संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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रति को कटाक्ष के द्वारा आनन्दित कर रहा था। वह रति भी महान् आनन्द के सागर में मग्न होकर अपने स्वामी को देखती हुई आनन्द को प्राप्त हुई थी ।४७। महाराज्ञी उन दोनों रति और कामदेव को भक्ति से निर्भर मानस वाले तथा परम प्रसन्न अन्तरात्मा वाले देखकर मन्दस्मित मुखकमल वाली हुई थी और लज्जा से नम्रमुखी उस रति को देखकर श्यामला से यह बोली थी ।४८। हे श्यामले ! इसको स्नान कराकर वस्त्रों और कांची आदि भूषणों से भूषित करके पूर्व की ही भाँति शीघ्र यहाँ लाओ ।४६।
तदाज्ञां शिरसा धृत्वा श्यामा सर्वं तथाकरोत् ।
ब्रह्मर्षिभिर्वसिष्ठाद्यै र्वैवाहिकविधानतः ॥५०
कारयामास दम्पत्योः पाणिग्रहणमंगलम् ।
अप्सरोभिश्च सर्वाभिनृत्यगीतादिसंयुतम् ॥५१
एतद्दृष्ट्वा महेन्द्राद्या ऋषयश्च तपोधनाः ।
साधुसाध्विति शंसंतस्तुष्टुवुर्ललितांबिकाम् ॥५२
पुष्पवृष्टिं विमुञ्चन्तः सर्वे सन्तुष्टमानसाः ।
बभूवुस्तौ महाभक्त्या प्रणम्य ललितेश्वरीम् ॥५३
तत्पार्श्वे तु समागत्य बद्धांजलिपुटौ स्थितौ ।
अथ कंदर्पवीरोऽपि नमस्कृत्य महेश्वरीम् ।
व्यज्ञापयदिदं वाक्यं भक्तिनिर्भरमानसः ॥५४
यदग्धमीशनेत्रेण वपुर्मे ललितांबिके ।
तत्त्वदीयकटाक्षस्य प्रसादात्पुनरागतम् ॥५५
तव पुत्रोऽस्मि दासोऽस्मि क्वापि कृत्ये नियुंक्ष्व माम् ।
इत्युक्ता परमेशानी तमाह मकरध्वजम् ॥५६
उस महाराज्ञी की आज्ञा को शिर पर धारण करके उस श्यामला ने सब कुछ वैसा ही कर दिया था। वसिष्ठ आदि ब्रह्मर्षियों के द्वारा वैवाहिक विधान किया गया था ।५०। उन दम्पतियों का पाणिग्रहण का मङ्गल किया गया जो सभी अप्सराओं के द्वारा नृत्य और गीत आदि से समन्वित था। ।५१। यह सब कुछ देखकर महेन्द्र आदि देवगण तथा तपोधन ऋषियों ने