भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३१

रति को कटाक्ष के द्वारा आनन्दित कर रहा था। वह रति भी महान् आनन्द के सागर में मग्न होकर अपने स्वामी को देखती हुई आनन्द को प्राप्त हुई थी ।४७। महाराज्ञी उन दोनों रति और कामदेव को भक्ति से निर्भर मानस वाले तथा परम प्रसन्न अन्तरात्मा वाले देखकर मन्दस्मित मुखकमल वाली हुई थी और लज्जा से नम्रमुखी उस रति को देखकर श्यामला से यह बोली थी ।४८। हे श्यामले ! इसको स्नान कराकर वस्त्रों और कांची आदि भूषणों से भूषित करके पूर्व की ही भाँति शीघ्र यहाँ लाओ ।४६।

तदाज्ञां शिरसा धृत्वा श्यामा सर्वं तथाकरोत् ।
ब्रह्मर्षिभिर्वसिष्ठाद्यै र्वैवाहिकविधानतः ॥५०
कारयामास दम्पत्योः पाणिग्रहणमंगलम् ।
अप्सरोभिश्च सर्वाभिनृत्यगीतादिसंयुतम् ॥५१
एतद्दृष्ट्वा महेन्द्राद्या ऋषयश्च तपोधनाः ।
साधुसाध्विति शंसंतस्तुष्टुवुर्ललितांबिकाम् ॥५२
पुष्पवृष्टिं विमुञ्चन्तः सर्वे सन्तुष्टमानसाः ।
बभूवुस्तौ महाभक्त्या प्रणम्य ललितेश्वरीम् ॥५३
तत्पार्श्वे तु समागत्य बद्धांजलिपुटौ स्थितौ ।
अथ कंदर्पवीरोऽपि नमस्कृत्य महेश्वरीम् ।
व्यज्ञापयदिदं वाक्यं भक्तिनिर्भरमानसः ॥५४
यदग्धमीशनेत्रेण वपुर्मे ललितांबिके ।
तत्त्वदीयकटाक्षस्य प्रसादात्पुनरागतम् ॥५५
तव पुत्रोऽस्मि दासोऽस्मि क्वापि कृत्ये नियुंक्ष्व माम् ।
इत्युक्ता परमेशानी तमाह मकरध्वजम् ॥५६

उस महाराज्ञी की आज्ञा को शिर पर धारण करके उस श्यामला ने सब कुछ वैसा ही कर दिया था। वसिष्ठ आदि ब्रह्मर्षियों के द्वारा वैवाहिक विधान किया गया था ।५०। उन दम्पतियों का पाणिग्रहण का मङ्गल किया गया जो सभी अप्सराओं के द्वारा नृत्य और गीत आदि से समन्वित था। ।५१। यह सब कुछ देखकर महेन्द्र आदि देवगण तथा तपोधन ऋषियों ने

४३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अच्छा हुआ-अच्छा हुआ -यह कहकर ललिताम्बा की स्तुति की थी ।५२। सबने परम सन्तुष्ट होते हुए नभो मंडल से पुष्पों की वर्षा थी । वे दोनों भी बहुत प्रसन्न हुए थे और उन्होंने महा भक्ति से ललितेश्वरी को प्रणाम किया था ।५३। वे दोनों ललितेश्वरी के समीप में समागत होकर दोनों हाथों को जोड़कर समीप में स्थित हो गये थे ? इसके अनन्तर कामदेव भी महेश्वरी को प्रणाम करके भक्ति भाव से परिपूर्ण मन वाला होकर इस वाक्य को बोला था ।५४। हे ललिताम्बिके ! शम्भु के नेत्र से जो मेरा शरीर दग्ध हो गया था वह आपके कृपा कटाक्ष से पुनः प्राप्त हो गया है ।५५। मैं आपका ही पुत्र हूँ । किसी भी सेवा में मुझे नियुक्त कीजिए । इस प्रकार से जब परमेशानी से कहा गया था तो उस देवी ने कामदेव से कहा था ।५६।

श्रीदेव्युवाच-

वत्सागच्छ मनोजन्मन्न भयं तव विद्यते ।
मत्प्रसादाज्जगत्सर्वं मोहयाव्याहताशुग ॥५७
तद्वाणपातनाज्जातधैर्यविप्लव ईश्वरः ।
पर्वतस्य सुतां गौरीं परिणेष्यति सत्वरम् ॥५८
सहस्रकोटयः कामा मत्प्रसादात्त्वदुद्भवाः ।
सर्वेषां देहमाविश्य दास्यंति रतिमुत्तमाम् ॥५९
मत्प्रसादेन वैराग्यात्संक्रुद्धोऽपि स ईश्वरः ।
देहदाहं विधातुं ते न समर्थो भविष्यति ॥६०
अदृश्यमूर्तिः सर्वेषां प्राणिनां भवमोहनः ।
स्वभार्याविरह शंकी देहस्यार्धं प्रदास्यति ।
प्रयातोऽसौ कातरात्मा त्वद्बाणाहतमानसः ॥६१
अद्य प्रभृति कन्दर्प मत्प्रसादान्महीयसः ।
त्वन्निंदां ये करिष्यन्ति त्वयि वा विमुखाशयाः ।
अवश्यं क्लीवतैव स्यात्तेषां जन्मनिजन्मनि ॥६२
ये पापिष्ठा दुरात्मानो मद्भक्तद्रोहिणश्च हि ।
तानगम्यासु नारीषु पाययित्वा विनाशय ॥६३

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३३

श्री देवी ने कहा-हे वत्स ! आओ, हे मनोजन्मन् आपको अब कुछ भी कहीं पर भय नहीं है। हे अव्याहत बाणों वाले ! मेरे प्रसाद से आप सम्पूर्ण जगत को मोहित करो ।५७। तुम्हारे बाणों के पातन से धैर्य के विप्लव होने से शम्भु पर्वत हितवान् की सुता पार्वती को शीघ्र ही व्याह लेंगे ।५८। मेरे प्रसाद से तुमसे समुत्पन्न सहस्रों करोड़ कामदेव सबके देहों में प्रवेश करके उत्तम रति को देंगे ।५६। मेरे प्रसाद से क्रुद्ध भी भगवान शम्भु जिनको कि वैराग्य हो गया है, तुम्हारे देह को दग्ध करने में समर्थ नहीं होंगे ।६०। भव को मोहित करने वाला कामदेव सब प्राणियों में अदृश्य मूर्ति वाला होकर रहेगा । अपनी भार्या के विरह की आशंका वाला देह के आधे भाग को दे देता । तुम्हारे बाण से आहत मानस वाले यह कातरात्मा होकर प्रयाण कर गये हैं ।६१। आज से लेकर हे कन्दर्प ! महान् मेरे प्रसाद से जो तेरी निन्दा करेंगे अथवा तुझसे विमुख विचार वाले होंगे उनको अवश्य ही नपुंसकता जन्म-जन्मों में हो जायगी ।६२। जो पापिष्ठ हैं और मेरे भक्तों के द्रोही हैं उनको अगम्या अर्थात् न गमन करने के योग्य नारियों में गिराकर विनाश करदो ।६३।

