ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—जहाँ पहले तेज, जल और पृथिवीकी उत्पत्ति बताते हुए जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ स्पष्ट कहा है कि 'वाणी तेजोमयी है अर्थात् वाक्-इन्द्रिय तेजसे उत्पन्न हुई है; इसलिये तेजसे ओतप्रोत है।' इससे तो पाँचों भूतोंसे ही इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका होना सिद्ध होता है, जैसा कि दूसरे मतवाले मानते हैं। इस परिस्थितिमें दोनों श्रुतियोंकी एकता कैसे होगी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— गौण्यसम्भवात् ॥ २ । ४ । २ ॥ असम्भवात् = सम्भव न होनेके कारण, वह श्रुति; गौणी = गौणी है अर्थात्, उसका कथन गौणरूपसे है । व्याख्या—उस श्रुतिमे कहा गया है कि 'भक्षण किये हुए तेजका जो सूक्ष्म अंश है, वह एकत्र होकर वाणी बनता है।' (छा० उ० ६ । ६ । ४) इससे यह सिद्ध होता है कि तैजस पदार्थका सूक्ष्म अंश वाणीको बलवान् बनाता है; क्योकि श्रुतिने खाये हुए तैजस पदार्थोंके सूक्ष्मांशका ही ऐसा परिणाम बताया है, इसलिये जिसके द्वारा यह खाया जाय, उस इन्द्रियका उस तैजस तत्त्वसे पहले ही उत्पन्न होना सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार वहाँ खाये हुए अन्नसे मनकी और पीये हुए जलसे प्राणोकी उत्पत्ति बतायी गयी है। परन्तु प्राणोके बिना जलका पीना ही सिद्ध नहीं होगा। फिर उससे प्राणोकी उत्पत्ति कैसे सिद्ध होगी ? अतः जैसे प्राणोका उपकारी होनेसे जलको गौणरूपसे प्राणोकी उत्पत्तिका हेतु कहा गया है, वैसे ही वाक्-इन्द्रियका उपकारी होनेसे तैजस पदार्थोंको वाक्-इन्द्रियकी उत्पत्तिका हेतु गौणरूपसे ही कहा गया है। इसलिये वह श्रुति गौणी है, अर्थात् उसके द्वारा तेज आदि तत्त्वोंसे वाक् आदि इन्द्रियकी उत्पत्तिका कथन गौण है; यही मानना ठीक है और ऐसा मान लेनेपर श्रुतियोंके वर्णनमें कोई विरोध नहीं रह जाता है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उस श्रुतिका गौणत्व सिद्ध करते हैं.— तत्प्राक्श्रुतेश्च ॥ २ । ४ । ३ ॥ तत्प्राक्श्रुतेः = श्रुतिके द्वारा उन आकाशादि तत्त्वोके पहले इन्द्रियोंकी उत्पत्ति कही गयी है, इसलिये; च = भी (तेज आदिसे वाक् आदि इन्द्रियकी उत्पत्ति कहनेवाली श्रुति गौण है) ।