ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—जहाँ पहले तेज, जल और पृथिवीकी उत्पत्ति बताते हुए जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ स्पष्ट कहा है कि 'वाणी तेजोमयी है अर्थात् वाक्-इन्द्रिय तेजसे उत्पन्न हुई है; इसलिये तेजसे ओतप्रोत है।' इससे तो पाँचों भूतोंसे ही इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका होना सिद्ध होता है, जैसा कि दूसरे मतवाले मानते हैं। इस परिस्थितिमें दोनों श्रुतियोंकी एकता कैसे होगी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— गौण्यसम्भवात् ॥ २ । ४ । २ ॥ असम्भवात् = सम्भव न होनेके कारण, वह श्रुति; गौणी = गौणी है अर्थात्, उसका कथन गौणरूपसे है । व्याख्या—उस श्रुतिमे कहा गया है कि 'भक्षण किये हुए तेजका जो सूक्ष्म अंश है, वह एकत्र होकर वाणी बनता है।' (छा० उ० ६ । ६ । ४) इससे यह सिद्ध होता है कि तैजस पदार्थका सूक्ष्म अंश वाणीको बलवान् बनाता है; क्योकि श्रुतिने खाये हुए तैजस पदार्थोंके सूक्ष्मांशका ही ऐसा परिणाम बताया है, इसलिये जिसके द्वारा यह खाया जाय, उस इन्द्रियका उस तैजस तत्त्वसे पहले ही उत्पन्न होना सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार वहाँ खाये हुए अन्नसे मनकी और पीये हुए जलसे प्राणोकी उत्पत्ति बतायी गयी है। परन्तु प्राणोके बिना जलका पीना ही सिद्ध नहीं होगा। फिर उससे प्राणोकी उत्पत्ति कैसे सिद्ध होगी ? अतः जैसे प्राणोका उपकारी होनेसे जलको गौणरूपसे प्राणोकी उत्पत्तिका हेतु कहा गया है, वैसे ही वाक्-इन्द्रियका उपकारी होनेसे तैजस पदार्थोंको वाक्-इन्द्रियकी उत्पत्तिका हेतु गौणरूपसे ही कहा गया है। इसलिये वह श्रुति गौणी है, अर्थात् उसके द्वारा तेज आदि तत्त्वोंसे वाक् आदि इन्द्रियकी उत्पत्तिका कथन गौण है; यही मानना ठीक है और ऐसा मान लेनेपर श्रुतियोंके वर्णनमें कोई विरोध नहीं रह जाता है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उस श्रुतिका गौणत्व सिद्ध करते हैं.— तत्प्राक्श्रुतेश्च ॥ २ । ४ । ३ ॥ तत्प्राक्श्रुतेः = श्रुतिके द्वारा उन आकाशादि तत्त्वोके पहले इन्द्रियोंकी उत्पत्ति कही गयी है, इसलिये; च = भी (तेज आदिसे वाक् आदि इन्द्रियकी उत्पत्ति कहनेवाली श्रुति गौण है) ।
सूत्र २-५ ] अध्याय २ १९९
सूत्र २-५ ] अध्याय २ १९९ व्याख्या-शतपथ-ब्राह्मणमे ऋषियोके नामसे इन्द्रियोका पाँच तत्त्वोंकी उत्पत्तिसे पहले होना कहा गया है ( ६ । १ । १ । १ ) तथा मुण्डकोपनिषद्में भी इन्द्रियोकी उत्पत्ति पाँच भूतोसे पहले बतायी गयी है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि आकाशादि तत्त्वोसे इन्द्रियोकी उत्पत्ति नहीं हुई है, अतः तेज आदि तत्त्वोसे वाक् आदिकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली वह श्रुति गौण है । सम्बन्ध-अब दूसरी युक्ति देकर उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं— तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥ २ । ४ । ४ ॥ वाचः = वाणीकी उत्पत्तिका वर्णन; तत्पूर्वकत्वात् = तीनों तत्त्वोंमे उस ब्रह्मके प्रविष्ट होनेके बाद है (इसलिये तेजसे उसकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली श्रुति गौण है) । व्याख्या—उस प्रकरणमे यह कहा गया है कि 'उन तीन तत्त्वरूप देवताओमें जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर उस ब्रह्मने नामरूपात्मक जगत्की रचना की।' (छ० उ० ६ । ३ । ३ ) इस प्रकार वहाँ जगत्की उत्पत्ति ब्रह्मके प्रवेशपूर्वक बतायी गयी है; इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि समस्त इन्द्रियोकी उत्पत्ति ब्रह्मसे ही हुई है, तेज आदि तत्त्वोने नहीं । अतः तेज-तत्त्वसे वाणीकी उत्पत्ति सूचित करनेवाले श्रुतिका कथन गौण है । सम्बन्ध—इस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है और वह पाँच तत्त्वोंसे पहले ही हो जाती है; यह सिद्ध किया गया । अब जो श्रुतियोंमें कहीं तो प्राणोंके नामसे सात इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है ( मु० उ० २ । १ । ८ ) तथा कहीं मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन है ( बृह० उ० ३ । ९ । ४ ) इनमेंसे कौन-सा वर्णन ठीक है, इसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हुए प्रकरण आरम्भ करते हैं— सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च ॥ २ । ४ । ५ ॥ सप्त = इन्द्रियाँ सात हैं; गतेः = क्योकि सात ही ज्ञात होती हैं; च = तथा; विशेषितत्वात् = 'सप्त प्राणाः' कहकर श्रुतिने 'सप्त' पदका प्राणो ( इन्द्रियो ) के विशेषणरूपसे प्रयोग किया है । व्याख्या—पूर्वपक्षीका कथन है कि मुख्यतः सात इन्द्रियाँ ही ज्ञात होती है और श्रुतिने 'जिनमें सात प्राण अर्थात् आँख, कान, नाक, रसना, त्वचा, वाक् और मन—ये सात इन्द्रियाँ विचरती हैं, वे लोक सात हैं।' (मु० उ० २ । १ । ८) ।
२०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ऐसा कहकर इन्द्रियोका 'सात' यह विशेषण दिया है। इससे यही सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ सात ही हैं। सम्बन्ध—अब सिद्धान्तीकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम् ॥ २ । ४ । ६ ॥ तु=किन्तु; हस्तादयः=हाथ आदि अन्य इन्द्रियाँ भी हैं; अतः=इसलिये; स्थिते=इस स्थितिमे; एवम्=ऐसा; न=नही (कहना चाहिये कि इन्द्रियाँ सात ही हैं)। व्याख्या—हाथ आदि ( हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा ) अन्य चार इन्द्रियों- का वर्णन भी पूर्वोक्त सात इन्द्रियोके साथ-साथ दूसरी श्रुतियोमें स्पष्ट आता है ( प्र० उ० ४ । ८ ) तथा प्रत्येक मनुष्यके कार्यमे करणरूपसे हस्त आदि चारो इन्द्रियोका प्रयोग प्रत्यक्ष उपलब्ध है; इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि इन्द्रियाँ सात ही हैं। अतः जहाँ किसी अन्य उद्देश्यसे केवल सातोंका वर्णन हो, वहाँ भी इन चारोंको अधिक समझ लेना चाहिये। गीतामे भी मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ बतायी गयी हैं ( गीता १३ । ५ ) तथा बृहदारण्यक-श्रुतिमे भी दस इन्द्रिय और एक मन—इन ग्यारहका वर्णन स्पष्ट शब्दोमे किया गया है ( ३ । ९ । ४ ) । अतः इन्द्रियाँ सात नहीं ग्यारह हैं, यह मानना चाहिये। सम्बन्ध—इस प्रकार प्रसङ्गवश प्राप्त हुई शङ्काका निराकरण करते हुए मन- सहित इन्द्रियोंकी संख्या ग्यारह सिद्ध करके पुनः तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं— अणवश्च ॥ २ । ४ । ७ ॥ च=तथा; अणवः=सूक्ष्मभूत यानी तन्मात्राएँ भी उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं। व्याख्या—जिस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्ति परमेश्वरसे होती है, उसी प्रकार पाँच महाभूतोंका जो सूक्ष्मरूप है, जिसको दूसरे दर्शनकारोंने परमाणु- के नामसे कहा है तथा उपनिषदोंमें मात्राके नामसे जिनका वर्णन है ( प्र० उ० ४ । ८ ) वे भी परमेश्वरसे ही उत्पन्न होते हैं; क्योंकि वहाँ उनकी स्थिति उस परमेश्वरके आश्रित ही बतायी गयी है। कुछ महानुभावोका कहना है कि यह सूत्र इन्द्रियोंका अणु-परिमाण सिद्ध करनेके लिये कहा गया है, किन्तु प्रसङ्गसे यह ठीक मालूम नहीं होता। त्वक्-इन्द्रियको अणु नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह शरीरके किसी एक देशमे सूक्ष्मरूपसे स्थित न होकर समस्त
सूत्र ६—१० ] अध्याय २ २०१
सूत्र ६—१० ] अध्याय २ २०१ शरीरको आच्छादित किये हुए रहती है, इस बातका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है। अतः विद्वान् पुरुषोको इसपर विचार करना चाहिये । इन्द्रियोको अणु बतानेवाले व्याख्याकारोने इस विषयमे श्रुतियों तथा स्मृतियोंका कोई प्रमाण भी उद्धृत नहीं किया है। श्रेष्ठश्च ॥ २ । ४ । ८ ॥ श्रेष्ठः = मुख्य प्राण; च = भी ( उस परमात्मासे ही उत्पन्न होता है ) । व्याख्या—जिसे प्राण नामसे कही जानेवाली इन्द्रियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है, ( प्र० उ० २ । ३, ४; छा० उ० ५ । १ । ७ ) जिसका प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच नामोंसे वर्णन किया जाता है, वह मुख्य प्राण भी इन्द्रिय आदिकी भाँति उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होता है। श्रुति भी इसका समर्थन करती है ( मु० उ० २ । १ । ३ )। सम्बन्ध—अब प्राणके स्वरूपका निर्धारण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥ २ । ४ । ९ ॥ वायुक्रिये = ( श्रुतिमें वर्णित मुख्य प्राण ) वायु-तत्त्व और उसकी क्रिया; न = नहीं है (क्योंकि ); पृथगुपदेशात् = उन दोनोंसे अलग इसका वर्णन है। व्याख्या—श्रुतिमे जहाँ प्राणकी उत्पत्तिका वर्णन आया है (मु० उ० २ । १ । ३ ) वहाँ वायुकी उत्पत्तिका वर्णन अलग है। इसलिये श्रुतिमे वर्णित मुख्य प्राण न तो वायुतत्त्व है और न वायुकी क्रियाका ही नाम मुख्य प्राण है, वह इन दोनोंसे भिन्न पदार्थ है, यही सिद्ध होता है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि प्राण यदि वायुतत्त्व नहीं है, तो क्या जीवात्माकी भाँति स्वतन्त्र पदार्थ है, इसपर कहते हैं— चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॥ २ । ४ । १० ॥ तु = किन्तु ( प्राण भी ); चक्षुरादिवत् = चक्षु आदि इन्द्रियोंकी भाँति ( जीवात्मा- का करण है ); तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः = क्योंकि उन्हींके साथ प्राण और इन्द्रियोंके संवादमें इसका वर्णन किया गया है तथा उनकी भाँति यह जड भी है ही । व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्मे मुख्य प्राणकी श्रेष्ठता सूचित करनेवाली एक कथा आती है, जो इस प्रकार है—एक समय सब इन्द्रियाँ परस्पर विवाद करती
२०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ हुई कहने लगीं—'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ।' अन्तमें वे अपना न्याय करानेके लिये प्रजापतिके पास गयीं। वहाँ उन सबने उनसे पूछा—'भगवन् ! हममें सर्वश्रेष्ठ कौन है ?' प्रजापतिने कहा—'तुममेसे जिसके निकलनेसे शरीर मुर्दा हो जाय, वही श्रेष्ठ है।' यह सुनकर वाणी शरीरसे बाहर निकली, फिर चक्षु, उसके बाद श्रोत्र। इस प्रकार एक-एक इन्द्रियके निकलनेपर भी शरीरका काम चलता रहा; अन्तमें जब मुख्य प्राणने शरीरसे बाहर निकलनेकी तैयारी की, तब प्राणशब्दवाच्य मनसहित सब इन्द्रियोंको अपने-अपने स्थानसे विचलित कर दिया। यह देख वे सब इन्द्रियाँ घबरायीं और मुख्य प्राणसे कहने लगीं 'तुम्हीं हम सबमें श्रेष्ठ हो, तुम बाहर मत जाओ।' (छा० उ० ५। १। ६ से १२)। इस वर्णनमें जीवात्माके मन और चक्षु आदि अन्य करणोंके साथ-साथ प्राणका वर्णन आया है, इससे यह सिद्ध होता है कि जिस प्रकार वे स्वतन्त्र नहीं हैं, जीवात्माके अधीन हैं, उसी प्रकार मुख्य प्राण भी उसके अधीन है। इसीलिये इन्द्रियनिग्रह- की भाँति शास्त्रोंमे प्राणको निग्रह करनेका भी उपदेश है। तथा 'आदि' शब्दसे यह भी सूचित किया गया है कि इन्द्रियादिकी भाँति यह जड भी है, अतः जीवात्माकी भाँति स्वतन्त्र नहीं हो सकता। सम्बन्ध—"यदि चक्षु आदि इन्द्रियोंकी भाँति प्राण भी किसी विषयके अनुभवका द्वार अथवा किसी कार्यकी सिद्धिमें सहायक होता तब तो इसको भी 'करण' कहना ठीक था; परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता। शास्त्रमें भी मन तथा दस इन्द्रियोंको ही प्रत्येक कार्यमें करण बताया गया है; प्राणको नहीं। यदि प्राणको 'करण' माना जाय तो उसके लिये भी किसी ग्राह्य विषयकी कल्पना करनी पड़ेगी।" इस शङ्काका निवारण करनेके लिये कहते हैं— अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ॥ २ । ४ । ११ ॥ च=निश्चय ही; अकरणत्वात्=(इन्द्रियोंकी भाँति) विषयोंके उपभोगमें करण न होनेके कारण; दोषः=उक्त दोष; न=नहीं है; हि=क्योंकि; तथा= इसका करण होना कैसा है, यह बात; दर्शयति=श्रुति स्वयं दिखाती है। व्याख्या—जिस प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियाँ रूप आदि विषयोंका ज्ञान करानेमें करण हैं, इस प्रकार विषयोंके उपभोगमें करण न होनेपर भी उसको जीवात्माके लिये करण माननेमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि उन सब इन्द्रियोंको प्राण ही
