भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तेनाद्रिवंशे धृतमन्मलाभां कन्यामुमां योजयितुं प्रवृत्ताः । एवं स्मरं प्रेरितवंत एव तस्यांतिकं घोरतपः स्थितस्य ॥३४

तेनाथ वैराग्यतपोविघातक्रोधेन लालाटकृशानुदग्धः । भस्मावशेषो मदनस्ततोऽभूत्ततो हि भंडासुर एष जातः ॥३५

आप कामेश्वर की गोद में ही सदा निवास किया करती हैं और आपका काल ही स्वरूप है। हे देवि ! आपने बड़ी अनुकम्पा की है । आप कल्प के अन्त में उठी हुई काली के स्वरूप वाली हैं। आप कामनाओं के देने वाली हैं और आप साक्षात् कल्पलता हैं । आपको नमस्कार है । आप सवारुणा हैं और सान्द्रशीतांशु के समान शीतल हैं। आपके नेत्र हरिण के बच्चे के तुल्य हैं और आपका मुख कमल जैसा है। आप सार के भी सार की सदा एक भूमि है। आप समस्त विद्याओं की स्वामिनी हैं । आपको हमारा प्रणिपात है ।२६-३०। आपके प्रभाव से श्री शम्भुनाथ के द्वारा प्रकटित अग्निजा में चित् है। समर में महान् प्रचण्ड भंडासुर प्रभृति सब जो जगत के कंटक थे, मारे गये हैं।३१। सब शरीरों को नवीन करके हमको स्वस्थ बना दिया है और आपने सान्द्र करुणा की सुधा से ही कर दिया था । आपने समस्त भुवन को हर्ष के साथ जीवित कर दिया है। हे सभ्य-लक्ष्म्ये ! आप तो परम सुन्दरी है।३२। महान् आशय वाले श्री शम्भु के आप द्वितीय तेज के प्रसर के स्वरूप वालो हैं । जो स्थाणु के आश्रम से कॢप्तता से विरक्त सती के वियोग से विरस्त भोग वाला है। ३३। इससे आद्रि के वंश में जन्म का लाभ प्राप्त करने वाली कन्या उमा को योजित करने के लिए सब प्रवृत्त हुए थे । घोर तपस्या में वर्त्तमान उनके समीप में कामदेव को भेजने की प्रेरणा की थी ।३४। उन्होंने वैराग्य से किये जाने वाले तप के विघात से जो क्रोध हुआ था उससे वह कामदेव ललाट की अग्नि से दग्ध कर दिया था । फिर मदन भस्म मात्र रह गया था । वही मदन फिर भंडासुर होकर उत्पन्न हुआ था । ३५।

ततो वधस्तस्य दुराशयस्य कृतो भवत्या रणदुर्मदस्य । अथास्मदर्थे त्वतनुस्सजातस्त्वं कामसंजीवनमाशु कुर्याः ॥३६

इयं रतिर्भर्तृवियोगखिन्ना वैधव्यमत्यंतमभव्यमाप । पुनस्त्वदुत्पादितकामसंगाद्भविष्यति श्रीललिते सनाथा ॥३७