येषां मदीय पूजासु मद्भक्तेष्वादृतं मनः ।
तेषां कामसुखं सर्वं संपादय समीप्सितम् ॥६४

इति श्रीललितादेव्या कृताज्ञावचनं स्मरः ।
तथेति शिरसा बिभ्रत्सांजलिनिर्ययौ ततः ॥६५

तस्यानंगस्य सर्वेभ्यो रोमकूपेभ्य उत्थिताः ।
बहवः शोभनाकारा मदना विश्वमोहनाः ॥६६

तैर्विमोह्य समस्तं च जगच्चक्रं मनोभवः ।
पुनः स्थाण्वाश्रमं प्राप चन्द्रमौलेर्जिगीषया ॥६७

वसंतेन च मित्रेण सेनान्या शीतरोचिषा ।
रागेण पीठमर्देन मन्दानिलरयेण च ॥६८

पुंस्कोकिलगलत्स्वानकाकलीभिश्च संयुतः ।
शृङ्गारवीरसंपन्नो रत्यालिंगितविग्रहः ॥६६

जैत्रं शरासनं धुन्वन्प्रवीराणां पुरोगमः ।
मदनारेरभिमुखं प्राप्य निर्भय आस्थितः ॥७०

४३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जिनके हृदय मेरी पूजा में और मेरे भक्तों में आदर करने वाले हैं उनको समस्त कार्य का सुख दो और उनका अभीष्ट पूर्ण कर दो ।६४। कामदेव ने इस श्री ललितादेवी के आज्ञा वचन को शिर से ग्रहण करके फिर हाथों को जोड़े हुए वह कामदेव वहाँ से निकल कर चला गया था ।६५। उस कामदेव के समस्त रोमों के छिद्रों से उठे हुए बहुत से परम शोभन आकार वाले कामदेव सम्पूर्ण विश्व को मोहन करने वाले थे ।६६। कामदेव ने उन बहुत से अनङ्गों के द्वारा इस सम्पूर्ण जगत के मंडल को मोहित कर दिया था ओर फिर भगवान् शम्भु पर विजय पाने की इच्छा से स्थाणु के आश्रय में प्राप्त हो गया था ।६७। अपने मित्र वसन्त के साथ तथा सेनानी शीतांशु के सहित पीठमर्द राग से संयुत एवं मन्द वायु के सहित और पुंस्कोकिल के निकले हुए शब्द की काकलियों से समंवित-शृङ्गार वीर सम्पन्न रति से आलिङ्गित वपु वाला कामदेव जयशील धनुष को हिलाता हुआ प्रवीरों का अग्रगामी होकर मदन के अरि शिव के समक्ष में पहुँचकर निडर होकर समास्थित हो गया था ।६८-७०।

तपोनिष्ठं चन्द्रचूडं ताडयामास सायकैः ।
अथ कन्दर्पबाणौघैस्ताडितश्चन्द्रशेखरः ।
दूरीचकार वैराग्यं तपस्तत्याज दुष्करम् ॥७१
नियमानखिलांस्त्यक्त्वा त्यक्तधैर्यः शिवः कृतः ।
तामेव पार्वतीं ध्यात्वा भूयोभूयः स्मरातुरः ॥७२
निशश्वास बहून्शर्वः पांडुरं गण्डमंडलम् ।
बाष्पायमाणो विरही संतप्तो धैर्यविप्लवात् ।
भूयोभूयो गिरिसुतां पूर्वदृष्टामनुस्मरन् ॥७३
अनंगबाणदहनैस्तप्यमानस्य शूलिनः ।
न चन्द्ररेखा नो गङ्गा देहतापच्छिदेऽभवत् ॥७४
नन्दिभृङ्गिमहाकालप्रमुखैर्गणमंडलैः ।
आहृते पुष्पशयने विलुलोठ मुहुर्मुहुः ॥७५
नन्दिनो हस्तमालंब्य पुष्पत्तल्पान्तरात्पुनः ।
पुष्पतल्पान्तरं गत्वा व्यचेष्टत मुहुर्मुहुः ॥७६

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३५

न पुष्पशयनेनेन्दुखण्डनिर्गलितामृते । न हिमानोपयसि वा निवृत्तस्तद्वपुर्ज्वरः ॥७७॥

तपश्चर्या में स्थित भगवान् चन्द्रचूड़ को सायकों से तड़ित करने लगा था। इसके पश्चात् काम के बाणों से शम्भु ताड़ित हुए थे और उन्होंने वैराग्य को दूर कर दिया था तथा दुष्कर तप को त्याग दिया था ॥७१॥ समस्त नियमों को छोड़कर शम्भु धैर्य त्याग देने वाले कर दिये गये थे। अब तो उसी पार्वती का ध्यान करके बारम्बार काम से आतुर हो गये थे। ।७२। शिव निःश्वास ले रहे थे और उनका गंड मंडल पाण्डुर हो गया था। अश्रु निकल रहे थे तथा धैर्य के विप्लव होने से विरही बहुत ही संताप युक्त हो गये थे। बारम्बार पूर्व में देखी हुई गिरि की सुता का अनुस्मरण करने लगे थे ।७३। कामदेव के बाणों की अग्नि से संतप्त होते हुए शिव के दाह को दूर करने में न तो चन्द्ररेखा और न गंगा समर्थ हुए थे ।७४। नन्दी-भृङ्गी—और महाकाल आदि प्रमुखों के द्वारा लाई हुई पुष्पों की शय्या में शिव बार-बार लोट लगा रहे थे ।७५। नन्दी के हाथ का सहारा ग्रहण करके फिर दूसरी पुष्पों की शय्या पर भी पहुँचे थे। दूसरी पुष्पों की शय्या पर पहुँचकर भी बार-बार विशेष चेष्टा शान्ति पाने के लिए की थी ।७६। किन्तु उनके देह का काम ज्वरोत्पन्न सन्ताप पुष्पों की शय्या से—चन्द्रकला से निर्गत अमृत से और हिमानी के जल से भी शान्त नहीं हुआ था ।७७।

स तनोरतनुज्वालां शमयिष्यन्मुहुर्मुहुः । शिलीभूतान्हिमपयः पट्टानध्यवसच्छिवः । भूयः शैलसुतारूपं चित्रपट्टे नखैर्लिखत् ॥७८॥

तदालोकनतोऽदूरमनंगातिमवर्धयत् । तामालिख्य ह्रिया नम्रां वीक्षमाणां कटाक्षतः ॥७९॥

तच्चित्रपट्टमंगेषु रोमहर्षेषु चाक्षिपत् । चिन्तासंगेन महता महत्या रतिसंपदा । भूयसा स्मरतापेन विव्यथे विषमेक्षणः ॥८०॥

