भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४२७

ललिते ! आपको प्रणाम है ।२३। आप सर्वत्र से समुत्पन्न प्रथम देवियों के द्वारा आश्रित चक्रभूमि वाली हैं। और सब देवों के मनोरथों को पूर्ण करने वाली हैं। आप सम्पूर्ण लोक की माता हैं। हमारी रक्षा कीजिए ।२४। हे वाशिनी आदि वाग्विभूते ! आप वर्धिष्णु चक्र की वाह वाह हैं। आपके केश वलाहक की द्युति वाले हैं। आप वचनों की सागर हैं। आप वरदान देने वाली हैं। हे सुन्दरि ! आप इस विश्व की रक्षा करें ।२५। बाण के आदि विशेष आयुधों की साम्राज्ञी हैं। आप भंडासुर की सेना के वन लिये दावाग्नि हैं। आप अतीव उग्र तेज से अम्बुराशि को भी ज्वलित करने वाली हैं। आप प्रसंयमाना हैं। आपकी सभी ओर से प्रणाम है ।२६। हे कामेशि ! वज्रेशि ! हे भगेशि ! आप रूप रहित हैं। हे कन्ये ! हे कले ! आप काल के विलोप करने में परम दक्ष हैं। आपने दैत्यों की सेनाओं को पूर्णतया समाप्त कर दिया है और अब उनकी केवल कथा ही शेष है। कामेशयान्ते ! हे कमले ! आपको नमस्कार है ।२७। आप बिन्दु में ही संस्थित हैं और आपका रूप बिन्दु कला ही एक है। आप बिन्दु के स्वरूप वाली हैं और आपने ज्ञान के बड़े प्रकाश को किया है। आपके बड़े कुचों पर हार विलुलित हो रहा है। आपका प्रभाव बृहत् है। हे ललिते ! आपको हम सबका नमस्कार है ।२८।

कामेश्वरोत्संगसदानिवासे कालात्मिके देवि कृतानुकम्पे । कल्पावसानोत्थितकालिरूपे कामप्रदे कल्पलते नमस्ते ॥२९॥

सवारुणे सांद्रसुधांशुशीते सारंगशावाक्षि सरोजवक्त्रे । सारस्य सारस्य सदैकभूमे समस्तविद्येश्वरि संनतिस्ते ॥३०॥

तव प्रभावेण चिदग्निजायां श्रीशम्भुनाथप्रकटीकृतायाः । भंडासुराद्याः समरे प्रचंडा हता जगत्कंटकतां प्रयाताः ॥३१॥

नव्यानि सर्वाणि वपूंषि कृत्वा हि सांद्रकारुण्यसुधाप्ल्यैर्नः। त्वया समस्तं भुवनं सहर्षं सुजीवितं सुन्दरि सभ्यलभ्ये ॥३२॥

श्रीशम्भुनाथस्य महाशयस्य द्वितीयतेजः प्रसरात्मके यः । स्थाण्वाश्रमे कॢप्ततया विरक्तः सतीवियोगेन । विरस्तभोगः ॥३३॥