भारतकोश
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary

आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished737 पृष्ठ

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पृष्ठ 484

( ६८ ) ग्रहणं ग्रहयोगं^२ वा विस्मयकरणाय^४ दर्शयेद् गणकः^३ । लोकस्य नरपतेर्वा दुष्करमन्यैर्गणितविद्भिः ॥ १७ ॥ इति बाहुकर्णकोटि^३स्फुटसितपरिले^४खसूत्रकरणेषु । आर्याष्टादश चन्द्रशृङ्गोन्नतिरिह सप्तमो ऽध्यायः^५ ॥ १८ ॥ इति श्रीब्रह्मगुप्ते^६ सप्तमोऽध्यायः

(ग) लब्ध्वेवं वानतयोः पूर्वापरयो खेस...चक्रात् ।
अग्रक्किकैन्द्रोः शुक्लं पश्चाच्छुक्ले सिते पूर्वात् ॥ १७ ॥
यह श्लोक ‘ग’ में अतिरिक्त पाया गया है।
१७. (घ) २. ग्रहयो योगं for (ग्रहयोगं)
३. गणितविद्भिः (ग) गणितषड्भिः for (गणितविद्भिः)
(ग) इसकी क्रमसंख्या १६ है।
४. विस्मय for (विस्मय)
(क) १. नरपतेर्दुष्कर for (नरपतेर्वा दुष्कर)
१८. (ग) वि०—इसकी क्रमसंख्या २० है।
३. इतिपादकोटिकर्णाः for (इतिबाहुकर्णकोटि)
४. परिलेष for (परिलेख)
२. विंशतिरार्या शृङ्गोन्नतिरिंदोः सप्तमोध्यायः for (आर्याष्टादशचन्द्रशृङ्गोन्न-
तिरिह सप्तमोऽध्यायः)
(च) ५. अवग्रहचिह्न लुप्त
६. "इति" से "अध्यायः" तक लुप्त है।
(क) १. कोटिकर्ण for (कोटि) २. आर्याष्टादशभिः for (आर्याष्टादश)