तामेव सर्वतः पश्यंस्तस्यामेव मनो दिशन् । तयैव संल्लपन्सार्धमुन्मादेनोपपन्नया ॥८१॥

४३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तन्मात्रभूतहृदयस्तच्चित्तस्तत्परायणः ।
तत्कथासुधया नीतसमस्तरजनीदिनः ॥८२
तच्छीलवर्णनरतस्तद्रूपालोकनोत्सुकः ।
तच्चारुभोगसंकल्पमालाकरसुमालिकः ।
तन्मयत्वमनुप्राप्तस्ततापातितरां शिवः ॥८३
इमां मनोभवरुजमचिकित्स्यां स धूर्जटिः ।
अवलोक्य विवाहाय भृशमुद्यमवानभूत् ॥८४

वे अपने शरीर की बढ़ी हुई ज्वाला को बार-बार शम भी कर रहे थे और शिला के रूप में जो हिम का जल के पट्ट थे उन पर भी शिव जाकर बैठे थे । वहाँ पर फिर वे शैल सुता के चित्र को नखों से लिखने लग गये थे ।७८। उस चित्र के आलोकन से बहुत ही कामार्ति बढ़ गयी थी । उसका आलेखन ऐसा किया था जो लज्जा से नीचे की ओर मुख वाली थी और कटाक्ष से देख रही थी ।७९। उस चित्र के पट्ट को शिव ने रोमाञ्चित अङ्गों पर प्रक्षिप्त कर लिया था । उस समय बड़ा भारी चिन्ता का सङ्ग था और बहुत ही अधिक रति करने की सम्पत्ति थी । विषमेक्षण बहुत अधिक मदन के ताप से व्यथित हो गये थे ।८०। शिव पार्वती ही को सब ओर देख रहे थे और उसी में अपना मन लगा लिया था । उन्माद से उपपन्न उसी के साथ संलाप करते थे ।८१। उनके हृदय में केवल पार्वती ही थी और वे तच्चित्त और उसी में परायण हो गये थे । उस पार्वती की कथा रूपिणी सुधा से सब दिन और पूरी रात व्यतीत की थी ।८२। उसके ही शील स्वभाव के वर्णन में वे निरत थे और उसके ही रूप के अवलोकन में उत्सुक हो गये थे । उसके साथ भोग के संकल्पों की माला कर में लेकर सुमालिक हो गये थे । शिव तन्मयता को प्राप्त होकर बहुत ही अधिक संतप्त हुए थे ।८३। वह धूर्जटि इस कामदेव की बीमारी को जिसकी कोई भी चिकित्सा नहीं थी जब शिव ने देखा था तो फिर वे विवाह करने के लिए बहुत ही अधिक उद्यमवान हुए थे ।८४।

इत्थं विमोह्य तं देवं कन्दर्पो ललिताज्ञया ।
अथ तां पर्वतसुतामाशुगैरभ्यतापयत् ॥८५
प्रभूतविरहज्वालामलिनैः श्वसितानलैः ।
शुष्यमाणाधरदलो भृशं पांडुकपोलभूः ॥८६

मदन पुनर्भव वर्णन ] [ ४३७

नाहारे वा न शयने न स्वापे धृतिमिच्छति ।
सखीसहस्रैः सिषिचे नित्यं शीतोपचारकैः ॥८७
पुनः पुनस्तप्यमाना पुनरेव च विह्वला।
न जगाम रुजा शांतिं मन्मथाग्नेर्महीयसः ॥८८
न निद्रां पार्वती भेजे विरहेणोपतापिता ।
स्वतनोस्तापनेनासौ पितुः खेदमवर्धयत् ॥८९
अप्रतीकारपुरुषं विरहं दुहितुः शिवे ।
अवलोक्य स शैलेन्द्रो महादुःखमवाप्तवान् ॥६०
भद्रे त्वं तपसा देवं तोषयित्वा महेश्वरम् ।
भर्तारं तं समृच्छेति पित्रा सम्प्रेरिताथ सा ॥६१
हिमवच्छैलशिखरे गौरीशिखरनामनि ।
चकार पतिलाभाय पार्वती दुष्करं तपः ॥६२
शिशिरेषु जलावासा ग्रीष्मे दहनमध्यगा ।
अर्के निविष्टदृष्टिश्च सुघोरं तप आस्थिता ॥६३

ललिता देवी की आज्ञा से उस कन्दर्प ने इस तरह से शिव को विमोहित करके फिर उसने पार्वती को अपने बाणों से अभितप्त कर दिया था ।८५। बढ़े हुए विरह की ज्वाला से मलिन श्वासों की वायुओं से उसके अधर दल सूख गये थे और उसके कपोल पाण्डु वर्ण के हो गये थे ।८६। पार्वती को आहार में—शयन में—स्नान में कही भी धैर्य नहीं होता था। सहस्रों सखियां नित्य ही शीतल उपचारों से उसका सेचन किया करती थीं ।८७। बार-बार तापमान होती हुई वह फिर-फिर कर बेचैन हो जाती थी। कामाग्नि से जो अधिक थी वह उस रोग की शान्ति नहीं प्राप्त कर सकी थी ।८८। विरह से उप तापित होकर पार्वती को निद्रा भी नहीं आती थी। अपने शरीर के सन्तापन से उसने पिता के भी खेद को बढ़ा दिया था ।८९। जिसका कुछ भी प्रतिकार नहीं था ऐसा शिव के विषय में दुहिता के विरह को देखकर शैलराज को महान् दुःख प्राप्त हो गया था ।६०। पिता ने उसको प्रेरणा दी थी कि हे भद्रे ! तुम तप के द्वारा महेश्वर को प्रसन्न करो और उनको अपना भर्त्ता प्राप्त करो ।६१। हिमवान् पर्वत के शिखर पर एक गौरी

४३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शिखर नाम वाली चोटी है। उस पर पार्वती ने पति के लाभ प्राप्त करने के लिये बड़ा ही महान दुष्कर तप किया था। शीत में जल में निवास करती थी और ग्रीष्म में अग्नि के मध्य में रही थी। सूर्य में दृष्टि लगाकर उसने घोर तप किया।६२-६३।

तेनैव तपसा तुष्टः सान्निध्यं दत्तवाञ्छिवः ।
अङ्गीचकार तां भार्या वैवाहिकविधानतः ॥६४॥
अथाद्रिपतिना दत्तां तनयां नलिनेक्षणाम् ।
सप्तर्षिद्वारतः पूर्वं प्रार्थितामुदवोढ सः ॥६५॥
तया च रममाणोऽसौ बहुकालं महेश्वरः ।
ओषधीप्रस्थनगरे श्वशुरस्य गृहेऽवसत ॥६६॥
पुनः कैलासमागत्य समस्तैः प्रमथैः सह ।
पार्वतीमानिनायाद्रिनाथस्य प्रीतिमावहत् ॥६७॥
रममाणस्तया सार्धं कैलासे मन्दरे तथा ।
विन्ध्याद्रौ हेमशैले च मलये पारियात्रके ॥६८॥
नानाविधेषु स्थानेषु रतिं प्राप महेश्वरः ।
अथ तस्यां ससर्जाग्र्यं वीर्यं सा सोढुमक्षमा ॥६९॥
भुव्यत्यजत्सापि वह्नौ कृत्तिकासु स चाक्षिपत् ।
ताश्च गङ्गाजलेऽमुञ्चन्सा चैव शरकानने ॥१००॥