सूत्र ११-१३ ] अध्याय २ २०३
सूत्र ११-१३ ] अध्याय २ २०३ धारण करता है, इस शरीर और इन्द्रियोंका पोषण भी प्राण ही करता है, प्राणके संयोगसे ही जीवात्मा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है । इस प्रकार श्रुतिमें इसके करणभावको दिखाया गया है । ( छा० उ० ५ । १ । ६ से प्रकरणकी समाप्तितक ) इस प्रकरणके सिवाय और भी जहाँ-जहाँ मुख्य प्राणका प्रकरण आया है, सभी जगह ऐसी ही बात कही गयी है ( प्र० उ० ३ । १० ) । सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपि तु— पञ्चवृत्तिर्मनोवद् व्यपदिश्यते ॥ २ । ४ । १२ ॥ मनोवत् = ( श्रुतिके द्वारा यह ) मनकी भाँति; पञ्चवृत्तिः = पाँच वृत्तियों- वाला; व्यपदिश्यते = बताया जाता है। व्याख्या—जिस प्रकार श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियोंके रूपमें मनकी पाँच वृत्तियाँ मानी गयी हैं, उसी प्रकार श्रुतिने इस मुख्य प्राणको भी पाँच वृत्तियोंवाला बताया है ( बृह० उ० १ । ५ । ३ )। प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—ये ही उसकी पाँच वृत्तियाँ हैं, इनके द्वारा यह अनेक प्रकारसे जीवात्माके उपयोगमें आता है। श्रुतियोंने इसकी वृत्तियोंका भिन्न-भिन्न कार्य विस्तारपूर्वक बताया गया है ( प्र० उ० ३ । १ से ७ ) । इसलिये भी प्राणको जीवात्माका उपकरण मानना उचित ही है। सम्बन्ध—मुख्य प्राणके लक्षणोंका प्रतिपादन करनेके लिये नवें सूत्रसे प्रकरण आरम्भ करके बारहवें सूत्रतक यह सिद्ध किया गया है कि 'प्राण' जीवात्मा तथा वायुतत्त्वसे भी भिन्न है। मन और इन्द्रियोंको धारण करनेके कारण यह भी जीवात्माका करण है। शरीरमें यह पाँच प्रकारोंसे विचरता हुआ शरीरको धारण करता है और उसमें क्रियाशक्तिका संचार करता है। अब अगले सूत्रमें इसके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— अणुश्च ॥ २ । ४ । १३ ॥ अणुः = यह सूक्ष्म; च = भी है। व्याख्या—यह प्राणतत्त्व अपनी पाँच वृत्तियोंके द्वारा स्थूलरूपमें उपलब्ध होता है; इसके सिवा, यह अणु अर्थात् सूक्ष्म भी है। यहाँ 'अणु' कहनेसे यह
२०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ भाव नहीं समझना चाहिये कि यह छोटे आकारवाला है; इसकी सूक्ष्मताको लक्षित करानेके लिये इसे अणु कहा गया है। सूक्ष्म होनेके साथ ही यह परिच्छिन्न तत्त्व है। सूक्ष्मताके कारण व्यापक होनेपर भी सीमित है। सम्बन्ध—छान्दोग्य-श्रुतिमें जहाँ तेज प्रभृति तीन तत्त्वोंसे जगत्की उत्पत्ति- का वर्णन किया गया है, वहाँ उन तीनोंका अधिष्ठाता देवता किसको बताया गया है, यह निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥ २ । ४ । १४ ॥ ज्योतिराद्यधिष्ठानम् = ज्योति आदि तत्त्व जिसके अधिष्ठान बताये गये हैं, वह; तु = तो ब्रह्म ही है; तदामननात् = क्योंकि दूसरी जगह भी श्रुतिके द्वारा उसीको अधिष्ठाता बताया गया है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा गया है कि उस जगत्कर्ता परमदेवने विचार किया कि 'मै बहुत होऊँ, तब उसने तेजकी रचना की, फिर तेजने विचार किया।' इत्यादि (छा० उ० ६ । २ । ३-४) । इस वर्णनमें जो तेज आदि तत्त्वमें विचार करनेवाला उनका अधिष्ठाता बताया गया है, वह परमात्मा ही है; क्योंकि तैत्तिरीयोपनिषद्मे कहा है कि 'इस जगत्की रचना करके उसने उसमें साथ-साथ प्रवेश किया।' (तै०उ०२ । ६) । इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमेश्वरने ही उन तत्त्वोंमें अधिष्ठातारूपसे प्रविष्ट होकर विचार किया, स्वतन्त्र जड तत्त्वोंने नहीं। सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि वह परब्रह्म परमेश्वर ही उन आकाशादि तत्त्वोंका अधिष्ठाता है, तब तो प्रत्येक शरीरका अधिष्ठाता भी वही होगा। जीवात्माको शरीरका अधिष्ठाता मानना भी उचित नहीं होगा, इसपर कहते हैं— प्राणवता शब्दात् ॥ २ । ४ । १५ ॥ प्राणवता = (ब्रह्मने) प्राणधारी जीवात्माके सहित (प्रवेश किया); शब्दात् = ऐसा श्रुतिका कथन होनेसे यह दोष नहीं है। व्याख्या—श्रुतिमें यह भी वर्णन आया है कि 'इन तीनों तत्त्वोंको उत्पन्न करनेके बाद उस परमदेवने विचार किया, 'अब मैं इस जीवात्माके सहित इन तीनों देवताओंमें प्रविष्ट होकर नाना नाम-रूपोंको प्रकट करूँ।' (छा० उ०
सूत्र १४-१७ ] अध्याय २ २०५
सूत्र १४-१७ ] अध्याय २ २०५ ६। ३। २) इस कथनसे यह सिद्ध होता है कि जीवात्माके सहित परमात्माने उक्त तत्त्वोंमें प्रविष्ट होकर जगत्का विस्तार किया । इसी प्रकार ऐतरेयोपनिषद्के पहले अध्यायमें जगत्की उत्पत्तिका वर्णन करते हुए यह बताया गया है कि जीवात्माको सहयोग देनेके लिये जगत्कर्ता परमेश्वरने सजीव शरीरमें प्रवेश किया । तथा मुण्डक और श्वेताश्वतरमे ईश्वर और जीवको दो पक्षियोंकी भाँति एक ही शरीररूप वृक्षपर स्थित बताया गया है । इसी प्रकार कठोपनिषद्मे भी परमात्मा और जीवात्माको हृदयरूप गुहामे स्थित कहा गया है । इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और परमेश्वर—इन दोनोका प्रत्येक शरीरमें साथ-साथ रहना सिद्ध होता है। इसलिये जीवात्माको शरीरका अधिष्ठाता माननेमे किसी प्रकारका विरोध नहीं है । सम्बन्ध—श्रुतिमे तत्त्वोंकी उत्पत्तिके पहले या पीछे भी जीवात्माकी उत्पत्ति- का वर्णन नहीं आया, फिर उस परमेश्वरने सहसा यह विचार कैसे कर लिया कि 'इस जीवात्माके सहित मै इन तत्त्वोंमें प्रवेश करूँ?' ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— तस्य च नित्यत्वात् ॥ २ । ४ । १६ ॥ तस्य = उस जीवात्माकी; नित्यत्वात् = नित्यता प्रसिद्ध होनेके कारण; च = भी ( उसकी उत्पत्तिका वर्णन न करना उचित ही है ) । व्याख्या—जीवात्माको नित्य माना गया है । सृष्टिके समय शरीरोंकी उत्पत्ति- के साथ-साथ गौणरूपसे ही उसकी उत्पत्ति बतायी गयी है, वास्तवमें उसकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है । इसलिये पञ्चभूतोंकी उत्पत्तिके पहले या बाद उसकी उत्पत्ति न बतलाकर जो जीवात्माके सहित परमेश्वरका शरीरमे प्रविष्ट होना कहा गया है, वह उचित ही है । उसमे किसी प्रकारका विरोध नहीं है । सम्बन्ध—श्रुतिमें प्राणके नामसे इन्द्रियोंका वर्णन आया है, इससे यह जान पडता है कि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणके ही कार्य हैं, उसीकी वृत्तियाँ है, भिन्न तत्त्व नहीं है । अथवा यह अनुमान होता है कि चक्षु आदिकी भाँति मुख्य प्राण भी एक इन्द्रिय है, उन्हींकी जातिका पदार्थ है । ऐसी दशामें वास्तविक बात क्या है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥ २ । ४ । १७ ॥ ते = वे मन आदि ग्यारह प्राण; इन्द्रियाणि = इन्द्रिय कहे गये हैं ( तथा );
२०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ श्रेष्ठात्=मुख्य प्राणसे भिन्न है; अन्यत्र=क्योकि दूसरी श्रुतियोमे; तद्व्यपदेशात्= उसका भिन्नतासे वर्णन है । व्याख्या—दूसरी श्रुतियोंमे मुख्य प्राणकी गणना इन्द्रियोसे अलग की गयी है तथा इन्द्रियोंको प्राणोके नामसे नहीं कहा गया है (मु० उ० २ । १ । ३) इसलिये पूर्वोक्त चक्षु आदि दसों इन्द्रियाँ और मन मुख्य प्राणसे सर्वथा भिन्न पदार्थ हैं। न तो वे मुख्य प्राणके कार्य हैं, न मुख्य प्राण उनकी भाँति इन्द्रियोकी गणनामे है । इन सबकी शरीरमें स्थिति मुख्य प्राणके अधीन है, इसलिये गौणरूपसे श्रुतिमे इन्द्रियों- को प्राणके नामसे कहा गया है । सम्बन्ध—इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— भेदश्रुतेः ॥ २ । ४ । १८ ॥ भेदश्रुतेः=इन्द्रियोसे मुख्य प्राणका भेद सुना गया है, इसलिये ( भी मुख्य प्राण उनसे भिन्न तत्त्व सिद्ध होता है ) । व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ इन्द्रियोका प्राणके नामसे वर्णन आया है, वहाँ भी उनका मुख्य प्राणसे भेद कर दिया गया है ( मु० उ० २ । १ । ३ तथा बृह० उ० १ । ३ । ३ ) तथा प्रश्नोपनिषद्मे भी मुख्य प्राणकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करने- के लिये अन्य सब तत्त्वोसे और इन्द्रियोसे मुख्य प्राणको अलग बताया है ( प्र० उ० २ । २, ३ ) । इस प्रकार श्रुतियोमे मुख्य प्राणका इन्द्रियोसे भेद बताया जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राण इन सबसे भिन्न है । सम्बन्ध—इसके सिवा — वैलक्षण्याच्च ॥ २ । ४ । १९ ॥ वैलक्षण्यात्=परस्पर विलक्षणता होनेके कारण; च=भी ( यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियों भिन्न पदार्थ है ) । व्याख्या—सब इन्द्रियाँ और अन्त.करण सुषुप्तिके समय विलीन हो जाते हैं, उस समय भी मुख्य प्राण जागता रहता है, उसपर निद्राका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । यही इन सबकी अपेक्षा मुख्य प्राणकी विलक्षणता है; इस कारण भी यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियाँ भिन्न हैं । न तो इन्द्रियों प्राणका
सूत्र १८-२१ ] अध्याय २ २०७
सूत्र १८-२१ ] अध्याय २ २०७ कार्य या वृत्तियाँ है और न मुख्य प्राण ही इन्द्रिय है, इन्द्रियोको गौणरूपसे ही 'प्राण' नाम दिया गया है । सम्बन्ध-तेज आदि तत्त्वोंकी रचना करके परमात्माने जीवसहित उनमें प्रवेश करनेके पश्चात् नाम-रूपात्मक जगत्का विस्तार किया--यह श्रुतिमें वर्णन आया है । इस प्रसङ्गमें यह सन्देह होता है कि नाम-रूपादिक रचना करनेवाला कोई जीवविशेष है या परमात्मा ही । अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं- संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥ २ । ४ । २० ॥ संज्ञामूर्तिक्लृप्तिः=नाम-रूपकी रचना; तु=भी; त्रिवृत्कुर्वतः=तीनो तत्त्वोका मिश्रण करनेवाले परमेश्वरका ( ही कर्म है ); उपदेशात्=क्योकि वहाँ श्रुतिके वर्णनसे यही बात सिद्ध होती है । व्याख्या-इस समस्त नाम-रूपात्मक जगत्की रचना करना जीवात्माका काम नहीं है । वहाँ जो जीवात्माके सहित परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात कही गयी है, उसका अभिप्राय जीवात्माके कर्तापनमे परमात्माके कर्तृत्वकी प्रधानता बताना है, उसे सृष्टिकर्ता बताना नहीं; क्योंकि जीवात्माके कर्म-संस्कारोके अनुसार उसको कर्म करनेकी शक्ति आदि और प्रेरणा देनेवाला वही है । अतएव वहाँके वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि नाम-रूपसे व्यक्त की जाने- वाली इस जडचेतनात्मक जगत्की रचनारूप क्रिया उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही है, जिसने उन तत्त्वोंको उत्पन्न करके उनका मिश्रण किया है; अन्य किसीकी नहीं। सम्बन्ध-उस परमात्माने तीनोंका मिश्रण करके उनसे यदि जगत्की उत्पत्ति की तो किस तत्त्वसे कौन पदार्थ उत्पन्न हुआ ? इसका विभाग किस प्रकार उपलब्ध होगा, इसपर कहते हैं— मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॥ २ । ४ । २१ ॥ ( जिस प्रकार ) मांसादि=मांस आदि; भौमम्=पृथिवीके कार्य बताये गये हैं, (वैसे ही ); यथाशब्दम्=वहाँ श्रुतिके शब्दद्वारा बताये अनुसार; इतरयोः= दूसरे दोनो तत्त्वोंका कार्य; च=भी समझ लेना चाहिये । व्याख्या-भूमि यानी पृथिवीके कार्यको भौम कहते हैं । उस प्रकरणमे जिस
