संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमदन पुनर्भंव वर्णन ] [ ४२६
तया तु दृष्टेन मनोभवेन संमोहितः पूर्ववदिन्दुमौलिः । चिरं कृतात्यंतमहासपर्यां तां पार्वतीं द्राक्परिणेष्यतीशः ॥३८ तयोश्च संगाद्भाविता कुमारः समस्तगीर्वाणचमूविनेता । तेनैव वीरेण रणे निरस्य स तारको नाम सुरारिराजः ॥३६ यो भंडदैत्यस्य दुराशयस्य मित्रं स लोकत्रयधूमकेतुः । श्रीकण्ठपुत्रेण रणे हतश्चेत्प्राणप्रतिष्ठैव तदा भवेन्नः ॥४० तस्मात्त्वमंब त्रिपुरे जनानां मानापहं मन्मथवीरवर्यम् । उत्पाद्य रत्या विधवात्वदुःखमपाकुरु व्याकुलकुन्तलायाः॥४१ एषा त्वनाथा भवतीं प्रपन्ना भर्तृप्रणाशेन कृशांगयष्टिः । नमस्करोति त्रिपुराभिधाने तदत्र कारुण्यकलां विधेहि ॥४२
इसके अनन्तर आपने दुराशय का जो रण में बहुत ही दुर्मद था वध किया था और हम लोगों के लिए वह बिना शरीर वाला हो गया है। उस कामदेव के संजीवन को आप शीघ्र ही कर दीजिए ।३६। यह रति बिचारी अपने स्वामी के वियोग से बहुत ही खिन्न है। उसको अत्यन्त बुरा वैधव्य प्राप्त हो गया है। हे श्रीललिते ! फिर आपके द्वारा उत्पन्न किये गये कामदेव के सङ्ग से वह सनाथा होगी ।३७। उसी भाँति उस दुष्ट कामदेव ने फिर इन्दुमौलि को पूर्व की ही भाँति संमोहित किया है वह ईश चिरकाल पर्यन्त अर्चा करने वाली उस पार्वती के साथ शीघ्र ही विवाह करेंगे ।३८। उन दोनों (पार्वती-शिव) के संयोग से कुमार उत्पन्न होगा जो समस्त देवगणों की सेना का सेनानी होगा। उस ही वीर के द्वारा रण में असुरों का राजा वह तारक पराजित किया गया ।३६। वह तीनों लोकों का धूमकेतु परम दुष्ट भंडासुर का मित्र था। वह रण में श्रीकण्ठ के पुत्र के द्वारा ही मारा गया था। उसी समय में हमारे प्राणों की प्रतिष्ठा हुई थी ।४०। इस कारण से हे अम्ब ! हे त्रिपुरे ! जनों के मान के अपहर्त्ता वीरवर कामदेव को उत्पन्न करके विचारी उस व्याकुल कुन्तला रति के विधवापने को आप दूर कर दीजिए ।४१। यह विचारी अनाथ है और अपने भर्त्ता के प्रणाश होने से अत्यन्त कृश अङ्गों वाली आपकी शरणागति में प्राप्त हुई है। हे त्रिपुराभिधाने ! यह आपको नमस्कार करती है। अतएव इस बिचारी पर आप करुणा करिए ।४२।