उसी तप से तुष्ट होकर शिव ने उसका सान्निध्य किया था। उस पार्वती को शिव ने वैवाहिक विधि से अपनी भार्या बनाना स्वीकार कर लिया था ।६४। इसके पश्चात् शिव ने सप्तर्षियों के द्वारा प्रार्थिता उस अद्रिपति के द्वारा प्रदान की हुई नलिनेक्षण पुत्री का उद्वाह कर लिया था ।६५। वह महेश्वर उसके साथ रमण बहुत समय पर्यन्त करते रहे थे और अपने श्वशुर के ही घर में औषधिप्रस्थ नगर में उन्होंने निवास किया था ।६६। फिर कैलास पर आ गये थे और प्रमथों के साथ पार्वती को वहाँ ले आये थे तथा शैलराज की प्रीति भी प्राप्त कर ली थी ।६७। कैलास में तथा मन्दर में उस पार्वती के साथ रमण करते रहे थे। तथा विन्ध्य में—हेमशैल में—मलयाचल में और पारियात्रिक में रमण किया था ।६८। अनेक स्थानों

मदन पुनर्मंन वर्णन ] [ ४३६

में महेश्वर ने रति प्राप्त की थी। इसके बाद उसमें अपना उग्रवीर्य छोड़ा था जिसके सहन करने में वह असमर्थ हो गयी थी ॥६६॥ इसने भी उस वीर्य को भूमि में—वह्नि में—कृतिकाओं में—क्षिप्त कर दिया था। उन्होंने गङ्गाजल में छोड़ दिया था और उसने शर कानन में छोड़ा था ॥१००॥

तत्रोद्भूतो महावीरो महासेनः षडाननः । गङ्गायाश्चांतिकं नीतो धूर्जटिवृद्धिमागमत् ॥१०१ स वर्धमानो दिवसे दिवसे तीव्रविक्रमः । शिक्षितो निजतातेन सर्वा विद्या अवाप्तवान् ॥१०२ अथ तातकृतानुज्ञः सुरसैन्यपतिर्भवन् । तारकं मारयामास समस्तैः सह दानवैः ॥१०३ ततस्तारकदैत्येन्द्रवधसन्तोषशालिना । शक्रेण दत्तां स गुहो देवसेनामुपानयत् ॥१०४ सा शक्रतनया देवसेना नाम यशस्विनी । आसाद्य रमणं स्कन्दमानन्दं भृशमादधौ ॥१०५ इत्थं संमोहिताशेषविश्वचक्रो मनोभवः । देवकार्यं सुसम्पाद्य जगाम श्रीपुरं पुनः ॥१०६ यत्र श्रीनगरे पुण्ये ललिता परमेश्वरी । वर्तते जगतामृद्ध्यै तत्र तां सेवितुं ययो ॥१०७

वहाँ पर महान् सेनानी महावीर षडानन समुत्पन्न हुए थे गङ्गा के समीप में पहुँचाया गया था और धूर्जटि वृद्धि को प्राप्त हुए थे ॥१०१॥ वह प्रतिदिन बढ़ने लगे थे और परम तीव्र विक्रम वाले हुए थे। अपने ही पिता के द्वारा उसको शिक्षा दी गयी थी और उसने समस्त विद्याएँ प्राप्त कर ली थीं ॥१०२॥ इसके पश्चात् पिता की आज्ञा प्राप्त करके देवों के सेनापति का पद ग्रहण कर लिया था। फिर उसने समस्त दानवों के साथ तारक को मार डाला था ॥१०३॥ फिर तारक दैत्य के वध से सन्तोष शाली इन्द्र ने देवों की सेना दी थी और गुह देव सेना को प्राप्त हो गये थे। फिर शुक्र की पुत्री देवसेना नाम वाली यशस्विनी ने स्कन्द को अपना स्वामी प्राप्त करने पर अधिक आनन्द प्राप्त किया था ॥१०४-१०५॥ इस रीति से कामदेव ने

४४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सम्पूर्ण विश्व को सम्मोहित कर दिया था। वह देवों के इस कार्य को पूर्ण करके फिर श्रीपुर में चला गया था ।१०६। जहाँ पर परम पुण्य श्री नगर में परमेश्वरी ललिता जगतों की समृद्धि के वर्तमान रहती है। उसी की सेवा करने के लिए वह चला गया था ।१०७।

।। मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ।।

अगस्त्य उवाच-
किमिदं श्रीपुरं नाम केन रूपेण वर्तते ।
केन वा निर्मितं पूर्वं तत्सर्वं मे निवेदय ।।१
कियत्प्रमाणं किं वर्णं कथयस्व मम प्रभो ।
त्वमेव सर्वसन्देहपङ्कशोषणभास्करः ।।

हयग्रीव उवाच-
यथा चक्ररथं प्राप्य पूर्वोक्तैर्लक्षणैर्युतम् ।
महायागानलोत्पन्ना ललिता परमेश्वरी ।।३
कृत्वा वैवाहिकीं लीलां ब्रह्माद्यैः प्रार्थिता पुनः ।
व्यजेष्ट भण्डनामानमसुरं लोककण्टकम् ।।४
तदा देवा महेन्द्राद्याः सन्तोषं बहु भेजिरे ।
अथ कामेश्वरस्यापि ललितायाश्च शोभनम् ।
नित्योपभोगसर्वार्थं मन्दिरं कर्तुं मुत्सुकाः ।।५
कुमारा ललितादेव्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
वर्धकिं विश्वकर्माणं सुराणां शिल्पकोविदम् ।।६
असुराणां शिल्पिनं च मयं मायाविचक्षणम् ।
आहूय कृतसत्कारानूचिरे ललिताज्ञया ।।७

अगस्त्यजी ने कहा—यह श्रीपुर नाम वाला क्या है और यह किस स्वरूप से होता है। पूर्व में इसका निर्माण किसने किया था—यह सब आप कृपया मुझको बतला दीजिए ।१। यह श्रीपुर कितना बड़ा है और इसका क्या वर्ण है—हे प्रभो ! यह सभी कुछ बतलाइए । आप ही एक ऐसे हैं जो

मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४१

सभी प्रकार से सन्देह के पंक को सुखा देने वाले हैं ।२। श्री हयग्रीवजी ने कहा—जिस प्रकार से पूर्व में कहे हुए लक्षणों से युक्त चक्ररथ को प्राप्त करके महाभागानला परमेश्वरी ललिता समुत्पन्न हुई थी ।३। फिर ब्रह्मा आदि के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर वैवाहिकी लीला करके उसने लोकों के लिए कण्टक भंडासुर पर विजय प्राप्त की थी ।४। वहाँ पर महेन्द्र आदि देवगण बहुत ही अधिक सन्तुष्ट हुए थे । इसके उपरान्त कामेश्वर का और ललिता का परम शोभन नित्य उपभोग के समस्त अर्थों वाला एक मन्दिर का निर्माण करने के लिए सब देवगण उत्सुक हुए थे ।५। ललिता देवी के कुमार ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर थे । इन्होंने वर्धकि विश्वकर्मा को जो कि शिल्प विद्या का पण्डित था ।६। और असुरों का शिल्पी मय को जो माया में बड़ा कुशल था बुलाया था। इनका सत्कार करके ललिता की आज्ञा से उनसे सबने कहा था ।७।

अधिकारिपुरुषा ऊचुः—

भो विश्वकर्मञ्छिल्पज्ञ भोभो मय महोदय ।
भवन्तो सर्वशास्त्रज्ञौ घटनामार्गकोविदो ॥८

संकल्पमात्रेण महाशिल्पकल्पविशारदौ ।
युवाभ्यां ललितादेव्या नित्यज्ञानमहोदधेः ॥९

षोडशीक्षेत्रमध्येषु तत्क्षेत्रसमसंख्यया ।
कर्तव्या श्रीनगर्र्यो हि नानारत्नैरलङ्कृताः ॥१०

यत्र षोडशधा भिन्ना ललिता परमेश्वरी ।
विश्वत्राणाय सततं निवासं रचयिष्यति ॥११

अस्माकं हि प्रियमिदं मरुतामपि च प्रियम् ।
सर्वलोकप्रियं चैतत्तन्नाम्नैव विरच्यताम् ॥१२

इति कारणदेवानां वचनं सुनिशम्य तौ ।
विश्वकर्ममयौ नत्वा व्यभाषेतां तथास्त्विति ॥१३

पुनर्नत्वा पृष्ठवन्तौ तौ तान्कारणपूरुषान् ।
केषु क्षेत्रेषु कर्तव्याः श्रीनगर्र्यो महोदयाः ॥१४

४४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अधिकारी पुरुषों ने कहा था—हे विश्वकर्मन् ! आप बहुत ही ऊँचे शिल्प कर्म के ज्ञाता हैं। हे महोदय मय ! आप दोनों ही घटना मार्ग के विद्वान् हैं और सभी शास्त्रों के भी ज्ञाता हैं ? ।८। आप लोग तो केवल संकल्प से ही महान् शिल्प कल्प के विशारद हैं। आप दोनों को ही नित्य ज्ञान की सागर ललितादेवी की श्री नगरियां बनानी चाहिए जो षोडशी क्षेत्र के मध्य में उसके क्षेत्र की समान संख्या से युक्त होंगी। वे श्री नगरी अनेक रत्नों से विभूषित भी बनानी चाहिए ।९-१०। जहाँ पर सोलह प्रकार से भिन्न परमेश्वरी ललिता इस विश्व की रक्षा के लिए अपना निवास बनायेगी ।११। यह हमारा भी प्रिय होवे और मरुतों का भी प्रिय हो और सर्वलोक का प्रिय होवे ऐसा यह नाम से ही विरचित करो ।१२। यह कारण देवों का वचन उन दोनों ने श्रवण करके दोनों विश्वकर्माओं ने ऐसा ही होगा—यह कहकर स्वीकार किया था ।१३। फिर उनने नमस्कार करके उन कारण देवताओं से पूछा था कि ये श्री नगरियाँ किन क्षेत्रों में बनानी चाहिए ।१४।

ब्रह्माद्याः परिपृष्टास्ते प्रोचुस्तौ शिल्पिनौ पुनः ।
क्षेत्राणां प्रविभागं तु कल्पयन्तौ यथोचितम् ॥१५

कारणपुरुषा ऊचुः-
प्रथमं मेरुपृष्ठे तु निषधे च महीधरे ।
हेमकूटे हिमगिरौ पञ्चमे गन्धमादने ॥१६
नीले मेषो च शृंगारे महेन्द्रे च महागिरौ ।
क्षेत्राणि हि नवैतानि भौमानि विदितान्यथ ॥१७
औदकानि तु सप्तैव प्रोक्तान्यखिलसिन्धुषु ।
लवणोऽब्धीक्षुसाराब्धिः सुराब्धिर्घृतसागरः ॥१८
दधिसिन्धुः क्षीरसिन्धुर्जंलसिन्धुश्च सप्तमः ।
पूर्वोक्ता नव शैलेन्द्राः पश्चात्सप्त च सिन्धवः ॥१९
आहृत्य षोडश क्षेत्राण्यंवाश्रीपुरक्लृप्तये ।
येषु दिव्यानि वेश्मानि ललिताया महौजसः ।
सृजतं दिव्यघटनापण्डितौ शिल्पिनौ युवाम् ॥२०

मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४३

येषु क्षेत्रेषु कॢप्तानि घ्नन्त्या देव्या महासुरान् । नामानि नित्यानाम्नैव प्रथितानि न संशयः ॥२१॥

ब्रह्मादिक से परिपृष्ट हुए उन दोनों शिल्पियों ने कहा था कि क्षेत्रों का प्रविभाग यथोचित कल्पित कीजिए ।१५। कारण पुरुषों ने कहा—प्रथम तो मेरु के पृष्ठ पर और निषध महीधर पर—हेम गिरि पर—हिम कूट पर और पांचवे गन्ध मादन पर—नील—मेष—श्रृंगार और महागिरि महेन्द्र पर ये नौ क्षेत्र भौम विदित हैं ।१६-१७। जलीय सात ही स्थान हैं जो समस्त सिन्धुओं में बताये गये हैं। लवण सागर—इक्षुसार सागर—सुरा सागर—घृत सागर ।१८। दधि सागर-क्षीर सिन्धु है। पूर्व में कहे हुए नौ शैलेन्द्र और पीछे बताये गये सात सिन्धु हैं ।१६। इन सोलह क्षेत्रों का आहरण करके श्री के पुरों की कॢप्ति के लिए हैं। महान ओज वाली ललिता देवी के जिनमें दिव्य गृह होंगे। आप दोनों ही शिल्पी हैं और दिव्य घटना के महान् पण्डित हैं अतः ऐसा ही निर्माण कीजिए ।२०। जिन क्षेत्रों में असुरों का हनन करने वाली देवी के नाम कॢप्त हैं वे सब नित्य नाम से ही प्रथित हैं—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ।२१।