२०८ वेदान्त-दर्शन .[ पाद ४ प्रकार भूमिरूप अन्नके कार्य मांस, विष्ठा और मन—ये तीनों बताये गये हैं, उसी प्रकार उस प्रकरणके शब्दोंमें जिस-जिस तत्त्वके जो-जो कार्य बताये गये हैं, उसके वे ही कार्य हैं, ऐसा समझ लेना चाहिये । वहाँ श्रुतिने जलका कार्य मूत्र, रक्त और प्राणको तथा तेजका कार्य हड्डी, मज्जा और वाणीको बताया है । अतः इन्हे ही उनका कार्य समझना चाहिये । सम्बन्ध—जब तीनों तत्त्वोंका मिश्रण करके सबकी रचना की गयी, तब खाये हुए किसी एक तत्त्वसे अमुक वस्तु हुई—इत्यादि रूपसे वर्णन करना कैसे संगत हो सकता है ? इसपर कहते हैं— वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥ २ । ४ । २२ ॥ तद्वादः = वह कथन; तद्वादः = वह कथन; तु = तो; वैशेष्यात् = अधिकताके नातेसे है । व्याख्या—तीनोंके मिश्रणमे भी एककी अधिकता और दूसरोंकी न्यूनता रहती है, अतः जिसकी अधिकता रहती है उस अधिकताको लेकर व्यवहारमे मिश्रित तत्त्वोका अलग-अलग नामसे कथन किया जाता है; इसलिये कोई विरोध नहीं है । यहाँ 'तद्वादः', पदका दो बार प्रयोग अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है । इस प्रकरणमे जो मनको अन्नका कार्य और अन्नमय कहा गया है, प्राणोंको जलका कार्य और जलमय कहा गया है तथा वाणीको तेजका कार्य और तेजोमयी कहा गया है, वह भी उन-उन तत्त्वोके सम्बन्धसे उनका उपकार होता हुआ देखा जानेके कारण गौणरूपसे ही कहा हुआ मानना चाहिये । वास्तवमे मन, प्राण और वाणी आदि इन्द्रियाँ भूतोका कार्य नहीं हैं; भूतोंसे भिन्न पदार्थ हैं, यह बात पहले सिद्ध की जा चुकी है । (ब्र० सू० २ । ४ । २) चौथा पाद सम्पूर्ण । श्रीवेदव्यासरचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र) का दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।
श्रीपरमात्मने नमः तीसरा अध्याय पहला पाद पूर्व दो अध्यायोंमें ब्रह्म और जीवात्माके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया, अब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका उपाय बतानेके लिये तीसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसीलिये इस अध्यायको साधनाध्याय अथवा उपासनाध्याय कहते हैं। परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंमें सबसे पहले वैराग्यकी आवश्यकता है। संसारके अनित्य भोगोंमें वैराग्य होनेसे ही मनुष्यमें परमात्माको प्राप्त करनेकी शुभेच्छा प्रकट होती है और वह उसके लिये प्रयत्नशील होता है। अतः वैराग्योत्पादनके लिये बार-बार जन्म-मृत्यु और गर्भादिके दुःखोंका प्रदर्शन करनेके लिये पहला पाद आरम्भ किया जाता है। प्रलयके बाद सृष्टिकालमें उस परब्रह्म परमेश्वरसे जिस प्रकार इस जगत्की उत्पत्ति होती है, उसका वर्णन तो पहलेके दो अध्यायोंमें किया गया। उसके बाद वर्तमान जगत्में जो जीवात्माके शरीरोंका परिवर्तन होता रहता है, उसके विषयमें श्रुतियोंने जैसा वर्णन किया है, उसपर इस तीसरे अध्यायके प्रथम पादमें विचार किया जाता है। विचारका विषय यह है कि जब यह जीवात्मा पहले शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है, तब अकेला ही जाता है या और भी कोई इसके साथ जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूप- णाभ्याम् ॥ ३ । १ । १ ॥ तदन्तरप्रतिपत्तौ = उक्त देहके बाद देहान्तरकी प्राप्तिके समय ( यह जीवात्मा ); संपरिष्वक्तः = शरीरके बीजरूप सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ; रंहति = जाता है ( यह बात ); प्रश्ननिरूपणाभ्याम् = प्रश्न और उसके उत्तरसे सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतियोंमें यह विषय कई जगह आया है, उनमेंसे जिस स्थलका वे० द० १४—
प्रकरणपर विचार किया जाता है । वहाँ यह वर्णन है कि श्वेतकेतु
२१० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ वर्णन स्पष्ट है, वह तो अपने-आप समझमें आ जाता है; परन्तु जहाँका वर्णन कुछ अस्पष्ट है, उसे स्पष्ट करनेके लिये यहाँ छान्दोग्योपनिषद्के प्रकरणपर विचार किया जाता है । वहाँ यह वर्णन है कि श्वेतकेतु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषिकुमार था, वह एक समय पाञ्चालोंकी सभामें गया । वहाँ प्रवाहण नामक राजाने उससे पूछा—'क्या तुम अपने पितासे शिक्षा पा चुके हो ?' उसने कहा—'हाँ ।' तब प्रवाहणने पूछा—'यहाँसे मरकर यह जीवात्मा कहाँ जाता है ? वहाँसे फिर कैसे लौटकर आता है ? देवयान और पितृयान-मार्गका क्या अन्तर है ? यहाँसे गये हुए लोगोसे वहाँका लोक भर क्यो नहीं जाता ?—इन सब बातोंको और जिस प्रकार पाँचवीं आहुतिमे यह जल पुरुषरूप हो जाता है, इस बातको तू जानता है या नहीं ?' तब प्रत्येक बातके उत्तरमे श्वेतकेतुने यही कहा—'मै नहीं जानता ।' यह सुनकर प्रवाहणने उसे फटकारा और कहा—'जब तुम इन सब बातोको नहीं जानते, तब कैसे कहते हो कि मै शिक्षा पा चुका ?' श्वेतकेतु लज्जित होकर पिताके पास गया और बोला कि 'प्रवाहण नामवाले एक साधारण क्षत्रियने मुझसे पाँच बातें पूछीं, किन्तु उनमेसे एकका भी उत्तर मै न दे सका । आपने मुझे कैसे कह दिया था कि मै तुमको शिक्षा दे चुका हूँ ।' पिताने कहा—'मै स्वयं इन पाँचोमेसे किसीको नहीं जानता, तब तुमको कैसे बताता ।' उसके'बाद अपने पुत्रके सहित पिता उस राजाके पास गया और धनादिके दानको स्वीकार न करके कहा—'आपने मेरे पुत्रसे जो पाँच बाते पूछी थीं, उन्हे ही मुझे बतलाइये ।' तब उस राजाने बहुत दिनोतक उन दोनोको अपने पास ठहराया और कहा कि 'आजतक यह विद्या क्षत्रियोके पास ही रही है, अब पहले-पहल आप ब्राह्मणोंको मिल रही है ।' यह कहकर राजा प्रवाहणने पहले उस पाँचवें प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया, जिसमे यह जिज्ञासा की गयी थी कि 'यह जल पाँचवीं आहुतिमे पुरुषरूप कैसे हो जाता है ?' वहाँ द्युलोकरूप अग्निमे श्रद्धाकी पहली आहुति देनेसे राजा सोमकी उत्पत्ति बतायी है । दूसरी आहुति है मेघरूप अग्निमें राजा सोमको हवन करना; उससे वर्षाकी उत्पत्ति बतायी गयी है । तीसरी आहुति है पृथ्वीरूप अग्निमे वर्षाको हवन करना; उससे अन्नकी उत्पत्ति बतायी गयी है । चौथी आहुति है पुरुषरूप अग्निमे अन्नका हवन करना; उससे वीर्यकी उत्पत्ति बतायी गयी है और पाँचवीं आहुति है स्त्रीरूप अग्निमे वीर्यका हवन करना; उससे
सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २११
सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २११ गर्भकी उत्पत्ति बताकर कहा है कि इस तरह यह जल पाँचवीं आहुतिमे ‘पुरुष’ संज्ञक होता है । इस प्रकार जन्म ग्रहण करनेवाला मनुष्य जबतक आयु होती है, तबतक यहाँ जीवित रहता है—इत्यादि ( छा० उ० ५ । ३ । १ से ५ । ९ । २ तक ) । इस प्रकरणमे जलके नामसे बीजरूप समस्त तत्त्वोके समुदाय सूक्ष्म शरीरसहित वीर्यमे स्थित जीवात्मा कहा गया है; अतः वहाँके प्रश्नोत्तरपूर्वक विवेचनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा जब एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाता है, तब बीजरूपमे स्थित समस्त तत्त्वोसे युक्त होकर ही प्रयाण करता है । सम्बन्ध —‘इस प्रकरणमें तो केवल जलका ही पुरुषरूप हो जाना कहा है, फिर इसमे सभी सूक्ष्म तत्त्वोंका भी होना कैसे समझा जायगा, यदि श्रुतिको यही बताना अभीष्ट था तो केवल जलका ही नाम क्यों लिया ?’ इस जिज्ञासापर कहते हैं— त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥ ३ । १ । २ ॥ त्र्यात्मकत्वात्=( शरीर ) तीनों तत्त्वोका सम्मिश्रण है, इसलिये ( जलके कहनेसे सबका ग्रहण हो जाता है ); तु=तथा; भूयस्त्वात्=वीर्यमे सबसे अधिक जलका भाग रहता है, इसलिये ( जलके नामसे उसका वर्णन किया गया है ) । व्याख्या—जगत्की उत्पत्तिके वर्णनमे कहा जा चुका है कि तीनो तत्त्वोका सम्मेलन करके उसके बाद परमेश्वरने नाम और रूपोको प्रकट किया ( छा० उ० ६ । ३ । ३ ) । वहाँ तीन तत्त्वोका वर्णन भी उपलक्षण है, उसमे सभी तत्त्वोका मिश्रण समझ लेना चाहिये । स्त्रीके गर्भमें जिस वीर्यका आधान किया जाता है, उसमे सभी भौतिक तत्त्व रहते हैं, तथापि जलकी अधिकता होनेसे यहाँ उसीके नामसे उसका वर्णन किया गया है । वास्तवमे वह कथन शरीरके बीजभूत सभी तत्त्वोंको लक्ष्य करानेवाला है । एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाते समय जीव प्राणमें स्थित होकर जाते हैं और प्राणको आपोमय ( जलरूप ) कहा गया है, अतः उस ‘दृष्टिसे भी यहाँ जलको ही पुरुषरूप बताना सर्वथा सुसङ्गत है। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि जीवात्मा सूक्ष्म तत्त्वोसे युक्त हुआ ही एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाता है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातकी पुष्टि करते हैं— प्राणगतेश्च ॥ ३ । १ । ३ ॥ प्राणगतेः=जीवात्माके साथ प्राणोके गमनका वर्णन होनेसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है ) ।
२१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ . व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में आश्वलायन मुनिने पिप्पलादसे प्राणके विषयमें कुछ प्रश्न किये हैं । उनमेंसे एक प्रश्न यह भी है कि 'यह एक शरीरको छोड़कर जब दूसरे शरीरमें जाता है, तब पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है ?' (प्र० उ० ३ । १) । उसके उत्तरमें पिप्पलादने कहा है कि 'जब इस शरीरसे उदानवायु निकलता है, तब यह शरीर ठण्डा हो जाता है, उस समय जीवात्मा मनमे विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदानवायुके सहित दूसरे शरीरमे चला जाता है । उस समय जीवात्माका जैसा सङ्कल्प होता है, उस सङ्कल्प और मन-इन्द्रियोंके सहित यह प्राणमे स्थित हो जाता है । वह प्राण उदानके सहित जीवात्माको उसके सङ्कल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोकों ( योनियों ) में ले जाता है ।' (प्र० उ० ३ । १० तक ) इस प्रकार जीवात्माके साथ प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके गमनका वर्णन होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि बीजरूप सभी सूक्ष्म तत्त्वोंके सहित यह जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है । छान्दोग्योपनिषद्में जो पहले-पहल श्रद्धाका हवन बताया गया है, वहाँ श्रद्धाके नामसे सङ्कल्पका ही हवन समझना चाहिये । भाव यह कि श्रद्धारूप सङ्कल्पकी आहुतिसे जो उसके सूक्ष्म शरीरका निर्माण हुआ, वही पहला परिणाम राजा सोम हुआ; फिर उसका दूसरा परिणाम वर्षारूपसे मेघमे स्थिति है, तीसरे परिणाममे पहुँचकर वह अन्नमे स्थित हुआ; चौथे परिणाम- मे वीर्यरूपसे उसकी पुरुषमे स्थिति हुई और पाँचवें परिणाममें वह गर्भ होकर स्त्रीके गर्भाशयमें स्थित हुआ । तदनन्तर वही मनुष्य होकर बाहर आया । इस प्रकार दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता है । प्राणका सहयोग सभी जगह है; क्योंकि गति प्राणके अधीन है, प्राणको जलमय बताया ही गया है । इस प्रकार श्रुतिके समस्त वर्णनकी सङ्गति बैठ जाती है । सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारके विरोधका उल्लेख करके उसका निराकरण करते हैं— अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ॥ ३ । १ । ४ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अग्न्यादिगतिश्रुतेः=अग्नि आदिमें प्रवेश करनेकी बात दूसरी श्रुतिमे कही है, इसलिये ( यह सिद्ध नहीं होता ); इति न=तो यह ठीक नहीं है; भाक्तत्वात्=क्योंकि वह श्रुति अन्यविषयक होनेसे गौण है ।
सूत्र ४-५ ] अध्याय ३ २१३
