 843, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जिनके हृदय मेरी पूजा में और मेरे भक्तों में आदर करने वाले हैं उनको समस्त कार्य का सुख दो और उनका अभीष्ट पूर्ण कर दो ।६४। कामदेव ने इस श्री ललितादेवी के आज्ञा वचन को शिर से ग्रहण करके फिर हाथों को जोड़े हुए वह कामदेव वहाँ से निकल कर चला गया था ।६५। उस कामदेव के समस्त रोमों के छिद्रों से उठे हुए बहुत से परम शोभन आकार वाले कामदेव सम्पूर्ण विश्व को मोहन करने वाले थे ।६६। कामदेव ने उन बहुत से अनङ्गों के द्वारा इस सम्पूर्ण जगत के मंडल को मोहित कर दिया था ओर फिर भगवान् शम्भु पर विजय पाने की इच्छा से स्थाणु के आश्रय में प्राप्त हो गया था ।६७। अपने मित्र वसन्त के साथ तथा सेनानी शीतांशु के सहित पीठमर्द राग से संयुत एवं मन्द वायु के सहित और पुंस्कोकिल के निकले हुए शब्द की काकलियों से समंवित-शृङ्गार वीर सम्पन्न रति से आलिङ्गित वपु वाला कामदेव जयशील धनुष को हिलाता हुआ प्रवीरों का अग्रगामी होकर मदन के अरि शिव के समक्ष में पहुँचकर निडर होकर समास्थित हो गया था ।६८-७०।
तपोनिष्ठं चन्द्रचूडं ताडयामास सायकैः ।
अथ कन्दर्पबाणौघैस्ताडितश्चन्द्रशेखरः ।
दूरीचकार वैराग्यं तपस्तत्याज दुष्करम् ॥७१
नियमानखिलांस्त्यक्त्वा त्यक्तधैर्यः शिवः कृतः ।
तामेव पार्वतीं ध्यात्वा भूयोभूयः स्मरातुरः ॥७२
निशश्वास बहून्शर्वः पांडुरं गण्डमंडलम् ।
बाष्पायमाणो विरही संतप्तो धैर्यविप्लवात् ।
भूयोभूयो गिरिसुतां पूर्वदृष्टामनुस्मरन् ॥७३
अनंगबाणदहनैस्तप्यमानस्य शूलिनः ।
न चन्द्ररेखा नो गङ्गा देहतापच्छिदेऽभवत् ॥७४
नन्दिभृङ्गिमहाकालप्रमुखैर्गणमंडलैः ।
आहृते पुष्पशयने विलुलोठ मुहुर्मुहुः ॥७५
नन्दिनो हस्तमालंब्य पुष्पत्तल्पान्तरात्पुनः ।
पुष्पतल्पान्तरं गत्वा व्यचेष्टत मुहुर्मुहुः ॥७६