सा हि नित्यास्वरूपेण कालव्याप्तिकरी परा । सर्वं कलयन्ते देवी कलनांकतया जगत् ॥२२ नित्यानां च महाराज्ञी नित्या यत्र न तद्विदा । अतस्तदीयनाम्ना तु सनामा प्रथिता पुरा ॥२३ कामेश्वरीपुरी चैव भगमालापुरी तथा । नित्यक्लिन्नापुरीत्यादिनामानि प्रथितान्यलम् ॥२४ अतो नामानि वर्णन योग्ये पुण्यतमे दिने । महाशिल्पप्रकारेण पुरीं रचयतां शुभाम् ॥२५ इति कारणकृत्यैर्द्रैर्ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः । प्रोक्तौ तौ श्रीपुरीस्थेषु तेषु क्षेत्रेषु चक्रतुः ॥२६ अथ श्रीपुरविस्तारं पुराधिष्ठातृदेवताः । कथयाम्यहमाधार्य लोपामुद्रापते श्रृणु ॥२७

४४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

यो मेरुरखिलाधारस्तु'गश्चानंतयोजनः ।
चतुर्दशजगच्चक्रसंप्रोतनिजविग्रहः ॥२८॥

वह देवी परा नित्या के स्वरूप से काल की व्याप्ति करने वाली है । कलनान्तकता से देवी सम्पूर्ण जगत् का कलन करती है ।२२। महाराज्ञी नित्या नाम वाली है जिसमें तद्भिदा भी नित्या नाम ही है । अतएव उसके ही नाम से वह पुरी पहिले सनामा प्रथिता हुई है ।२३। कामेश्वरी पुरी तथा भगमाला पुरी तथा नित्य क्लिन्नापुरी—इत्यादि नाम ही प्रथिता है। वही पर्याप्त है ।२४। इसीलिए नाम वर्ण से योग्य पुण्य दिन में महान शिल्प के प्रकार से उस शुभा पुरी की रचना की थी ।२५। इसलिए कारण कृत्येन्द्र ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वरों के द्वारा उन क्षेत्रों में श्री पुरीस्थों में कहे गये थे ।२६। हे लोपामुद्रापते ! आप श्रवण कीजिए—मैं अब उस श्री पुर का विस्तार और पुर के अधिष्ठातृ देवताओं को बतलाता हूँ ।२७। जो मेरु का अखिला-धार है और अनन्तयोजन ऊँचा है चौदह भुवनों के चक्र में संप्रोत विग्रह वाला है ।२८।

तस्य चत्वारि शृंगाणि शक्रनैर्ऋतवायुषु ।
मध्यस्थलेषु जातानि प्रोच्छायास्तेषु कथ्यते ॥२६
पूर्वोक्तशृंगत्रितयं शतयोजनमुन्नतम् ।
शतयोजनविस्तारं तेषु लोकास्त्रयो मताः ॥३०
ब्रह्मलोको विष्णुलोकः शिवलोकस्तथैव च ।
एतेषां गृहविन्यासान्वक्ष्याम्यवसरांतरे ॥३१
मध्ये स्थितस्य शृंगस्य विस्तारं चोच्छ्रयं शृणु ।
चतुःशतं योजनानामुच्छ्रितं विस्तृतं तथा ॥३२
तत्रैव शृंगे महति शिल्पिभ्यां श्रीपुरं कृतम् ।
चतुःशतं योजनानां विस्तृतं कुम्भसंभव ॥३३
तत्रायं प्रविभागस्ते प्रविविच्य प्रदर्श्यते ।
प्राकारः प्रथमः प्रोक्तः कालायसविर्निमितः ॥३४
षड्दशाधिकसाहस्रयोजनायतवेष्टनः ।
चतुर्दिक्षु द्वार्थंतश्च चतुर्योजनमुच्छ्रितः ॥३५

मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४५

उसके चार शिखर शक्र—नैर्ऋत्य—वायु—मध्यस्थलों में हुए हैं। जो ऊँचाई है वह बतलायी जाती है ।२६। पूर्व में कहे हुए तीन श्रृंग शत योजन उन्नत हैं ओर उनका सौ योजन ही विस्तार है। उनमें तीनों लोक माने गये हैं ।३०। ब्रह्मलोक-विष्णु लोक और शिव लोक हैं इनके महान विन्यासों का वर्णन अन्य अवसर में बताऊँगा ।३१। मध्य में स्थित श्रृंग का विस्तार ओर ऊँचाई श्रवण कीजिए। चार सौ योजन उच्चता और विस्तार है ।३२। वहाँ पर ही महान शिखर पर शिल्पियों ने श्रीपुर बनाया था। हे कुम्भ सम्भव ! वह चार सौ योजन विस्तार और ऊँचाई वाला है ।३३। वहाँ पर यह प्रविभाग है जो आपको विवेचना करके दिखाया जाता है। उसका जो प्रथम प्राकार है कालायस से बनाया गया है ।३४। सोलह सहस्र योजन आयत वेष्टन है। चारों दिशाओं में वह द्वारों से युक्त है और चार योजन ऊँचा है ।३५।

शालमूलपरीणाहो योजनायुतमब्धिप ।
शालाग्रस्य तु गव्यूतेर्नद्धवातायनं पृथक् ॥३६
शालद्वारस्य चोन्नत्यमेकयोजनमाश्रितम् ।
द्वारे द्वारे कपाटे द्वे गव्यूत्यर्धप्रविस्तरे ॥३७
एकयोजनमुन्नद्धे कालायसवनिर्मिते ।
उभयोर्गला चेत्थमर्धक्रोशसमायता ॥३८
एवं चतुर्षु द्वारेषु सदृशं परिकीर्तितम् ।
गोपुरस्य तु संस्थाने कथये कुम्भसंभव ॥३९
पूर्वोक्तस्य तु शालस्य मूले योजनसंमिते ।
पार्श्वद्वये योजने द्वे द्वे समादाय निर्मिते ॥४०
विस्तारमपि तावंतं संप्राप्तं द्वारगर्भितम् ।
पार्श्वद्वयं योजने द्वे मध्ये शालस्य योजनम् ॥४१
मेलयित्वा पञ्च मुने योजनानि प्रमाणतः ।
पार्श्वद्वयेन सार्धेन क्रोशयुग्मेन संयुतम् ॥४२

हे अब्धिप ! शाल वृक्ष के मूल के समान परिणाम वाला है और योजनायुत है। शालाग्र के गव्यूति का नद्धायत पृथक् है ।३६। शाल द्वार

४४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

की ऊँचाई एक योजन आश्रित है। आधी गव्यूति के विस्तार वाले प्रति द्वार में दो किवाड़ हैं। ३७। वे एक योजन उन्नद्ध हैं तथा कृष्ण लौह के द्वारा बने हुए हैं। उन दोनों में एक अर्गला है जो आधे कोश के बराबर आयत है। ३८। इस प्रकार से चारों द्वारों में समान ही कीर्तित है। हे कुम्भसम्भव ! गोपुर का संस्थान मैं कहता हूँ । ३६। पूर्व में कहे हुए शाल के मूल में जो योजन समित है। दोनों पार्श्वों में दो-दो योजन लाकर निर्मित किये गये हैं । ४०। विस्तार भी द्वारों से युक्त उतना ही सम्प्राप्त है। दोनों पार्श्व मध्य में दो योजन हैं जो शाल का योजन है ।४१। हे मुने ! प्रमाण से पाँच योजन मिलाकर दोनों पार्श्व ढाई कोश से संयुत हैं ।४२।

