ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २-५ ] अध्याय २ १९९ व्याख्या-शतपथ-ब्राह्मणमे ऋषियोके नामसे इन्द्रियोका पाँच तत्त्वोंकी उत्पत्तिसे पहले होना कहा गया है ( ६ । १ । १ । १ ) तथा मुण्डकोपनिषद्में भी इन्द्रियोकी उत्पत्ति पाँच भूतोसे पहले बतायी गयी है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि आकाशादि तत्त्वोसे इन्द्रियोकी उत्पत्ति नहीं हुई है, अतः तेज आदि तत्त्वोसे वाक् आदिकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली वह श्रुति गौण है । सम्बन्ध-अब दूसरी युक्ति देकर उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं— तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥ २ । ४ । ४ ॥ वाचः = वाणीकी उत्पत्तिका वर्णन; तत्पूर्वकत्वात् = तीनों तत्त्वोंमे उस ब्रह्मके प्रविष्ट होनेके बाद है (इसलिये तेजसे उसकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली श्रुति गौण है) । व्याख्या—उस प्रकरणमे यह कहा गया है कि 'उन तीन तत्त्वरूप देवताओमें जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर उस ब्रह्मने नामरूपात्मक जगत्की रचना की।' (छ० उ० ६ । ३ । ३ ) इस प्रकार वहाँ जगत्की उत्पत्ति ब्रह्मके प्रवेशपूर्वक बतायी गयी है; इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि समस्त इन्द्रियोकी उत्पत्ति ब्रह्मसे ही हुई है, तेज आदि तत्त्वोने नहीं । अतः तेज-तत्त्वसे वाणीकी उत्पत्ति सूचित करनेवाले श्रुतिका कथन गौण है । सम्बन्ध—इस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है और वह पाँच तत्त्वोंसे पहले ही हो जाती है; यह सिद्ध किया गया । अब जो श्रुतियोंमें कहीं तो प्राणोंके नामसे सात इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है ( मु० उ० २ । १ । ८ ) तथा कहीं मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन है ( बृह० उ० ३ । ९ । ४ ) इनमेंसे कौन-सा वर्णन ठीक है, इसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हुए प्रकरण आरम्भ करते हैं— सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च ॥ २ । ४ । ५ ॥ सप्त = इन्द्रियाँ सात हैं; गतेः = क्योकि सात ही ज्ञात होती हैं; च = तथा; विशेषितत्वात् = 'सप्त प्राणाः' कहकर श्रुतिने 'सप्त' पदका प्राणो ( इन्द्रियो ) के विशेषणरूपसे प्रयोग किया है । व्याख्या—पूर्वपक्षीका कथन है कि मुख्यतः सात इन्द्रियाँ ही ज्ञात होती है और श्रुतिने 'जिनमें सात प्राण अर्थात् आँख, कान, नाक, रसना, त्वचा, वाक् और मन—ये सात इन्द्रियाँ विचरती हैं, वे लोक सात हैं।' (मु० उ० २ । १ । ८) ।