भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३३

श्री देवी ने कहा-हे वत्स ! आओ, हे मनोजन्मन् आपको अब कुछ भी कहीं पर भय नहीं है। हे अव्याहत बाणों वाले ! मेरे प्रसाद से आप सम्पूर्ण जगत को मोहित करो ।५७। तुम्हारे बाणों के पातन से धैर्य के विप्लव होने से शम्भु पर्वत हितवान् की सुता पार्वती को शीघ्र ही व्याह लेंगे ।५८। मेरे प्रसाद से तुमसे समुत्पन्न सहस्रों करोड़ कामदेव सबके देहों में प्रवेश करके उत्तम रति को देंगे ।५६। मेरे प्रसाद से क्रुद्ध भी भगवान शम्भु जिनको कि वैराग्य हो गया है, तुम्हारे देह को दग्ध करने में समर्थ नहीं होंगे ।६०। भव को मोहित करने वाला कामदेव सब प्राणियों में अदृश्य मूर्ति वाला होकर रहेगा । अपनी भार्या के विरह की आशंका वाला देह के आधे भाग को दे देता । तुम्हारे बाण से आहत मानस वाले यह कातरात्मा होकर प्रयाण कर गये हैं ।६१। आज से लेकर हे कन्दर्प ! महान् मेरे प्रसाद से जो तेरी निन्दा करेंगे अथवा तुझसे विमुख विचार वाले होंगे उनको अवश्य ही नपुंसकता जन्म-जन्मों में हो जायगी ।६२। जो पापिष्ठ हैं और मेरे भक्तों के द्रोही हैं उनको अगम्या अर्थात् न गमन करने के योग्य नारियों में गिराकर विनाश करदो ।६३।

येषां मदीय पूजासु मद्भक्तेष्वादृतं मनः ।
तेषां कामसुखं सर्वं संपादय समीप्सितम् ॥६४

इति श्रीललितादेव्या कृताज्ञावचनं स्मरः ।
तथेति शिरसा बिभ्रत्सांजलिनिर्ययौ ततः ॥६५

तस्यानंगस्य सर्वेभ्यो रोमकूपेभ्य उत्थिताः ।
बहवः शोभनाकारा मदना विश्वमोहनाः ॥६६

तैर्विमोह्य समस्तं च जगच्चक्रं मनोभवः ।
पुनः स्थाण्वाश्रमं प्राप चन्द्रमौलेर्जिगीषया ॥६७

वसंतेन च मित्रेण सेनान्या शीतरोचिषा ।
रागेण पीठमर्देन मन्दानिलरयेण च ॥६८

पुंस्कोकिलगलत्स्वानकाकलीभिश्च संयुतः ।
शृङ्गारवीरसंपन्नो रत्यालिंगितविग्रहः ॥६६

जैत्रं शरासनं धुन्वन्प्रवीराणां पुरोगमः ।
मदनारेरभिमुखं प्राप्य निर्भय आस्थितः ॥७०