सूत्र ४-५ ] अध्याय ३ २१३ व्याख्या-यदि कहो, "बृहदारण्यकके आर्तभाग और याज्ञवल्क्यके संवादमें यह वर्णन आया है कि 'मरणकालमें वाणी अग्निमें विलीन हो जाती है, प्राण वायुमें विलीन हो जाते हैं'--इत्यादि ( बृह० उ० ३ । २ । १३ ) इससे यह कहना सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा दूसरे तत्त्वोंके सहित जाता है, क्योंकि वे सब तो अपने-अपने कारणमे यहीं विलीन हो जाते हैं।" तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह बात आर्तभागने प्रश्नमे तो कही है, पर याज्ञवल्क्यने उत्तरमे इसे स्वीकार नहीं किया, बल्कि सभासे अलग ले जाकर उसे गुप्तरूपसे वही पाँच आहुतियोंवाली बात समझाकर अन्तमे कहा कि 'मनुष्य पुण्यकर्मोंसे पुण्यशील होता है और पापकर्मोंसे पापी होता है।' छान्दोग्यके प्रकरणमे भी बादमे यही बात कही गयी है, इसलिये वर्णनमे कोई भेद नहीं है। वह श्रुति प्रश्नविषयक होनेसे गौण है, उत्तरकी बात ही ठीक है। उत्तर इसलिये गुप्त रक्खा गया कि सभाके बीचमे गर्भाधानका वर्णन करना कुछ सङ्कोचकी बात है; सभामे तो स्त्री-बालक सभी सुनते हैं। सम्बन्ध-पुनः विरोध उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं- प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥ ३ । १ । ५ ॥ चेत्=यदि कहा जाय कि; प्रथमे=प्रथम आहुतिके वर्णनमें; अश्रव- णात्=( जलका नाम ) नहीं सुना गया है, इसलिये ( अन्तमें यह कहना कि पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध है ); इति न=तो ऐसी बात नहीं है; हि=क्योंकि; उपपत्तेः=पूर्वापरकी सङ्गतिसे ( यही सिद्ध होता है कि ); ताः एव=( वहाँ ) श्रद्धाके नामसे उस जलका ही कथन है। व्याख्या-यदि कहो कि पहले-पहल श्रद्धाको हवनीय द्रव्यका रूप दिया गया है, अतः उसीके परिणाम सब हैं; इस स्थितिमें यह कहना कि पाँचवीं आहुतिमें जल ही पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध प्रतीत होता है तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ श्रद्धाके नामसे सङ्कल्पमें स्थित जल आदि समस्त सूक्ष्म- तत्त्वोंका ग्रहण है और अन्तमें भी उसीको जल नामसे कहा गया है, इसलिये कोई विरोध नहीं है । भाव यह कि जीवात्माकी गति उसके अन्तिम सङ्कल्पानुसार होती है और वह प्राणके द्वारा ही होती है तथा श्रुतिमे प्राणको जलमय बताया है, अतः सङ्कल्पके अनुसार जो सूक्ष्म तत्त्वोंका समुदाय प्राणमे स्थित होता
२१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ है, उसीको वहाँ श्रद्धाके नामसे कहा गया है। यह कथन गतिमे सङ्कल्पकी प्रधानता दिखानेके लिये है । इस प्रकार पहले-पहल जो बात श्रद्धाके नामसे कही गयी है, उसीका अन्तिम वाक्यमें जलके नामसे वर्णन किया है; अतः पूर्वापरमे कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध-पहलेकी भाँति दूसरे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं- अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ३ । १ । ६ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहा जाय कि; अश्रुतत्वात्=श्रुतिमें तत्त्वोंके साथ जीवात्माके गमनका वर्णन नहीं है, इसलिये ( उनके सहित जीवात्मा जाता है, यह कहना युक्तिसंगत नहीं है ); इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; इष्टादिकारिणाम्=( क्योकि ) उसी प्रसंगमें अच्छे-बुरे कर्म करनेवालोका वर्णन है; प्रतीतेः=अतः इस श्रुतिमे उन शुभाशुभकारी जीवात्माओके वर्णनकी प्रतीति स्पष्ट है, इसलिये ( उक्त विरोध यहाँ नहीं है ) । व्याख्या-यदि कहो कि उस प्रकरणमे जीवात्मा उन तत्त्वोंको लेकर जाता है, ऐसी बात नहीं कही गयी है, केवल जलके नामसे तत्त्वोंका ही पुरुष- रूपमें हो जाना बताया गया है, इसलिये यह कहना विरुद्ध है कि तत्त्वोंसे युक्त जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाता है; तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उसी प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'जो अच्छे आचरणवाले होते है, वे उत्तम योनिको प्राप्त होते है और जो नीच कर्म करनेवाले होते हैं, वे नीच योनियोंको प्राप्त होते हैं।' * (छा० उ० ५ । १० । ७) । इस वर्णनसे अच्छे-बुरे कर्म करनेवाले जीवात्माका उन तत्त्वोंके साथ एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होना सिद्ध होता है, इसलिये कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध-इसी प्रकरणमें जहाँ सकामभावसे शुभ कर्म करनेवालोंके लिये धूममार्गसे स्वर्गमें जानेकी बात कही गयी है, वहाँ ऐसा वर्णन आता है कि 'वह स्वर्गमें जानेवाला पुरुष देवताओंका अन्न `है, देवता लोग उसका भक्षण करते हैं' (बृह० उ० ६ । २ । १६) । अतः यह कहना कैसे संगत होगा कि
- 'तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् ।'
सूत्र ६—७ ] अध्याय ३ २१५
सूत्र ६—७ ] अध्याय ३ २१५ पुण्यात्मालोग अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं। जब वे स्वयं ही देवताओंके भोग्य बन जाते हैं, तब उनके द्वारा स्वर्गका भोग भोगना कैसे सिद्ध होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भाक्तं वानात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ३ । १ । ७ ॥ अनात्मवित्त्वात् = वे लोग आत्मज्ञानी नहीं है, इस कारण (आत्मज्ञानीकी अपेक्षा उनकी हीनता दिखानेके लिये ); वा = ही; भाक्तम् = उनको देवताओं- का अन्न बतानेवाली श्रुति गौण है; हि = क्योंकि; तथा = उस प्रकारसे (उनका हीनत्व और स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके भोगोको भोगना ) भी; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है । व्याख्या—वे सकामभावसे शुभ कर्म करनेवाले लोग आत्मज्ञानी नहीं हैं, अतः आत्मज्ञानकी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे उनको देवताओका अन्न और देवताओंद्वारा उनका भक्षण किया जाना कहा गया है, वास्तवमे तो, श्रुति यह कहती है कि 'देवतालोग न खाते हैं और न पीते हैं, इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते है।' (छा० उ० ३ । ६ । १)* अतः इस कथनका यह भाव है कि राजाके नौकरोकी भाँति वह देवताओंके भोग्य यानी सेवक होते है। इस भावके वचन श्रुतिमे दूसरी जगह भी पाये जाते हैं—'जो उस परमेश्वरको न जानकर दूसरे देवताओंकी उपासना करता है, वह जैसे यहाँ लोगोंके घरोंमे पशु होते हैं, वैसे ही देवताओंका पशु होता है।' (बृह० उ० १ । ४ । १०)† आत्म- ज्ञानकी स्तुतिके लिये इस प्रकार कहना उचित ही है। इसके सिवा, वे शुभ कर्मवाले लोग देवताओके साथ आनन्दका उपभोग करते हैं, इसका श्रुतिमें इस तरह वर्णन किया गया है—'पितृलोकपर विजय पानेवालोंकी अपेक्षा सौगुना आनन्द कर्मोंसे देवभावको प्राप्त होनेवालोंको होता है‡।' तथा गीतामें भी इस प्रकार कहा गया है— 'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
