संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
हयग्रीव उवाच- इति स्तुत्वा महेशानीं ब्रह्माद्या विबुधोत्तमाः । तां रतिं दर्शयामासुर्मलिनां शोककर्शिताम् ॥४३ सा पर्यश्रुमुखी कीर्णकुन्तला धूलिधूसरा । ननाम जगदम्बां वै वैधव्यत्यक्तभूषणा ॥४४ अथ तद्दर्शनोत्पन्नकारुण्या परमेश्वरी । ततः कटाक्षादुत्पन्नः स्मयमानमुखाम्बुजः ॥४५ पूर्वदेहाधिकरुचिर्मन्मथो मदमेदुरः । द्विभुजः सर्वभूषाढ्यः पुष्पेषुः पुष्पकार्मुकः ॥४६ आनन्दयन्कटाक्षेण पूर्वजन्मप्रियां रतिम् । अथ सापि रतिर्देवी महत्यानन्दसागरे । मज्जन्ती निजभर्त्तारमवलोक्य मुदं गता ॥४७ आनन्दितांतरात्मानौ भक्तिनिर्भरमानसौ । ज्ञात्वाथ तौ महाराज्ञी मन्दस्मितमुखाम्बुजा । व्रीडानतां रतिं वीक्ष्य श्यामलामिदमब्रवीत् ॥४८ श्यामले स्नपयित्वैनां वस्त्रकाञ्च्यादिभूषणैः । अलंकृत्य यथापूर्वं शीघ्रंमानीयतामिह ॥४६
हयग्रीवजी ने कहा—उत्तम देव ब्रह्मा आदि ने इस रीति से उस ईशानी की स्तुति की थी और उस रति को बहुत ही मलिन और शोक से कशित थी दिखा दिया था ।४३। वह मुख पर आँसू फैलाती हुई बिखरे हुए केशों वाली और धूलि से धूसर और विधवा होने के कारण भूषणों को त्याग देने वाली उस रति ने उस जगदम्बा की सेवा में प्रणाम किया था ।४४। इसके अनन्तर उस बिचारी वैधव्य को प्राप्त हुई रति की ओर देख-कर जगदम्बा के हृदय में करुणा उत्पन्न हो गयी थी और उस परमेश्वरी के कटाक्ष से मुस्कराते हुए मुख वाला कामदेव समुत्पन्न हो गया था ।४५। उसके देह की कान्ति पूर्व के देह से भी अधिक थी और वह मद से मेदुर हो गया था । उसको दो बाहू थीं—वह समस्त भूषणों से सम्पन्न था और पुष्पों के बाणों वाला तथा कुसुमों के धनुष वाला था ।४६। पूर्वजन्म की प्रिया