मेलयित्वा पञ्चसंख्यायोजनान्यायतस्तथा । एवं प्राकारतस्तत्र गोपुरं रचितं मुने ॥४३ तस्माद्गोपुरमूलस्य वेष्टो विंशतियोजनः । उपर्युपरि वेष्टस्य ह्रास एव प्रकीर्त्यते ॥४४ गोपुरस्योन्नतिः प्रोक्ता पञ्चविंशतियोजना । योजने योजने द्वारं सकपाटं मनोहरम् ॥४५ भूमिकाश्चापि तावन्त्यो यथोर्ध्वं ह्राससंयुताः । गोपुराग्रस्य विस्तारो योजनं हि समाश्रितः ॥४६ आयामोऽपि च तावान्वै तत्र त्रिमुकुटं स्मृतम् । मुकुटस्य तु विस्तारः क्रोशमानो घटोद्भव ॥४७ क्रोशद्वयं समुन्नद्धं ह्रासं गोपुरवन्मुने । मुकुटस्यांतरे क्षोणी क्रोशार्धेन च संमिता ॥४८ मुकुटं पश्चिमे प्राच्यां दक्षिणे द्वारगोपुरे । दक्षोत्तरस्तु मुकुटाः पश्चिमद्वारगोपुरे ॥४९

मिलाकर पाँच योजन आयत है। इस प्रकार से वहाँ पर हे मुने ! गोपुर की रचना की गई ।४३। इस कारण से गोपुर के मूल का वेष्ट बीस योजनों वाला है। उस वेष्ट के ऊपर-ऊपर में ह्रास बताया जाता है ।४४। उस गोपुर की ऊँचाई पच्चीस योजन की है ऐसा कहा गया है। एक-एक

मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४७

योजन पर द्वार हैं जिनमें बहुत सुन्दर किवाड़ लगे हुए हैं ।४५। और भूमि- कायें भी उतनी ही हैं जैसी ऊर्ध्व में ह्रास में संयुत हैं । गोपुर के आगे का विस्तार एक योजन समाश्रित है ।४६। उसका आयाम भी वहाँ पर उतना ही है त्रिमुकुट कहा गया है। हे घटोद्भव ! मुकुट का विस्तार एक कोश के मान वाला है ।४७। हे मुने ! गोपुर के ही तुल्य दो कोश समुन्नद्ध ह्रास है । मुकुट के अन्दर की भूमि आधे के बराबर है ।४८। मुकुट पश्चिम— पूर्वं—दक्षिण में द्वार गोपुर में है । दक्षोत्तर मुकुट पश्चिम द्वार गोपुर में है ।४६।

दक्षिणद्वारवत्प्रोक्ता उत्तरद्वाः किरीटिकाः ।
पश्चिमद्वारवत्पूर्वद्वारे मुकुटकल्पना ॥५०
कालायसाख्यशालस्यांतरे मारुतयोजने ।
अंतरे कांस्यशालस्य पूर्ववद्गोपुरोऽन्वितः ॥५१
शालमूलप्रमाणं च पूर्ववत्परिकीर्तितम् ।
कांस्यशालोऽपि पूर्वादिदिक्षु द्वारसमन्वितः ॥५२
द्वारेद्वारे गोपुराणि पूर्वलक्षणभांजि च ।
कालायसस्य कांस्यस्य योंऽतर्देशः समंततः ॥५३
नानावृक्षमहोद्यानं तत्प्रोक्तं कुम्भसंभव ।
उद्भिज्जाद्यं यावदस्ति तत्सर्वं तत्र वर्तते ॥५४
परसहस्त्रास्तरवः सदापुष्पाः सदाफलाः ।
सदापल्लवशोभाढ्याः सदा सौरभसंकुलाः ॥५५
चूताः कंकोलका लोध्रा बकुलाः कर्णिकारकाः ।
शिंशपाश्च शिरीषाश्च देवदारुनमेरवः ॥५६

दक्षिण द्वार के समान उत्तर द्वार किरीटिका कही गयी है । पश्चिम द्वार के तुल्य पूर्व द्वार में मुकुट की योजना है ।५०। कालायस शाल के अन्तर में मारुत योजन में कांस्यशाल के अन्तर में पूर्व की भाँति गोपुर अन्वित है ।५१। शाल के मूल का प्रमाण तो पूर्व के ही समान कीर्तित किया गया है। कांस्य शाल भी पूर्व आदि दिशाओं के द्वार से समन्वित है ।५२। प्रतिद्वार में पूर्व लक्षण वाले गोपुर हैं । कालायस और कांस्य का जो अन्त-

४४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देश है वह माना गया है जो चारों ओर है ।५३। हे कुम्भ सम्भव ! वह नाना वृक्षों का महान् उद्यान कहा गया है । उद्भिज्ज आदि जितने भी हैं वे सभी वहाँ पर विद्यमान हैं ।५४। सहस्रों से भी अधिक तरुगण जो सदा ही पुष्प और फल देने वाले हैं । वे सर्वदा पत्रों से शोभित हैं और सदा ही सौरभ से संकुल हैं ।५५। आम्र—ककोल—लोह्य—वकुल—कर्णिकार— शिंशप—शिरीष—देवदारु—नमेरु वृक्ष हैं ।५६।

पुन्नागा नागभद्राश्च मुचुकुन्दाश्च कट्फलाः । एलालवंगास्तवकोलास्तथा कर्पूरशाखिनः ॥५७ पीलवः काकतुण्ड्यश्च जालकाश्चासनास्तथा । कांचनाराश्च लकुचाः पनसा हिंगुलास्तथा ॥५८ पाटलाश्च फलिन्यश्च जटिल्यो जघनेफलाः । गणिकाश्च कुरण्डाश्च बन्धुजीवाश्च दाडिमाः ॥५६ अश्वकर्णा हस्तिकर्णाश्चांपेयाः कनकद्रुमाः । यूथिकास्तालपर्ण्यश्च तुलस्यश्च सदाफलाः ॥६० तालास्तमालहिंतालखर्जूराः शरबर्बुराः । इक्षवः क्षीरिणश्चैव श्लेष्मांतकविभीतकाः ॥६१ हरीतक्यस्त्ववाक्पुष्प्यो घोण्टाल्यः स्वर्गपुष्पिकाः । भल्लातकाश्च खदिराः शाखोटाश्चन्दनद्रुमाः ॥६२ कालागुरुद्रुमाः कालस्कन्धाश्चिञ्चा वटास्तथा । उदुम्बराजुँनाश्वत्थाः शमीवृक्षा ध्रुवाद्रुमाः ॥६३