- 'न ह वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।' † 'अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते••••••यथा पशुरेवँ स देवानाम्।' ‡ अथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः • स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसंपद्यन्ते । ( बृह० उ० ४ । ३ । ३३ )
२१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ 'वे वहाँ विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमे लौट आते हैं। इस प्रकार वेदोक्त धर्मका आचरण करनेवाले वे भोगकामी मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते रहते हैं' ( गीता ९ । २१ ) । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि उनको देवताओका अन्न कहना वहाँ गौणरूपसे है, वास्तवमें वहाँ जाकर वे अपने कर्मोंका ही फल भोगते है और फिर वहाँसे वापस लौट आते हैं। अतः जीवात्मा- का एक शरीरसे दूसरे शरीरमे सूक्ष्म तत्त्वोके सहित जाना सर्वथा सुसङ्गत है; इसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—“उक्त प्रकरणमें कहा गया है कि 'जबतक उसके कर्मोंका क्षय नही हो जाता, तबतक वह वहीं रहता है, फिर वहाँसे इस लोकमें लौट आता है।' अतः प्रश्न होता है कि उसके सभी पुण्यकर्म पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं या कुछ कर्म शेष रहता है, जिसे साथ लेकर वह लौटता है?” इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं- कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेत- मनेवं च ॥ ३ । १ । ८ ॥ कृतात्यये=किये हुए पुण्य कर्मोंका क्षय होनेपर; अनुशयवान् =शेष कर्म- संस्कारोंसे युक्त (जीवात्मा); यथेतम् =जैसे गया था उसी मार्गसे; च= अथवा; अनेवम् =इससे भिन्न किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है; दृष्टस्मृतिभ्याम्= श्रुति और स्मृतियोंसे (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-उस जीवके द्वारा किये हुए कर्मोंमेंसे जिनका फल भोगनेके लिये उसे स्वर्गलोकमे भेजा गया है, उन पुण्यकर्मोंका पूर्णतया क्षय हो जानेपर वह स्वर्गस्थ जीवात्मा अनुशयसे अर्थात् शेष कर्मसंस्कारोंसे युक्त होकर जिस मार्गसे गया था, उसीसे अथवा किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है। इस प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है कि 'तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्........अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनि- मापद्येरन्।' अर्थात् 'अच्छे आचरणोंवाले अच्छी योनिको प्राप्त होते हैं और बुरे आचरणोवाले बुरी योनियोंको प्राप्त होते हैं' (छा० उ० ५ । १० । ७) इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है तथा स्मृतिमे जो यह कहा गया है कि 'जो वर्णाश्रमी मनुष्य अपने कर्मोंमें स्थित रहनेवाले हैं, वे यहाँसे स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ कर्मोंका फल भोगकर बचे हुए कर्मोंके अनुसार अच्छे जन्म, कुल, रूप आदिको प्राप्त होते हैं' (गौतमस्मृति ११ । १) इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात सिद्ध होती है।
सूत्र ८—१०] अध्याय ३ २१७
सूत्र ८—१०] अध्याय ३ २१७ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं— चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णा- जिनिः॥ ३ । १ । ९ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहो कि; चरणात्=चरण शब्दका प्रयोग है, इसलिये ( यह कहना उचित नहीं है कि वह शेष कर्मसंस्कारोको साथ लेकर आता है ); इति न=तो ऐसी बात नहीं है; उपलक्षणार्था=क्योंकि वह श्रुति अनुशय ( शेष कर्म-संस्कारो ) का उपलक्षण करानेके लिये है; इति=यह बात; कार्ष्णा- जिनिः='कार्ष्णाजिनि'नामक आचार्य कहते हैं ( इसलिये कोई विरोध नहीं है )। व्याख्या—उपर्युक्त शङ्काका उत्तर अपनी ओरसे न देकर आचार्य कार्ष्णाजिनिका मत उपस्थित करते हुए सूत्रकार कहते हैं—यदि पूर्व- पक्षीद्वारा यह कहा जाय कि "यहाँ 'रमणीयचरणाः' इत्यादि श्रुतिमे तो चरण शब्दका प्रयोग है, जो कर्मसंस्कारका वाचक नहीं है; इसलिये यह सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा स्वर्गलोकसे लौटते समय बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए लौटता है" तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ जो 'चरण' शब्द है, वह अनुशयका उपलक्षण करानेके लिये है अर्थात् यह सूचित करनेके लिये है कि जीवात्मा भुक्तशेष कर्मसंस्कारको साथ लेकर लौटता है, अतः कोई दोष नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनमें पुनः शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥ ३ । १ । १० ॥ चेत्=यदि कहो; आनर्थक्यम्=(बिना किसी कारणके उपलक्षणके रूपमें 'चरण' शब्दका प्रयोग करना ) निरर्थक है; इति न=तो यह ठीक नहीं, क्योंकि; तदपेक्ष- त्वात्=कर्माशयमें आचरण आवश्यक है । व्याख्या—यदि यह कहा जाय कि यहाँ 'चरण' शब्दको बिना किसी कारण- के कर्मसंस्कारका उपलक्षग मानना निरर्थक है, इसलिये उपर्युक्त उत्तर ठीक नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है, उपर्युक्त उत्तर सर्वथा उचित है; क्योंकि कर्म- संस्काररूप अनुशय पूर्वकृत शुभाशुभ आचरणोंसे ही बनता है, अतः कर्माशयके लिये आचरण अपेक्षित है, इसलिये 'चरण' शब्दका प्रयोग निरर्थक नहीं है।