भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अच्छा हुआ-अच्छा हुआ -यह कहकर ललिताम्बा की स्तुति की थी ।५२। सबने परम सन्तुष्ट होते हुए नभो मंडल से पुष्पों की वर्षा थी । वे दोनों भी बहुत प्रसन्न हुए थे और उन्होंने महा भक्ति से ललितेश्वरी को प्रणाम किया था ।५३। वे दोनों ललितेश्वरी के समीप में समागत होकर दोनों हाथों को जोड़कर समीप में स्थित हो गये थे ? इसके अनन्तर कामदेव भी महेश्वरी को प्रणाम करके भक्ति भाव से परिपूर्ण मन वाला होकर इस वाक्य को बोला था ।५४। हे ललिताम्बिके ! शम्भु के नेत्र से जो मेरा शरीर दग्ध हो गया था वह आपके कृपा कटाक्ष से पुनः प्राप्त हो गया है ।५५। मैं आपका ही पुत्र हूँ । किसी भी सेवा में मुझे नियुक्त कीजिए । इस प्रकार से जब परमेशानी से कहा गया था तो उस देवी ने कामदेव से कहा था ।५६।

श्रीदेव्युवाच-

वत्सागच्छ मनोजन्मन्न भयं तव विद्यते ।
मत्प्रसादाज्जगत्सर्वं मोहयाव्याहताशुग ॥५७
तद्वाणपातनाज्जातधैर्यविप्लव ईश्वरः ।
पर्वतस्य सुतां गौरीं परिणेष्यति सत्वरम् ॥५८
सहस्रकोटयः कामा मत्प्रसादात्त्वदुद्भवाः ।
सर्वेषां देहमाविश्य दास्यंति रतिमुत्तमाम् ॥५९
मत्प्रसादेन वैराग्यात्संक्रुद्धोऽपि स ईश्वरः ।
देहदाहं विधातुं ते न समर्थो भविष्यति ॥६०
अदृश्यमूर्तिः सर्वेषां प्राणिनां भवमोहनः ।
स्वभार्याविरह शंकी देहस्यार्धं प्रदास्यति ।
प्रयातोऽसौ कातरात्मा त्वद्बाणाहतमानसः ॥६१
अद्य प्रभृति कन्दर्प मत्प्रसादान्महीयसः ।
त्वन्निंदां ये करिष्यन्ति त्वयि वा विमुखाशयाः ।
अवश्यं क्लीवतैव स्यात्तेषां जन्मनिजन्मनि ॥६२
ये पापिष्ठा दुरात्मानो मद्भक्तद्रोहिणश्च हि ।
तानगम्यासु नारीषु पाययित्वा विनाशय ॥६३

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