पुन्नाग—नागभद्र—मुचुकुन्द—कट्फल—एलालवंग—तबकोल— कर्पूरशाली हैं ।५७। पीलु—काकतुण्डी—शाल—आसनकांनार—लकुच— पनस—हिंगुल हैं ।५८। पाटल—फलिनी जटिली—जघनेफल—गणिका कुरण्ड—बन्धुजीव—दाड़िम—अश्वकर्ण—हस्तिकर्ण—चाम्पेय—कनकद्रुम— यूथिका—तालपर्णी—तुलसी और सदा फल के वृक्ष हैं ।५६-६०। ताल— तमाल—हिन्ताल—खजूर—शरबर्बुर—इक्षु—क्षीरी—श्लेष्मातक—विभी- तक के वृक्ष हैं ।६१। हरीतकी—अवाक्पुष्पी—घोण्टाली—स्वर्ग पुष्पिका— भल्लातक—खदिर—शाखोट—चन्दन द्रुम हैं ।६२। कालागुरु द्रुम—काल-

मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४६

स्कन्ध--चिंचा--वट--उदुम्बर--अर्जुन--अश्वत्थ--शमी वृक्ष--ध्रुवाद्रुम हैं ।६३।

रुचकाः कुटजाः सप्तपर्णाश्च कृतमालकाः । कपित्थास्तिन्तिणी चैवेत्येवमाद्याः सहस्रशः ॥६४॥ नानाऋतुसमाविष्टा देव्याः शृंगारहेतवः । नानावृक्षमहोत्सेधा वर्तंते वरशाखिनः ॥६५॥ कांस्यशालस्यांतराले सप्तयोजनदूरतः । चतुरस्रस्ताम्रशालः सिंधुयोजनमुन्नतः ॥६६॥ अनयोरंतरक्षोणी प्रोक्ता कल्पकवाटिका । कर्पूरगन्धिभिश्चारुरत्नबीजसमन्वितैः ॥६७॥ कांचनत्वक्सुरुचिरैः फलैस्तैः फलिता द्रुमाः । पीतांबराणि दिव्यानि प्रवालान्येव शाखिषु ॥६८॥ अमृतं स्यान्मधुरसः पुष्पाणि च विभूषणम् । ईदृशा बहवस्तत्र कल्पवृक्षाः प्रकीर्तिताः ॥६९॥ एषा कक्षा द्वितीया स्यान्कल्पवापीति नामतः । ताम्रशालस्यांतराले नागशालः प्रकीर्तितः ॥७०॥

रुचक-कुटज-सप्तपर्ण-कृतमालक-कपित्थ-तिन्तिणी-इत्यादि सहस्रों प्रकार के वृक्ष हैं ।६४। ये सभी वृक्ष अनेक जीव-जन्तुओं से समन्वित हैं जो श्रीदेवी के शृंगार के कारण हैं । नाना भाँति के वृक्षों के महान् उत्सेध से युक्त हैं ऐसे श्रेष्ठशाखी हैं ।६५। कांस्यशाल के अन्तराल में सात-योजन दूर चौकोर ताम्र शाल है जो सिन्धु योजन अनुकूल है अर्थात् सात योजन तक पीछे लगा हुआ है ।६६। इन दोनों की भीतर की पृथ्वी है जो कल्पक वाटों वाली कही गयी है वे द्रुम ऐसे हैं जो ऐसे हैं जो ऐसे फलों वाले हैं जिनमें कपूर की गन्ध है और सुन्दर रत्नों के बीजों से संयुत हैं । उनकी छाल सुनहली है और परम सुन्दर हैं । इन वृक्षों में पीताम्बर दिव्य प्रवाल हैं ।६७-६८। अमृत इनका मधुरस है और पुष्प ही विभूषण हैं । इस प्रकार के वहाँ पर बहुत से कल्प वृक्ष कीर्तित किये गये हैं ।६९। यह दूसरी कक्षा है । जिसका नाम कल्पवापी है । फिर उस ताम्रशाल के अन्तराल में नाग शाल कहा गया है ।७०।

४५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अनयोरुभयोस्तिर्यग्देशः स्यात्सप्तयोजनः ।
तत्र संतानवाटी स्यात्कल्पवापीसमाकृतिः ॥७१
तयोर्मध्ये मही प्रोक्ता हरिचन्दनवाटिका ।
कल्पवाटीसमाकारा फलपुष्पसमाकुला ॥७२
एषु सर्वेषु शालेषु पूर्ववद्द्वारकल्पनम् ।
पूर्ववद्गोपुराणां च मुकुटानां च कल्पनम् ॥७३
गोपुरद्वारक्लृप्तं च द्वारे द्वारे च संमितिः ।
आरकूटस्यांतराले सप्तयोजनदूरतः ॥७४
पञ्चलोहमयः शालः पूर्वशालसमाकृतिः ।
तयोर्मध्ये मही प्रोक्ता मन्दारद्रुमवाटिका ॥७५
पञ्चलोहस्यांतराले सप्तयोजनदूरतः ।
रौप्यशालस्तु संप्रोक्तः पूर्वोक्तैर्लक्षणैर्युतः ॥७६
तयोर्मध्ये मही प्रोक्ता पारिजातद्रुवाटिका ।
दिव्यामोदसुसंपूर्णा फलपुष्पभरोज्ज्वला ॥७७

इन दोनों का एक तिर्यग् देश है जो सात योजन वाला है । वहाँ पर एक सन्तानवाटी है जो कल्प वापी के ही सदृश आकृति वाली होती है ।७१। उन दोनों के मध्य में मही बतायी गयी है । जिसका नाम हरि चन्दन वाटिका है । यह भी कल्पवाटी के तुल्य ही आकार वाली है और फलों तथा पुष्पों से घिरी हुई है ।७२। इन समस्त शालों में पूर्व की ही भाँति द्वारों की कल्पना है और पहिली भाँति ही गोपुरों का और मुकुटों का भी कल्पन है ।७३। प्रत्येक द्वार में गोपुर द्वार के ही समान संमिति है आरकूट के अन्तराल में सात योजनों की दूरी वाला एक प्राकार और है ।७४। पञ्च लौह से पूर्ण-शाल है जो पूर्व शाल के समान आकार वाला है । उन दोनों के मध्य में जो मही है वह मन्दार द्रुमों की वाटिका वाली है ।७५। पाँचों लौहों के अन्तराल में सात योजनों की दूरी वाला चाँदी का शाल है जो पूर्व के ही सदृश लक्षणों तथा आकृति वाला है ऐसा बताया गया है । सुवर्ण का शाल पूर्व के ही समान द्वारों से सुशोभित बताया गया है ।७६। उन दोनों के मध्य में जो मही है वह पारिजात के द्रुमों की ही वाटिका है । वह परम दिव्य गन्ध वाली तथा फल पुष्पों से समन्वित है ।७७।